कविता के अंत मै एक प्रश्न हैं जो लाल अक्षरों से हैं । जवाब जितने मिलेगे उतना बढ़िया होगा । मुझे कविता ने छुआ । मेरा जवाब भी हैं पर सबसे अंत मै आयेगा । सो कविता पढिये जवाब खोजिये
Wednesday, June 29, 2011
सृष्टि में एक नारी,
Saturday, June 4, 2011
बलात्कार के बाद का बलात्कार .कविता केसर क्यारी ....उषा राठौड़
केसर क्यारी ....उषा राठौड की कविता
बलात्कार के बाद का बलात्कार
मेरी एक नन्ही सी नादानी की इतनी बड़ी सजा ?
डग भरना सिख रही थी,
भटक कर रख दिया था वो कदम
बचपन के आँगन से बाहर ...
जवानी तक तो मै पहुंची भी नहीं थी कि
तुमने झपट्टा मार लिया उस भूखे गिद्ध की मानिंद
नोच लिए मेरे होंसलों के पंख
मरे सीने का तो मांस भी भरा नहीं था कि
तुमको मांसाहारी समझ के छोड़ दूं
टुकड़ों मे काट दिया है तुमने मेरी जिंदगी को
अब ना समेट पाऊँगी
अपनी नन्ही हथेलियों से
मेरे मुंह पर रख के हाथ जितना जोर से दबाया था
काश एक हाथ मेरे गले पे होता तुम्हारा
तो ये अनगिनित निगाहे यूं ना करती आज मेरा
बलात्कार के बाद का बलात्कार .
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Sunday, May 15, 2011
कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??
पर आज भी जब बात होती है बराबरी कि
तो मुझे आगे कर के कहा जाता है
लो ये पुरूस्कार तुम्हारा है
क्योंकी तुम नारी हो ,
महिला हो , प्रोत्साहन कि अधिकारी हो
देने वाले हम है , आगे तुम्हे बढाने वाले भी हम है
मजमा जब जुडेगा , फक्र से हम कह सकेगे
ये पुरूस्कार तो हमारा था
तुम नारी थी , अबला थी , इसलिये तुम को दिया गया
फिर कुछ समय बाद , हमारी भाषा बदल जायेगी
हम ना सही , कोई हम जैसा ही कहेगा
नारियों को पुरूस्कार मिलता नहीं दिया जाता है
दिमाग मे बस एक ही प्रश्न आता
और
कब तक मेरे किये हुए कामो को मेरी उपलब्धि नहीं माना जाएगा ??

और
कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Wednesday, May 11, 2011
माँ
रचना जी,
मैंने "माँ" विषय पर एक कविता लिखी है, अगर नारी की कविता ब्लॉग के लिए यह उपयुक्त हो तो मैं आप सबसे साझा करना चाहूँगा |
माँ
जीवन की रेखा की भांति जिसकी महत्ता होती है,
दुनिया के इस दरश कराती, वह तो माँ ही होती है |
खुद ही सारे कष्ट सहकर भी, संतान को खुशियाँ देती है,
गुरु से गुरुकुल सब वह बनती, वह तो माँ ही होती है |
जननी और यह जन्भूमि तो स्वर्ग से बढ़कर होती है,
पर थोडा अभिमान न करती, वह तो माँ ही होती है |
"माँ" छोटा सा शब्द है लेकिन, व्याख्या विस्तृत होती है,
ममता के चादर में सुलाती, वह तो माँ ही होती है |
संतान के सुख से खुश होती, संतान के गम में रोती है,
निज जीवन निछावर करती, वह तो माँ ही होती है |
शत-शत नमन है उस जीवट को, जो हमको जीवन देती है,
इतना देकर कुछ न चाहती, वह तो माँ ही होती है |
Thank you
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
गृहणी
मैंने उसे देखा है
मौन की ऊँची-ऊँची दीवारों से घिरी
सपाट भावहीन चेहरा लिये वह
चुपचाप गृह कार्य में लगी होती है
उसके खुरदुरे हाथ यंत्रवत कभी
सब्जी काटते दिखाई देते हैं ,
कभी कपड़े निचोड़ते तो
कभी विद्युत् गति से बच्चों की
यूनीफ़ॉर्म पर प्रेस करते !
