सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Wednesday, June 29, 2011

सृष्टि में एक नारी,





धरती पर जीवन रचने की भावना जब आई 
तब प्रभु ने औजार छोड़कर तूलिका उठाई.
सेवक ने तब प्रभु से पूछा ऐसे क्या रचोगे,
औजारों का काम आप इससे कैसे करोगे?
बोले प्रभु मुझको है बनानी सृष्टि में एक नारी,
कोमलता के भाव बना न सकती कोई आरी.
पत्थर पर जब मैं हथोडी से वार कई करूंगा,
ऐसे दिल में प्यार के सुन्दर भाव कैसे भरूँगा?
क्षमा करुणा भाव हैं ऐसे उसमे तभी ये आयेंगे,
जब रंगों के संग सिमट कर उसके मन बस जायेंगे.
इसीलिए अपने हाथों में तूलिका को थामा,
पहनाने दे अब मेरी योजना को अमली जामा. 
            शालिनी कौशिक 

Saturday, June 4, 2011

बलात्कार के बाद का बलात्कार .कविता केसर क्यारी ....उषा राठौड़


केसर क्यारी ....उषा राठौड की कविता

बलात्कार के बाद का बलात्कार

मेरी एक नन्ही सी नादानी की इतनी बड़ी सजा ?
डग भरना सिख रही थी,
भटक कर रख दिया था वो कदम
बचपन के आँगन से बाहर ...
जवानी तक तो मै पहुंची भी नहीं थी कि
तुमने झपट्टा मार लिया उस भूखे गिद्ध की मानिंद
नोच लिए मेरे होंसलों के पंख
मरे सीने का तो मांस भी भरा नहीं था कि
तुमको मांसाहारी समझ के छोड़ दूं
टुकड़ों मे काट दिया है तुमने मेरी जिंदगी को
अब ना समेट पाऊँगी
अपनी नन्ही हथेलियों से
मेरे मुंह पर रख के हाथ जितना जोर से दबाया था
काश एक हाथ मेरे गले पे होता तुम्हारा
तो ये अनगिनित निगाहे यूं ना करती आज मेरा
बलात्कार के बाद का बलात्कार .



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Sunday, May 15, 2011

कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??

देश को आजाद हुए , होगये है वर्ष साठ
पर आज भी जब बात होती है बराबरी कि
तो मुझे आगे कर के कहा जाता है
लो ये पुरूस्कार तुम्हारा है
क्योंकी तुम नारी हो ,
महिला हो , प्रोत्साहन कि अधिकारी हो
देने वाले हम है , आगे तुम्हे बढाने वाले भी हम है
मजमा जब जुडेगा , फक्र से हम कह सकेगे
ये पुरूस्कार तो हमारा था
तुम नारी थी , अबला थी , इसलिये तुम को दिया गया
फिर कुछ समय बाद , हमारी भाषा बदल जायेगी
हम ना सही , कोई हम जैसा ही कहेगा
नारियों को पुरूस्कार मिलता नहीं दिया जाता है
दिमाग मे बस एक ही प्रश्न आता
और
कब तक मेरे किये हुए कामो को मेरी उपलब्धि नहीं माना जाएगा ??
Link
और
कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??



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Wednesday, May 11, 2011

माँ

रचना जी,

मैंने "माँ" विषय पर एक कविता लिखी है, अगर नारी की कविता ब्लॉग के लिए यह उपयुक्त हो तो मैं आप सबसे साझा करना चाहूँगा |


माँ

जीवन की रेखा की भांति जिसकी महत्ता होती है,

दुनिया के इस दरश कराती, वह तो माँ ही होती है |


खुद ही सारे कष्ट सहकर भी, संतान को खुशियाँ देती है,

गुरु से गुरुकुल सब वह बनती, वह तो माँ ही होती है |

जननी और यह जन्भूमि तो स्वर्ग से बढ़कर होती है,

पर थोडा अभिमान न करती, वह तो माँ ही होती है |


"माँ" छोटा सा शब्द है लेकिन, व्याख्या विस्तृत होती है,

ममता के चादर में सुलाती, वह तो माँ ही होती है |

संतान के सुख से खुश होती, संतान के गम में रोती है,

निज जीवन निछावर करती, वह तो माँ ही होती है |

शत-शत नमन है उस जीवट को, जो हमको जीवन देती है,

इतना देकर कुछ न चाहती, वह तो माँ ही होती है |


Thank you
Pradip Kumar
(9006757417)



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गृहणी

मैंने उसे देखा है

मौन की ऊँची-ऊँची दीवारों से घिरी

सपाट भावहीन चेहरा लिये वह

चुपचाप गृह कार्य में लगी होती है

उसके खुरदुरे हाथ यंत्रवत कभी

सब्जी काटते दिखाई देते हैं ,

कभी कपड़े निचोड़ते तो

कभी विद्युत् गति से बच्चों की

यूनीफ़ॉर्म पर प्रेस करते !

उसकी सूखी आँखों की झील में

पहले कभी ढेर सारे सपने हुए करते थे ,

वो सपने जिन्हें अपने विवाह के समय

काजल की तरह आँखों में सजाये

बड़ी उमंग लिये अपने पति के साथ

वह इस घर में ले आई थी !