उसकी सूखी आँखों की झील में
पहले कभी ढेर सारे सपने हुए करते थे ,
वो सपने जिन्हें अपने विवाह के समय
काजल की तरह आँखों में सजाये
बड़ी उमंग लिये अपने पति के साथ
वह इस घर में ले आई थी !
साकार होने से पहले ही वे सपने
आँखों की राह पता नहीं
कब, कहाँ और कैसे बह गये और
उसकी आँखों की झील को सुखा गये
वह जान ही नहीं पाई !
हाँ उन खण्डित सपनों की कुछ किरचें
अभी भी उसकी आंखों में अटकी रह गयी हैं
जिनकी चुभन यदा कदा
उसकी आँखों को गीला कर जाती है !
कस कर बंद किये हुए उसके होंठ
सायास ओढ़ी हुई उसकी खामोशी
की दास्तान सुना जाते हैं ,
जैसे अब उसके पास किसीसे
कहने के लिये कुछ भी नहीं बचा है ,
ना कोई शिकायत, ना कोई उलाहना
ना कोई हसरत, ना ही कोई उम्मीद ,
जैसे उसके मन में सब कुछ
ठहर सा गया है, मर सा गया है !
उसे सिर्फ अपना धर्म निभाना है ,
एक नीरस, शुष्क, मशीनी दिनचर्या ,
चेतना पर चढ़ा कर्तव्यबोध का
एक भारी भरकम लबादा ,
और उसके अशक्त कन्धों पर
अंतहीन दायित्वों का पहाड़ सा बोझ ,
जिन्हें उसे प्यार, प्रोत्साहन, प्रशंसा और
धन्यवाद का एक भी शब्द सुने बिना
होंठों को सिये हुए निरंतर ढोये जाना है ,
ढोये जाना है और बस ढोये जाना है !
यह एक भारतीय गृहणी है जिसकी
अपनी भी कोई इच्छा हो सकती है ,
कोई ज़रूरत हो सकती है ,
कोई अरमान हो सकता है ,
यह कोई नहीं सोचना चाहता !
बस सबको यही शिकायत होती है
कि वह इतनी रूखी क्यों है !
साधना वैद
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Sunday, May 8, 2011
कशमकश
Saturday, April 30, 2011
द्रौपदी
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Tuesday, April 19, 2011
हे पुरुष !
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Sunday, April 17, 2011
Thursday, April 7, 2011
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ......आनंद द्विवेदी ०८/०३/२०११
कविता का शीर्षक हैं
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ......
क्रांति कर दिया हमने तो
अरे महिलाओं की बात कर रहा हूँ.....
एकदम बराबरी का दर्ज़ा दे दिया जी
कई कानून बना दिए इसके लिए
अब औरत को दहेज़ के लिए नहीं जलाया जा सकता
कार्यालयों में उसके साथ छेड़खानी नहीं की जा सकती
उसके कहीं आने जाने पर पाबन्दी नहीं है
और तो और ...
हमने सेनाओं में भी उसके लिए द्वार खोल दिया हैं
वगैरह वगैरह!
वो जरा सी अड़चन है नहीं तो
उसे ३० प्रतिशत आरक्षण भी देने वाले हैं 'हम '
दोस्तों!
न जाने क्यूँ मुझे लगता है
कि नाटक कर रहे हैं हम
बढती हुई नारी शक्ति से हतप्रभ हम
उसे किसी न किसी तरीके से
बहलाए रखना चाहते हैं...
उसे उसकी स्वाभाविक स्थिति से
आखिर कब तक रोकेंगे हम ...?
वो जाग गयी है अब
और हमने पुरुष होने का टप्पा बांधा हुआ है आँखों पर,
गुजारिश है कि अब हम
उसे कुछ और न ही दें तो अच्छा है.
वो वैसे ही बहुत कृतज्ञ है हमारी
हर जगह हमारी भूखी निगाहों से बचते हुए
बगल से निकल जाने पर बे वजह धक्का खाते हुए
बसों में ट्रेनों में ,
स्कूल जाते हुए, आफिस जाते हुए
बाज़ार जाते हुए,
"उधर से नहीं उधर सड़क सुनसान है "
जरा सा अँधेरा हो जाये तो ...
ऊपर से सामान्य पर अन्दर से कांपते हुए ...
वो हर समय
हमारी कृतज्ञता महसूस करती है...
अगर सच में हमें कुछ करना है
तो क्यूँ न हम यह करें ...कि
दाता होने का ढोंग छोड़ कर
उनसे कुछ लेने कि कोशिश करें
मन से उनको नेतृत्त्व सौप दें
कर लेने दें उन्हें अपने हिसाब से
अपनी दुनिया का निर्माण
तय कर लेने दें उन्हें अपने कायदे
छू लेने दें उन्हें आसमान
और हम उनके सहयात्री भर रहें ...
दोस्तों !
आइये ईमानदारी से इस विषय में सोंचें !!
----आनंद द्विवेदी ०८/०३/२०११
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Tuesday, April 5, 2011
टुकड़ा टुकड़ा आसमान
अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के लिये
मैने क़तरा क़तरा रंगों को संचित कर
एक मोहक तस्वीर बनानी चाही थी
तुमने तस्वीर पूरी होने से पहले ही
उसे पोंछ क्यों डाला माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने जीवन को सुख सौरभ से सुवासित करने के लिये
मैंने ज़र्रा ज़र्रा ज़मीन जोड़
सुगन्धित सुमनों के बीज बोये थे
तुमने उन्हें अंकुरित होने से पहले ही
समूल उखाड़ कर फेंक क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने नीरस जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिये
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?
साधना वैद
क्योंकि हमें जीना है
उनकी आज़ादी पर अब और चर्चा नहीं करनी
उनकी बेड़ियों की बात नहीं करनी
हमें अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसा कोई दिवस
नहीं मनाना
क्योंकि हमें जीना है
जैसे तुम जीते हो
तुम, जो स्त्री नहीं हो
और आधी आबादी
आधी दुनिया भी नहीं बनना हमें
हम पूरी हैं
जैसे एक पूरी गोल रोटी
क्या तुम आधी रोटी खाते हो बस
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Monday, March 21, 2011
मैं चुप नहीं रह पाऊँगी.
© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Saturday, March 19, 2011
खामोशी
खामोशी की जुबां कभी कभी
कितनी मुखर हो उठती है
मैंने उस कोलाहल को सुना है !
खामोशी की मार कभी कभी
कितनी मारक होती है
मैंने उसके वारों को झेला है !
खामोशी की आँच कभी कभी
कितनी विकराल होती है
मैंने उस ज्वाला में
कई घरों को जलते देखा है !
खामोशी के आँसू कभी कभी
कितने वेगवान हो उठते हैं
मैंने उन आँसुओं की
प्रगल्भ बाढ़ में
ना जाने कितनी
सुन्दर जिंदगियों को
विवश, बेसहारा बहते देखा है !
खामोशी का अहसास कभी कभी
कितना घुटन भरा होता है
मैंने उस भयावह
अनुभूति को खुद पर झेला है !
खामोशी इस तरह खौफनाक
भी हो सकती है
इसका इल्म कहाँ था मुझे !
मुझे इससे डर लगता है
और मैं इस डर की क़ैद से
बाहर निकलना चाहती हूँ ,
कोई अब तो इस खामोशी को तोड़े !
साधना वैद
होली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें !
Sunday, March 13, 2011
सोच रहा हैं अरुणा शानबाग का बिस्तर
मर तो तुम उस दिन ही गयी थी
जिस दिन एक दरिन्दे ने
तुम्हारा बलात्कार किया था
और तुम्हारे गले को बाँधा था
एक जंजीर से
जो लोग अपने कुत्ते के गले मे नहीं
उसके पट्टे मे बांधते हैं
उस जंजीर ने रोक दिया
तुम्हारे जीवन को वही
उसी पल मे
कैद कर दिया तुम्हारी साँसों को
जो आज भी चल रही हैं
उस जंजीर ने बाँध दिया तुमको एक बिस्तर से
और आज भी ३७ साल से वो बिस्तर ,
मै
तुम्हारा हम सफ़र बना
देख रहा हूँ तुम्हारी जीजिविषा
और सोच रहा हूँ
क्यूँ जीवन ख़तम हो जाने के बाद भी तुम जिन्दा हो ??