साकार होने से पहले ही वे सपने

आँखों की राह पता नहीं

कब, कहाँ और कैसे बह गये और

उसकी आँखों की झील को सुखा गये

वह जान ही नहीं पाई !

हाँ उन खण्डित सपनों की कुछ किरचें

अभी भी उसकी आंखों में अटकी रह गयी हैं

जिनकी चुभन यदा कदा

उसकी आँखों को गीला कर जाती है !

कस कर बंद किये हुए उसके होंठ

सायास ओढ़ी हुई उसकी खामोशी

की दास्तान सुना जाते हैं ,

जैसे अब उसके पास किसीसे

कहने के लिये कुछ भी नहीं बचा है ,

ना कोई शिकायत, ना कोई उलाहना

ना कोई हसरत, ना ही कोई उम्मीद ,

जैसे उसके मन में सब कुछ

ठहर सा गया है, मर सा गया है !

उसे सिर्फ अपना धर्म निभाना है ,

एक नीरस, शुष्क, मशीनी दिनचर्या ,

चेतना पर चढ़ा कर्तव्यबोध का

एक भारी भरकम लबादा ,

और उसके अशक्त कन्धों पर

अंतहीन दायित्वों का पहाड़ सा बोझ ,

जिन्हें उसे प्यार, प्रोत्साहन, प्रशंसा और

धन्यवाद का एक भी शब्द सुने बिना

होंठों को सिये हुए निरंतर ढोये जाना है ,

ढोये जाना है और बस ढोये जाना है !

यह एक भारतीय गृहणी है जिसकी

अपनी भी कोई इच्छा हो सकती है ,

कोई ज़रूरत हो सकती है ,

कोई अरमान हो सकता है ,

यह कोई नहीं सोचना चाहता !

बस सबको यही शिकायत होती है

कि वह इतनी रूखी क्यों है !


साधना वैद



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Sunday, May 8, 2011

कशमकश



तब नहीं जानती थी मैं 
कि क्यों रोकती है मुझे अम्मी 
दुहाई दे दे कर जमाने की.

क्यों नहीं  खेलने देती मुझे 
हमसायों के संग 
देर तक अकेले में.

अब ,जब मैं 
स्वयं पहुंच गयी हूँ 
अम्मी की उम्र तक. 
और जान गयी हूँ 
उन दुहाइओं  का सच. 

और समझाना चाहती हूँ
अपनी मासूम कली को
तो वो भी
 नहीं  समझ पा रही मेरी बात.

वो भी पूछती है मुझसे
वही सवाल
जो तब 
मैं अपनी अम्मी से पूछती थी.

और अब 
मैं भी जूझती हूँ 
उसी कशमकश से, 
जिससे कभी 
मेरी अम्मी जूझती थी.


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Saturday, April 30, 2011

द्रौपदी


 एक नारी के मन की -
व्यथा हो तुम 
धूलिसात अभिमान  का 
प्रतीक हो तुम 
रिश्तों में छली गयी 
नारी हो तुम 
पर निष्ठुर  भाग्य को धता 
देती हो तुम 
अंतस  की  पीड़ा  का 
आख्यान हो तुम
द्युतक्रीडा के परिणाम का 
व्याख्यान हो तुम 
भक्ति की पराकाष्ठा  को 
छूती हो तुम  
एक अबला की सबल -
गाथा हो तुम 
मर्यादित रिश्तों की 
भाषा हो तुम 
एक सुलझी हुई नारी की 
पहचान हो तुम 

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Tuesday, April 19, 2011

हे पुरुष !


पौरूष तुम्हारा
तुम्हारे चौड़े कंधो में नही
तुम्हारी बांहों के मज़बूत घेरे में है
पौरूष तुम्हारा
तुम्हारी गंभीर ऊँची आवाज़ में नही
तुम्हारे मीठे स्वर में है
पौरूष तुम्हारा
तुम्हारे बाहरी कर्म क्षेत्र के सम्मान में नही
घर में सम्मानित होने में भी है
पौरूष तुम्हारा
तुम्हारे अनगिनत दोस्तों में नही
अपने बच्चों के दोस्त होने में भी है ...
पौरूष तुम्हारा
तुम्हारे क्रूर होने में नही
तुम्हारे दया से भरपूर स्पर्श में है
पौरूष तुम्हारा
नारी को नर से नीचा दिखाने में नही
उसे मानव सा मान समान समझने में है...
पौरूष तुम्हारा
तुम्हारे अहम् दिखाने में नही
सागर से विशाल हृदय को दिखाने में है....


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Sunday, April 17, 2011

स्त्रियां
बांटती हैं दर्द
एक दूसरे का
बतियाती हैं अपने दुख
दबी-दबी आवाज़ में
अगल-बगल रखी कुर्सियां भी न सुन लें
फुसफुसाती हैं
आंखों से बरसते बादल को
बार-बार पोंछती हैं
मन ही मन फुंफकारती भी हैं
और फिर जुट जाती हैं
रोज़ के अपने काम में


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Thursday, April 7, 2011

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ......आनंद द्विवेदी ०८/०३/२०११

आज कि कविता अतिथि कवि कि हैं । कवि का नाम हैं आनंद द्विवेदी हैं
कविता का शीर्षक हैं

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ......