तुम जिन्दा हो क्युकी तुमको
रचना हैं एक इतिहास
सबसे लम्बे समय तक
जीवित लाश बन कर
रहने वाली बलात्कार पीड़िता का
उस पीडिता का जिसको
अपनी पीड़ा का कोई
एहसास भी नहीं होता
हो सकता हैं
कल तुम्हारा नाम गिनीस बुक मे
भी आजाये
क्यूँ चल रही हैं सांसे आज भी तुम्हारी
शायद इस लिये क्युकी
रचना हैं एक इतिहास तुम्हे
जहां अधिकार मिले
लोगो को अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने का
उस पीड़ा से जो वो महसूस भी नहीं करते
आज लोग कहते हैं
बेचारी बदकिस्मत लड़की के लिये कुछ करो
भूल जाते हैं वो कि
लड़की से वृद्धा का सफ़र
तुमने अपने बिस्तर के साथ
तय कर लिया हैं
काट लिया कहना कुछ ज्यादा बेहतर होता
कुछ लोग जीते जी इतिहास रच जाते हैं
कुछ लोग मर कर इतिहास बनाते हैं
और कुछ लोग जीते जी मार दिये जाते हैं
फिर इतिहास खुद उनसे बनता हैं
एक बिस्तर कि भी पीड़ा होती हैं
कब ख़तम होगी मेरी पीड़ा
अरुणा का बिस्तर सोच रहा हैं
और कामना कर रहा हैं
फिर किसी बिस्तर को न
बनना पडे
किसी बलात्कार पीड़िता
का हमसफ़र
लेकिन
बदकिस्मत एक बलात्कार पीड़िता नहीं होती हैं
बदकिस्मत हैं वो समाज जहां बलात्कार होता हैं
बड़ा बदकिस्मत हैं
ये भारत का समाज
जो बार बार संस्कार कि दुहाई देकर
असंस्कारी ही बना रहता हैं
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Saturday, March 12, 2011
कर्म भाग्य बनाता है. बेटों का भी , और बेटियों का भी
Wednesday, March 9, 2011
कविता पढिये जवाब खोजिये " नारी "
कविता के अंत मै एक प्रश्न हैं जो लाल अक्षरों से हैं । जवाब जितने मिलेगे उतना बढ़िया होगा । मुझे कविता ने छुआ । मेरा जवाब भी हैं पर सबसे अंत मै आयेगा । सो कविता पढिये जवाब खोजिये
jay ho ![part-3]
Tuesday, March 8, 2011
नारी तेरे रूप अनेक
ये रचना मेरी प्रथम काव्य संग्रह "स्वप्न मरते नहीं " से ली है
नारी निभा रही है हर जिम्मेवारी,
कैद ना करे इन्हें घर की चहारदीवारी,
कंधे से कंधा मिलाकर,
कम की है इसने,
पुरुषों की जिम्मेवारी,
जीवनसाथी बनकर,
पूरी करती अपनी हिस्सेदारी,
कभी रूप सलोना प्यारा लगे,
रहे शांत समुंद्र सी न्यारी,
अगर जरुरत पड़ जाये ,
ये बन जाये चिंगारी,
कभी दूध का क़र्ज़ निभाने को,
कभी माँ,बहू, बहन का फ़र्ज़ निभाने को,
पल पल पीसी जाती रही नारी,
हर कदम इम्तिहान से गुजरी ,
फिर भी उफ़ ना मुख से निकली,
ये तो महानता है इसकी,
जो दिखती नहीं इसकी बेकरारी,
आधा रूप बदला इसने जो,
समाज का अक्स सुधारी,
तुलना करोगे किससे ?
हर कुछ छोटा पड़ जायेगा.
ममता की गहराई मापने में ,
सागर भी बौना खुद को पायेगा.
ये अनमोल तोहफा है,
जो कुदरत ने दी है प्यारी,
हर मोड पर फिर क्यों ?
बुरी नज़रों का करना पड़ता है ,
सामना इसे करारी.
ये क्यों भूल जाते हो ?
तुम्हें संसार में लानेवाली भी,
है एक नारी.
चुटकी भर सिंदूर को ,
मांग में सजाती है,
उसका मोल चुकाने को,
कभी कभी ,
जिन्दा भी जल जाती है नारी.
हर जीवन पर करती अहसान,
फिर भी ना पा सकी सम्मान.
नारी निभा रही है हर जिम्मेवारी,
कैद ना करे इन्हें घर की चहारदीवारी.
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
jay ho ! [part-2]
''आओ करें वंदना हम उस देवी की
जिसकी नूतन दीपशिखा ने जग चमकाया ,
''alokita' 'anita '' या हो वो ' sangeeta '
सबकी नई ' serjana ' ने मन को है जीता ,
'priyanka 'ने लेखन से की है 'pooja '
''monika ''की पवित्र लेखनी करे अजूबा ,
''veena '' और ''lata '' ने सबका मन हर्षाया .
अपनी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मन वाया .
'नारी मुक्ति -''asha '' ने फैलाई ''roshi'नी
सतत-'sadhna' लीन ''ajit' 'shalini'
'anshumala' 'anu ' बढाती चिटठा''garima '' ,
'manvindar' -'padma' के संग संग चले 'neelima'
हर ''deep 'की 'mala 'ने फिजाओं को महकाया .
अपनी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाया .
[कविता में प्रयुक्त महिला -चिट्ठाकारों के ब्लॉग पर जाकर उनका उत्साहवर्धन करें ]
'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें '
''जय हो !''
लेखिका -shikha kaushik
सहायिका -shalini kaushik
[जारी...........]
Sunday, March 6, 2011
जय हो ! [भाग-१ ]
-उसकी तारीफ में बस एक ही भाव मन में उमड़ आता है -''जय हो ''.
इसी भाव को लेकर मैंने यह पोस्ट तैयार की है
आशा है आप सभी इसकी दिल से सराहना करेंगे .----
''आओ करें ''vandana ''
हम उस ''devi'' की ;
''जिसकी ''nutan'' दीप
''shikha'' ने जग चमकाया ,
''mamta''मय''''preeti''मय
प्रभु की इस ''rachna'' ने ;
अपनी अद्भुत ''pratibha'' का लोहा मनवाया .''
''sharad'' 'shashi' की 'rashmi' से शीतलता फैली ;
'poonam' की 'rajani' आई सज नई-नवेली ,
अच्छे लेखों से ज्ञान की ''rekha''खीची'' ;
सुन्दर 'kavita' से भावों की क्यारी सीचे ;
[लिंक में दिए गए नामों पर जाकर महिला चिट्ठाकारों का उत्साहवर्धन करें क्योंकि ये सभी नाम महिला चिट्ठाकारों के हैं]
लेखिका-शिखा कौशिक
सहायिका-शालिनी कौशिक
[जारी.........]
Monday, February 28, 2011
नारी कविता ब्लॉग पर केवल नारी आधरित विषयों पर ही कविता पोस्ट करे अन्यथा हटानी पड़ती हैं
Tuesday, February 22, 2011
नारी जो कभी न हारी..
Saturday, February 19, 2011
बोलता प्रश्न
क्यों नहीं है उसको
बोलने का अधिकार
या फिर अपनी बात को
कहने का अधिकार,
क्यों नहीं है अपनी पीड़ा को
बाँटने का अधिकार,
क्यों नहीं है
ग़लत को ग़लत
कहने का अधिकार !
क्यों चारों ओर उसके
लगा दी जाती है
कैक्टस की बाड़
क्यों कर दिया जाता है खामोश
क्यों नहीं बोलने दिया जाता उसे ?