क्रांति कर दिया हमने तो
अरे महिलाओं की बात कर रहा हूँ.....
एकदम बराबरी का दर्ज़ा दे दिया जी
कई कानून बना दिए इसके लिए
अब औरत को दहेज़ के लिए नहीं जलाया जा सकता
कार्यालयों में उसके साथ छेड़खानी नहीं की जा सकती
उसके कहीं आने जाने पर पाबन्दी नहीं है
और तो और ...
हमने सेनाओं में भी उसके लिए द्वार खोल दिया हैं
वगैरह वगैरह!
वो जरा सी अड़चन है नहीं तो
उसे ३० प्रतिशत आरक्षण भी देने वाले हैं 'हम '
दोस्तों!
न जाने क्यूँ मुझे लगता है
कि नाटक कर रहे हैं हम
बढती हुई नारी शक्ति से हतप्रभ हम
उसे किसी न किसी तरीके से
बहलाए रखना चाहते हैं...
उसे उसकी स्वाभाविक स्थिति से
आखिर कब तक रोकेंगे हम ...?
वो जाग गयी है अब
और हमने पुरुष होने का टप्पा बांधा हुआ है आँखों पर,
गुजारिश है कि अब हम
उसे कुछ और न ही दें तो अच्छा है.
वो वैसे ही बहुत कृतज्ञ है हमारी
हर जगह हमारी भूखी निगाहों से बचते हुए
बगल से निकल जाने पर बे वजह धक्का खाते हुए
बसों में ट्रेनों में ,
स्कूल जाते हुए, आफिस जाते हुए
बाज़ार जाते हुए,
"उधर से नहीं उधर सड़क सुनसान है "
जरा सा अँधेरा हो जाये तो ...
ऊपर से सामान्य पर अन्दर से कांपते हुए ...
वो हर समय
हमारी कृतज्ञता महसूस करती है...


अगर सच में हमें कुछ करना है
तो क्यूँ न हम यह करें ...कि
दाता होने का ढोंग छोड़ कर
उनसे कुछ लेने कि कोशिश करें
मन से उनको नेतृत्त्व सौप दें
कर लेने दें उन्हें अपने हिसाब से
अपनी दुनिया का निर्माण
तय कर लेने दें उन्हें अपने कायदे
छू लेने दें उन्हें आसमान
और हम उनके सहयात्री भर रहें ...
दोस्तों !
आइये ईमानदारी से इस विषय में सोंचें !!

----आनंद द्विवेदी ०८/०३/२०११




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Tuesday, April 5, 2011

टुकड़ा टुकड़ा आसमान

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अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के लिये
मैने क़तरा क़तरा रंगों को संचित कर
एक मोहक तस्वीर बनानी चाही थी
तुमने तस्वीर पूरी होने से पहले ही
उसे पोंछ क्यों डाला माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने जीवन को सुख सौरभ से सुवासित करने के लिये
मैंने ज़र्रा ज़र्रा ज़मीन जोड़
सुगन्धित सुमनों के बीज बोये थे
तुमने उन्हें अंकुरित होने से पहले ही
समूल उखाड़ कर फेंक क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने नीरस जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिये
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?

साधना वैद

क्योंकि हमें जीना है

हमें नहीं छापनी ख़बरें औरतों पर ज़ुल्म की
उनकी आज़ादी पर अब और चर्चा नहीं करनी
उनकी बेड़ियों की बात नहीं करनी
हमें अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसा कोई दिवस
नहीं मनाना
क्योंकि हमें जीना है
जैसे तुम जीते हो
तुम, जो स्त्री नहीं हो
और आधी आबादी
आधी दुनिया भी नहीं बनना हमें
हम पूरी हैं
जैसे एक पूरी गोल रोटी
क्या तुम आधी रोटी खाते हो बस

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Monday, March 21, 2011

मैं चुप नहीं रह पाऊँगी.

सदियों  सहन करती  आई  हूँ  तुम्हें !
सदियों वहन  भी करती जाऊँगी (कोख  में)  .

पर अगर तुम यह सोचो                
कि यह दहन- प्रक्रिया भी     
 जारी रहेगी 
यूँ ही सदियों तक. 

तो मैं चुप नहीं रह पाऊँगी.

तब सहन को भूल,
वहन को त्याग 
मैं दहन के विरुद्ध 
आवाज़ उठाऊंगी.

हाँ ! 
मैं दहन के विरुद्ध 
आवाज़ उठाऊंगी.


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Saturday, March 19, 2011

खामोशी

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खामोशी की जुबां कभी कभी
कितनी मुखर हो उठती है
मैंने उस कोलाहल को सुना है !
खामोशी की मार कभी कभी
कितनी मारक होती है
मैंने उसके वारों को झेला है !
खामोशी की आँच कभी कभी
कितनी विकराल होती है
मैंने उस ज्वाला में
कई घरों को जलते देखा है !
खामोशी के आँसू कभी कभी
कितने वेगवान हो उठते हैं
मैंने उन आँसुओं की
प्रगल्भ बाढ़ में
ना जाने कितनी
सुन्दर जिंदगियों को
विवश, बेसहारा बहते देखा है !
खामोशी का अहसास कभी कभी
कितना घुटन भरा होता है
मैंने उस भयावह
अनुभूति को खुद पर झेला है !
खामोशी इस तरह खौफनाक
भी हो सकती है
इसका इल्म कहाँ था मुझे !
मुझे इससे डर लगता है
और मैं इस डर की क़ैद से
बाहर निकलना चाहती हूँ ,
कोई अब तो इस खामोशी को तोड़े !

साधना वैद
होली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें !

Sunday, March 13, 2011

सोच रहा हैं अरुणा शानबाग का बिस्तर

अरुणा
मर तो तुम उस दिन ही गयी थी
जिस दिन एक दरिन्दे ने
तुम्हारा बलात्कार किया था
और तुम्हारे गले को बाँधा था
एक जंजीर से
जो लोग अपने कुत्ते के गले मे नहीं
उसके पट्टे मे बांधते हैं

उस जंजीर ने रोक दिया
तुम्हारे जीवन को वही
उसी पल मे
कैद कर दिया तुम्हारी साँसों को
जो आज भी चल रही हैं

उस जंजीर ने बाँध दिया तुमको एक बिस्तर से
और आज भी ३७ साल से वो बिस्तर ,
मै
तुम्हारा हम सफ़र बना
देख रहा हूँ तुम्हारी जीजिविषा
और सोच रहा हूँ

क्यूँ जीवन ख़तम हो जाने के बाद भी तुम जिन्दा हो ??

तुम जिन्दा हो क्युकी तुमको
रचना हैं एक इतिहास
सबसे लम्बे समय तक
जीवित लाश बन कर
रहने वाली बलात्कार पीड़िता का
उस पीडिता का जिसको
अपनी पीड़ा का कोई
एहसास भी नहीं होता

हो सकता हैं
कल तुम्हारा नाम गिनीस बुक मे
भी आजाये

क्यूँ चल रही हैं सांसे आज भी तुम्हारी
शायद इस लिये क्युकी
रचना हैं एक इतिहास तुम्हे

जहां अधिकार मिले
लोगो को अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने का
उस पीड़ा से जो वो महसूस भी नहीं करते



आज लोग कहते हैं
बेचारी बदकिस्मत लड़की के लिये कुछ करो
भूल जाते हैं वो कि
लड़की से वृद्धा का सफ़र
तुमने अपने बिस्तर के साथ
तय कर लिया हैं
काट लिया कहना कुछ ज्यादा बेहतर होता

कुछ लोग जीते जी इतिहास रच जाते हैं
कुछ लोग मर कर इतिहास बनाते हैं
और कुछ लोग जीते जी मार दिये जाते हैं
फिर इतिहास खुद उनसे बनता हैं



एक बिस्तर कि भी पीड़ा होती हैं
कब ख़तम होगी मेरी पीड़ा
अरुणा का बिस्तर सोच रहा हैं
और कामना कर रहा हैं
फिर किसी बिस्तर को न
बनना पडे
किसी बलात्कार पीड़िता
का हमसफ़र



लेकिन
बदकिस्मत एक बलात्कार पीड़िता नहीं होती हैं
बदकिस्मत हैं वो समाज जहां बलात्कार होता हैं

बड़ा बदकिस्मत हैं
ये भारत का समाज
जो बार बार संस्कार कि दुहाई देकर
असंस्कारी ही बना रहता हैं




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Saturday, March 12, 2011

कर्म भाग्य बनाता है. बेटों का भी , और बेटियों का भी

एक वक़्त था,
जब मेरे जन्म पर,
तुमने कहा था,
कुल्क्छिनी,
आते ही ,
भाई को खा गयी.
माँ तेरे ये बात ,
मेरे बाल मन
पर घर कर गए.
मेरा बाल मन रहने लगा ,
अपराध बोध,
पलने लगे कुछ विचार,
क्या करूँ ऐसा?
जिससे तेरे मन से ,
मिटा सकूँ मै,
वो विचार,
जिससे कम कर सकूँ,
तुम्हारे,
मन के अवसाद को.
वक़्त गुजरते गए,
ज़ख्म भी भरते गए,
फिर आया ,
एक ऐसा वक़्त,
जब तुमने ही कहा ,
बेटियां कहाँ पीछे हैं ,
बेटों से.
वो तो दोनों कुल का,
मान बढाती हैं,
माँ ,
शायद तुम्हे भी ,
अहसास हो गया,
क़ि जन्म नहीं ,
कर्म भाग्य बनाता है.
बेटों का भी ,
और बेटियों का भी.
" रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

Wednesday, March 9, 2011

कविता पढिये जवाब खोजिये " नारी "

ये कविता अतिथि कवि कि पोस्ट के तेहत पोस्ट कर रही हूँ । कविता चैतन्य आलोक जी कि हैं
कविता के अंत मै एक प्रश्न हैं जो लाल अक्षरों से हैं । जवाब जितने मिलेगे उतना बढ़िया होगा । मुझे कविता ने छुआ । मेरा जवाब भी हैं पर सबसे अंत मै आयेगा । सो कविता पढिये जवाब खोजिये

नारी




वो मेरी तुमसे पहली पहचान थी
जब मैं जन्मा भी न था
मैं गर्भ में था तुम्हारे
और तुम सहेजे थीं मुझे.