यह प्रश्न अनवरत
उठता रहता है मन में,
बिजली- सी कौंधती रहती है
मस्तिष्क में,
बचपन से अब तक
कभी भी अपनी बात को
निर्द्वंद्व होकर कहने की
हिम्मत नहीं जुटा पाई है वह ।
जब भी कुछ कहने का
करती है प्रयास
मुँह खोलने का
करती है साहस
वहीं लगा दिया जाता है
चुप रहने का विराम ।
आठ की अवस्था हो
या फिर साठ की
वही स्थिति, वही मानसिकता
आखिर किससे कहे
अपनी करुण-कथा
और किसको सुनाए
अपनी गहन व्यथा ।
जन्म लेते ही
समाज द्वारा तिरस्कार
पिता से दुत्कार
फिर भाइयों के
गुस्से की मार
ससुराल में
पति के अत्याचार
सास-ननद के
कटाक्षों के वार
वृद्धावस्था में
बेटे की फटकार
बहू का विषैला व्यवहार
सब कुछ सहते-सहते
टूट जाती है वह,
क्योंकि उसे तो
मिले हैं विरासत में
सब कुछ सहने
और
कुछ न कहने के संस्कार ।
यदि ऐसा ही रहा
समाज का बर्ताव
मिलते रहे
उसे घाव पर घाव,
ऐसी ही रही चुप्पी
चारों ओर
तो शायद मन की घुटन
तोड़ देगी अंतर्मन को
अंदर-ही-अंदर,
फैलता रहेगा विष
घुटती रहेंगी साँसें
टूटती रहेंगी आसें
तो जिस बात को
वह करना चाहती है
अभिव्यक्त
वह उसके साथ ही
चली जाएगी,
फिर इसी तरह
घुटती रहेंगी बेटियाँ,
ऐसे ही टूटता रहेगा
उनका तन और मन,
होते रहेंगे अत्याचार
होती रहेंगी वे समाज की
घिनौनी मानसिकता का शिकार ।
कब बदलेगा समय,
जब समाज के
कथित ठेकेदार
समाज की चरमराई
सड़ी-गली व्यवस्था को
मजबूती देने के लिए
आगे आएँगे,
क़दम बढ़ाएँगे,
कब आएगा वह दिन
जब नारी की बात
उसकी पीड़ा,उसकी चुभन,
उसके मन का संत्रास
समझेगा यह समाज,
विश्वास है उसे
कि वह दिन आएगा
जरूर आएगा ।
2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
डॉ.मीना अग्रवाल
.
Sunday, February 13, 2011
मेरी बेटी
वो सदा पहचान जाती मेरी आहट क्या कहूँ !
एक पल भी दूर उससे रह नहीं सकती हूँ मैं
गोद में ही लेते उसको मिलती राहत क्या कहूँ !
देखते ही स्नेह से चूम लेती उसको मै
मखमली बाँहों से उसका घेर लेना क्या कहूँ !
उसकी किलकारी मेरे कानों में अमृत घोलती
माँ! मुझे कहकर के उसका खिलखिलाना क्या कहूँ !
वो मेरी बेटी ,मेरा सर्वस्व ,मेरी जिन्दगी
है मेरे वो दिल की धड़कन और ज्यादा क्या कहूँ !
Friday, February 11, 2011
बधाई हो घर में लक्ष्मी आई है
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Wednesday, February 2, 2011
हाँ , तुम नारी हो , तो ??
क्यो तुम जूझती रहीं
क्यो तुम चाहती रही
बदलना मानसिकता औरो की
क्या फरक हैं फिर तुममे और उनमे
मत जुझो , मत लडो
मत और समय अपना बरबाद करो
मत बदलो किसी की मानसिकता
हो सके तो बदलो अपनी मानसिकता
जियो उस स्वतंत्रता को जो
ईश्वरिये देन हैं ,
जो नहीं कोई और तुम्हे देगा
नारी हो नारी ही बन कर रहो
प्यासी हो तो पानी पीयो
भूखी हो तो खाना खाओ
पर मत लडो , मत जुझो
और नारी होने के एहसास से सम्पूर्णता पाओ
अधूरी तुम नहीं हो , क्योंकी तुम जिनसे लड़ती हो
उनके अस्तिव की तुम ही तो जननी हो
तुम ख़ुद आक्षेप और अवेहलना करती हो
अपनी इच्छाओं की ,
कब तक अपनी कमियों का दोष
दूसरो पर डालोगी
समय जो बीत जाता है लौट कर नहीं आता है
Tuesday, February 1, 2011
अब चौखट के बाहर आना है !