फिर मृत्यु सी पीड़ा सहकर भी
जन्म दिया तुमने मुझे
सासें दीं, दूध दिया, रक्त दिया तुमने मुझे.

और जैसे तुम्हारे नेह की पतवार
लहर लहर ले आयी जीवन में

तुम्हारी उंगली को छूकर
तुमसे भी ऊँचा होकर
एक दिन अचानक
तुमसे अलग हो गया मैं.

और जिस तरह नदी पार हो जाने पर
नाव साथ नहीं चलती
मुझे भी तुम्हारा साथ अच्छा नहीं लगता था
तुम्हारे साथ मैं खुद को दुनिया को बच्चा दिखता था.

बचपन के साथ तुम्हें भी खत्म समझ लिया मैने
और तब तुम मेरे साथ बराबर की होकर आयीं थीं..

बादलों पर चलते
ख्याब हसीं बुनते
हम कितना बतियाते थे चोरी के उन लम्हों में
दुनिया भर की बातें कर जाते थे

मै तुम पर कविता लिखता था
खुद को “पुरूरवा”
तुम्हें “उर्वशी” कहता था.

और जैसा अक्सर होता है
फिर एक रोज़
तुम्हारे “पुरूरवा” को भी ज्ञान प्राप्त हो गया
वो “उर्वशी” का नहीं लक्ष्मी का दास हो गया

मेरी कीमत लगी दहेज़ के बाज़ार में
और बिक गया मैं
ढेर सारे रुपयों के लिये

तुम फिर आयीं मेरे जीवन में
मैने फिर तुम्हारा साथ पाया

वह तुम्हारा समर्पण ही था
जिसने चारदीवारी को घर बना दिया
पर व्यवहार कुशल मैं
सब जान कर भी खामोश रह गया

और उन्मादी रातों में
तुम जब नज़दीक होती
यह “पुरूरवा”, “वात्सायन” बन जाता
खेलता तुम्हारे शरीर से और रह जाता था अछूत
तुम्हारी कोरी भावनाऑ से

सोचता हूं ?
इस पूरी यात्रा में
तुम्हें क्या मिला
क्या मिला

एक लाल
और फिर यही सब .....

और जब तुमने लाली को जना था
तो क्यों रोयीं थीं तुम
क्यों रोयीं थीं???

jay ho ![part-3]

ब्लॉग जगत में महिला चिट्ठाकारों की संख्या दिनोदिन बढ़ रही है .आशा है कि सभी महिला चिट्ठाकार अपने सार्थक लेखन से चिट्ठाजगत को ऐसे ही समृद्ध करती रहेंगी -

''आओ करें वंदना उस देवी की
जिसकी नूतन दीपशिखा ने जग-चमकाया .

आज देख 'asha ' का 'savita'
'ada' -'sada' हैं अति 'mudita ',
उधर 'purnima' बिखराती 'jyotsna'
'deepti'पूर्ण हो रही है 'meena',
'kshama' -'anupma' करती हैं चिट्ठों की 'archna'
'meenakshi'-'' के चिट्ठें 'divya'-'nirmala',
'शिखा'-'शालिनी' की है कामना दूर सभी भय हो ,
बढें सफलता -पथ  पर  हम 
   '''नारी की जय हो !'' 
[कविता में वर्णित महिला चिट्ठाकारों के ब्लॉग पर जाकर उन्हें उत्साह वर्धन करें .हम प्रोफाइल पर जाकर चिट्ठाकार द्वारा बनाये   गए ब्लॉग में से किसी भी एक ब्लॉग का लिंक यहाँ दे रहें हैं .यदि कोई त्रुटि रह जाये तो हम क्षमाप्रार्थी   है .इसे अन्यथा न लें .हमारा उदेश्य महिला चिट्ठाकारों के नाम से चिट्ठाजगत को परिचित कराना मात्र है .जो भी त्रुटि हो टिप्पणी के माध्यम से बताएं .]
 लेखिका-shikha kaushik
सहायिका- shalini kaushik .

Tuesday, March 8, 2011

नारी तेरे रूप अनेक


महिला दिवस पर समस्त नारी जाति को हार्दिक शुभकामनायें .............