लिंग भेद की सलाखों को मरोड़कर ,
सोयी आत्मशक्ति को जगा कर ,
दिमाग की बंद खिड़की खोलकर ,
हे स्त्री ! तुझको अब चौखट के बाहर आना है ,
पुरुष समान जग में सम्मान पाना है ।
********************************
जला देनी है वे किताबें ;जो कहती है
तुम कोमल ,निर्बल और कमजोर हो ,
तुम कली नहीं ;तुम फूल नहीं ;
तुम प्रस्तर सम कठोर हो ,
आंसू से नम इन पलकों को बस लक्ष्य पर टिक जाना है ,
हे स्त्री !तुझको अब चौखट के बाहर आना है ।
*****************************************
पुरुष बैसाखी ने तेरी चलने की ताकत छीनी है ,
तन की सुन्दरता में उलझा ;मन की शक्ति हर लीनी है ,
नैनों के तीर नहीं ;तुझको प्रज्ञा का बल दिखलाना है ।
हे स्त्री !तुझको अब चौखट के बाहर आना है ।
******************************************
Monday, January 31, 2011
सूचना
इस ब्लॉग को नारी आधरित विषयों पर लिखी कविता के लिये ही बनाया हैं
सादर
रचना
सूत्रधार नारी कविता ब्लॉग
Tuesday, January 18, 2011
स्त्री होने का सुख
परिणिता से मातृत्व की
देखती थी जब,
तो गर्व होता था
स्वयं के होने को
स्त्री का,
किंतु आज
जब मैं खोजती हूँ
हर स्त्री मैं
नैसेर्गिक सुंदरता
करुणा-शील-धेर्य का स्पंदन,
तो पाती हूँ
एक कृत्रिमता
निर्जीव सी तस्वीर नज़र आती हैं
अर्धनग्न ओर कुत्सित भी,
सोचती हूँ
समानता का अधिकार
पुरुष से मेरा संबल हैं
या मेरा विकार,
मैं तो श्रेष्ठा थी
दिग दिगान्तर से,
पूज्यनीय भी
पुरुष द्वारा ओर
समाज द्वारा भी,
ओर समानता का
बस मैं सीट ओर टिकट
शारीरिक हो केवल
बौद्धिक ना हो जैसे,
समानता तो तब हैं की
मैं बस स्टाप से अकेले
घर तक आ पाऊ
बिना किसी की
चुभती आँखो का सामना किए ,
जब मैं चुन सकु अपना सत्व
सामाजिकता की परिधि मैं,
चुनाव ही तो हैं
हे राम !!
सीता होने का दर्शन
तो तुमने मुझे दिया था
पर उर्मिला होने का धेर्य तो
मैने खुद ही चुना था,
ओर मेरे लिए तो
ये भी बहुत हैं
की वो कहें किसी दिन
प्रिय
आज तुम उनिग्ध सी हो
.
उठों मत
.
.
लो ...
आज
चाय
मैने बनाई हैं ...........!!!!
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Wednesday, January 12, 2011
मै नारी हूँ ....
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Tuesday, January 11, 2011
कन्या भ्रूण हत्या को मना कीजिये...
साँस थी महक गयी,
धीरे से जब मुस्कुराई ;
मोती से झोली भर गयी।
माँ कहा जब प्यार से;
मुझको तो जन्नत मिल गयी।
ऊँगली पकड़ कर जब चली;
खुशियाँ ही खुशियाँ छा गयी।
है मुझे गर्व खुद पर;
था लिया निर्णय सही।
भ्रूण हत्या को किया था;
दृढ़ता से मैंने नहीं।
जो कहीं कमजोर पड़कर;
दुष्कर्म मैं ये कर जाती;
फिर ये नन्ही सी कली ,
कैसे मेरे घर आ पाती?
ये महकेगी,ये चहकेगी,
सारे घर की रौनक होगी।
मेरी बिटिया की किलकारी;
पूरी दुनिया में गूंजेगी.
Monday, January 3, 2011
माँ की बात
बिट्टो तूने आकर घर में भर दी मेरी झोली,
माँ के मुहं से ऐसा सुनकर खिल गया मेरा जीवन,
अब सुन्दर मनभावन लगता अपने घर का आँगन,
माँ से ऐसी बात सुनकर मन मेरा लगा नाचने,
नए ख्याल अनोखे सपने आँखों में लगे आने ,
माँ ने ऐसी बात है कह दी सार्थक हुई ज़िन्दगी,
अपने पैरों पर खडी हों सपने उनके पूर्ण करूंगी.
Friday, December 31, 2010
मंगलमय हो यह नव-वर्ष!
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!