ये रचना मेरी प्रथम काव्य संग्रह "स्वप्न मरते नहीं " से ली है


नारी निभा रही है हर जिम्मेवारी,
कैद ना करे इन्हें घर की चहारदीवारी,
कंधे से कंधा मिलाकर,
कम की है इसने,
पुरुषों की जिम्मेवारी,
जीवनसाथी बनकर,
पूरी करती अपनी हिस्सेदारी,
कभी रूप सलोना प्यारा लगे,
रहे शांत समुंद्र सी न्यारी,
अगर जरुरत पड़ जाये ,
ये बन जाये चिंगारी,
कभी दूध का क़र्ज़ निभाने को,
कभी माँ,बहू, बहन का फ़र्ज़ निभाने को,
पल पल पीसी जाती रही नारी,
हर कदम इम्तिहान से गुजरी ,
फिर भी उफ़ ना मुख से निकली,
ये तो महानता है इसकी,
जो दिखती नहीं इसकी बेकरारी,
आधा रूप बदला इसने जो,
समाज का अक्स सुधारी,
तुलना करोगे किससे ?
हर कुछ छोटा पड़ जायेगा.
ममता की गहराई मापने में ,
सागर भी बौना खुद को पायेगा.
ये अनमोल तोहफा है,
जो कुदरत ने दी है प्यारी,
हर मोड पर फिर क्यों ?
बुरी नज़रों का करना पड़ता है ,
सामना इसे करारी.
ये क्यों भूल जाते हो ?
तुम्हें संसार में लानेवाली भी,
है एक नारी.
चुटकी भर सिंदूर को ,
मांग में सजाती है,
उसका मोल चुकाने को,
कभी कभी ,
जिन्दा भी जल जाती है नारी.
हर जीवन पर करती अहसान,
फिर भी ना पा सकी सम्मान.
नारी निभा रही है हर जिम्मेवारी,
कैद ना करे इन्हें घर की चहारदीवारी.

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

jay ho ! [part-2]

आज ब्लॉग -जगत में सर्वत्र स्त्री-शक्ति का बोलबाला है .एल. बी. ए. की अध्यक्ष पद पर  rekha shrivastav जी की नियुक्ति ,AIBA  के अध्यक्ष पद vandana जी की नियुक्ति ,HBIF पर संरक्षिका पद पर rashmi prabha जी व् कानूनी सलाहकार पद पर shalini जी की नियुक्ति इसके मात्र कुछ उदाहरण हैं .नारी के सर्वाधिक सम्मानीय पद ''माँ '' की महिमा को प्रणाम करते हुए  महत्वपूर्ण ब्लॉग - ''pyari maa '' ब्लॉग जगत में सराहा  जा रहा  हैं .''rachna'' जी के कुशल निर्देशन में ''nari ' व् ''nari ka kavita blog 'समस्त ब्लॉग संसार में अपना अनुपम स्थान बनाये हुए है क्योकि ये दोनों ब्लॉग एक मात्र ऐसे ब्लॉग है जिन पर केवल महिला चिट्ठाकार अपनी पोस्ट प्रकाशित कर सकती हैं .शुभम जैन जी का ''nanhi pari 'ब्लॉग हमारी 'छोटी सी परियों को ब्लॉग जगत से जोड़ रहा है .' अक्षिता पाखी    'का नाम इस दिशा में विशेष रूप से उल्लेखनीय है .इनके अतिरिक्त  ''betiyon ka blog '' व् ''hamari bahan sharmila '' ब्लॉग भी नारी के ब्लॉग जगत में बढते क़दमों की और संकेत कर रहें हैं .
                       आइये फिर से मिलकर कहें --''जय हो ! ''
       ''आओ करें वंदना हम उस देवी की
          जिसकी नूतन दीपशिखा ने जग चमकाया ,
''alokita'   'anita '' या   हो वो ' sangeeta '
सबकी नई ' serjana ' ने मन को है जीता ,
'priyanka 'ने लेखन से की है 'pooja '
''monika ''की पवित्र लेखनी करे अजूबा ,
''veena '' और ''lata '' ने सबका मन हर्षाया .
अपनी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मन वाया .

'नारी मुक्ति -''asha '' ने फैलाई ''roshi'नी
सतत-'sadhna' लीन ''ajit'  'shalini'
'anshumala' 'anu ' बढाती चिटठा''garima '' ,
'manvindar' -'padma' के संग संग चले 'neelima'
हर ''deep 'की 'mala 'ने फिजाओं को महकाया .
अपनी अद्भुत प्रतिभा का लोहा मनवाया .
 [कविता में प्रयुक्त महिला -चिट्ठाकारों के ब्लॉग पर जाकर उनका उत्साहवर्धन करें ]
        'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें '
                              ''जय हो !''
लेखिका -shikha kaushik
सहायिका -shalini kaushik

                                   [जारी...........]

Sunday, March 6, 2011

जय हो ! [भाग-१ ]

८ मार्च को हम सभी ''अंतर-राष्ट्रीय महिला दिवस '' मनातें है .आज ब्लॉग -जगत में हमारी महिला चिठ्ठाकार जिस प्रकार से अपनी लेखन क्षमता का परिचय देते हुए अपना लोहा मनवा रही हैं
-उसकी तारीफ में बस एक ही भाव मन में उमड़ आता है -''जय हो ''.

इसी भाव को लेकर मैंने यह पोस्ट तैयार की है
आशा है आप सभी इसकी दिल से सराहना करेंगे .----


''आओ करें ''vandana ''
हम उस ''devi'' की ;

''जिसकी ''nutan'' दीप
''shikha'' ने जग चमकाया ,

''mamta''मय''''preeti''मय
प्रभु की इस ''rachna'' ने ;

अपनी अद्भुत ''pratibha'' का लोहा मनवाया .''
''sharad'' 'shashi' की 'rashmi' से शीतलता फैली ;
'poonam' की 'rajani' आई सज नई-नवेली ,
अच्छे लेखों से ज्ञान की ''rekha''खीची'' ;
सुन्दर 'kavita' से भावों की क्यारी सीचे ;
''harkirat'' की 'kiran ' से भर गया ''amar'' उजाला .

[लिंक में दिए गए नामों पर जाकर महिला चिट्ठाकारों का उत्साहवर्धन करें क्योंकि ये सभी नाम महिला चिट्ठाकारों के हैं]
लेखिका-शिखा कौशिक
सहायिका-शालिनी कौशिक
[जारी.........]

Monday, February 28, 2011

नारी कविता ब्लॉग पर केवल नारी आधरित विषयों पर ही कविता पोस्ट करे अन्यथा हटानी पड़ती हैं

नारी कविता ब्लॉग पर केवल नारी आधरित विषयों पर ही कविता पोस्ट करे अन्यथा हटानी पड़ती हैं

Tuesday, February 22, 2011

नारी जो कभी न हारी..

नारी
जो कभी न हारी,
अस्तित्व बचाने हेतु
विपदा झेली भारी-भारी,

नारी
जो कभी न हारी.
लाज बचाने को अपनी
बनके काली वो ललकारी,

नारी
जो कभी न हारी
किसी ने कहा उसे अबला
तो किसी ने कह दिया बेचारी,

नारी
 जो कभी न हारी
जीवन में नित देखे संघर्ष,
फिर भी लड़ना रखा जारी

नारी जो कभी न हारी.

Saturday, February 19, 2011

बोलता प्रश्न

.
क्यों नहीं है उसको
बोलने का अधिकार
या फिर अपनी बात को
कहने का अधिकार,
क्यों नहीं है अपनी पीड़ा को
बाँटने का अधिकार,
क्यों नहीं है
ग़लत को ग़लत
कहने का अधिकार !
क्यों चारों ओर उसके
लगा दी जाती है
कैक्टस की बाड़
क्यों कर दिया जाता है खामोश
क्यों नहीं बोलने दिया जाता उसे ?
यह प्रश्न अनवरत
उठता रहता है मन में,
बिजली- सी कौंधती रहती है
मस्तिष्क में,
बचपन से अब तक
कभी भी अपनी बात को
निर्द्वंद्व होकर कहने की
हिम्मत नहीं जुटा पाई है वह ।
जब भी कुछ कहने का
करती है प्रयास
मुँह खोलने का
करती है साहस
वहीं लगा दिया जाता है
चुप रहने का विराम ।
आठ की अवस्था हो
या फिर साठ की
वही स्थिति, वही मानसिकता
आखिर किससे कहे
अपनी करुण-कथा
और किसको सुनाए
अपनी गहन व्यथा ।
जन्म लेते ही
समाज द्वारा तिरस्कार
पिता से दुत्कार
फिर भाइयों के
गुस्से की मार
ससुराल में
पति के अत्याचार
सास-ननद के
कटाक्षों के वार
वृद्धावस्था में
बेटे की फटकार
बहू का विषैला व्यवहार
सब कुछ सहते-सहते
टूट जाती है वह,
क्योंकि उसे तो
मिले हैं विरासत में
सब कुछ सहने
और
कुछ न कहने के संस्कार ।
यदि ऐसा ही रहा
समाज का बर्ताव
मिलते रहे
उसे घाव पर घाव,
ऐसी ही रही चुप्पी
चारों ओर
तो शायद मन की घुटन
तोड़ देगी अंतर्मन को
अंदर-ही-अंदर,
फैलता रहेगा विष
घुटती रहेंगी साँसें
टूटती रहेंगी आसें
तो जिस बात को
वह करना चाहती है
अभिव्यक्त
वह उसके साथ ही
चली जाएगी,
फिर इसी तरह
घुटती रहेंगी बेटियाँ,
ऐसे ही टूटता रहेगा
उनका तन और मन,
होते रहेंगे अत्याचार
होती रहेंगी वे समाज की
घिनौनी मानसिकता का शिकार ।
कब बदलेगा समय,
जब समाज के
कथित ठेकेदार
समाज की चरमराई
सड़ी-गली व्यवस्था को
मजबूती देने के लिए
आगे आएँगे,
क़दम बढ़ाएँगे,
कब आएगा वह दिन
जब नारी की बात
उसकी पीड़ा,उसकी चुभन,
उसके मन का संत्रास
समझेगा यह समाज,
विश्वास है उसे
कि वह दिन आएगा
जरूर आएगा ।

2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!

डॉ.मीना अग्रवाल
.

Sunday, February 13, 2011

मेरी बेटी

है बड़ी मासूम उसकी मुस्कुराहट क्या कहूँ !
वो सदा पहचान जाती मेरी आहट क्या कहूँ !
एक पल भी दूर उससे रह नहीं सकती हूँ मैं
गोद में ही लेते उसको मिलती राहत क्या कहूँ !
देखते ही स्नेह से चूम लेती उसको मै
मखमली बाँहों से उसका घेर लेना क्या कहूँ !
उसकी किलकारी मेरे कानों में अमृत घोलती
माँ! मुझे कहकर के उसका खिलखिलाना क्या कहूँ !
वो मेरी बेटी ,मेरा सर्वस्व ,मेरी जिन्दगी
है मेरे वो दिल की धड़कन और ज्यादा क्या कहूँ !

Friday, February 11, 2011

बधाई हो घर में लक्ष्मी आई है

उन्हें कभी एकमत
होते नहीं देखा था 
उस दिन जब वह 
जन्मी थी 
कुछ जोड़े नयन 
सजल थे 
कुछ की आँखें 
चमक रही थी 
कोई आश्चर्य नहीं था 
क्यूंकि 
उन्हें कभी एकमत 
होते नहीं देखा था 
पर एक आश्चर्य 
उस दिन सबने 
सुर मिलाया 
शुभचिंतकों ने ढाँढस
दुश्चिन्तकों ने व्यंग्य कसा 
बधाई हो 
घर में लक्ष्मी आई है 

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Wednesday, February 2, 2011

हाँ , तुम नारी हो , तो ??

क्यो तुम लड़ती रहीं
क्यो तुम जूझती रहीं
क्यो तुम चाहती रही
बदलना मानसिकता औरो की

क्या फरक हैं फिर तुममे और उनमे
मत जुझो , मत लडो
मत और समय अपना बरबाद करो
मत बदलो किसी की मानसिकता
हो सके तो बदलो अपनी मानसिकता

जियो उस स्वतंत्रता को जो
ईश्वरिये देन हैं ,
जो नहीं कोई और तुम्हे देगा

नारी हो नारी ही बन कर रहो


प्यासी हो तो पानी पीयो
भूखी हो तो खाना खाओ
पर मत लडो , मत जुझो
और नारी होने के एहसास से सम्पूर्णता पाओ


अधूरी तुम नहीं हो , क्योंकी तुम जिनसे लड़ती हो
उनके अस्तिव की तुम ही तो जननी हो


तुम ख़ुद आक्षेप और अवेहलना करती हो
अपनी इच्छाओं की ,
कब तक अपनी कमियों का दोष
दूसरो पर डालोगी
समय जो बीत जाता है लौट कर नहीं आता है

Tuesday, February 1, 2011

अब चौखट के बाहर आना है !

पुरुष सत्ता की दीवारों को तोड़कर ,
लिंग भेद की सलाखों को मरोड़कर ,
सोयी आत्मशक्ति को जगा कर ,
दिमाग की बंद खिड़की खोलकर ,
हे स्त्री ! तुझको अब चौखट के बाहर आना है ,
पुरुष समान जग में सम्मान पाना है ।
********************************
जला देनी है वे किताबें ;जो कहती है
तुम कोमल ,निर्बल और कमजोर हो ,
तुम कली नहीं ;तुम फूल नहीं ;
तुम प्रस्तर सम कठोर हो ,
आंसू से नम इन पलकों को बस लक्ष्य पर टिक जाना है ,
हे स्त्री !तुझको अब चौखट के बाहर आना है ।
*****************************************
पुरुष बैसाखी ने तेरी चलने की ताकत छीनी है ,
तन की सुन्दरता में उलझा ;मन की शक्ति हर लीनी है ,
नैनों के तीर नहीं ;तुझको प्रज्ञा का बल दिखलाना है ।
हे स्त्री !तुझको अब चौखट के बाहर आना है ।
******************************************

Monday, January 31, 2011

सूचना

सभी नये सदस्यों से अनुरोध हैं कि इस ब्लॉग पर केवल नारी आधारित विषयों पर ही कविता पोस्ट करे । अन्य विषयों पर आयी कविताएं हटा दी जायेगी
इस ब्लॉग को नारी आधरित विषयों पर लिखी कविता के लिये ही बनाया हैं
सादर
रचना
सूत्रधार नारी कविता ब्लॉग

Tuesday, January 18, 2011

स्त्री होने का सुख

आज जो यह रचना आप सब के समक्ष प्रस्तुत है वह मेरी खुद की रचना नहीं है लेकिन फिर भी उसे मैं यँहा लायी हूँ क्यूंकि यह रचना नारी आधारित है और लिखी भी गयी है एक नारी द्वारा हीं और ऐसे में अगर यह नारी के कविता ब्लॉग तक न पहुंचे तो नाइंसाफी होगी | यह रचना है श्रीमती सीमा भट्ट जी की और इसे मैं बाकायदा इजाजत लेकर लायी हूँ उनके श्रीमान हरीश भट्ट जी के ब्लॉग उद्घोष से आशा है आप सब को यह उत्कृष्ट रचना पसंद आएगी और अपनी टिप्पनिओं से इसे यथोचित सम्मान प्रदान करेंगे |














अपनत्व से स्रिजत्व की
परिणिता से मातृत्व की  
परिभाषाए स्वीकारते, स्वीकारते
देखती थी जब,
तो गर्व होता था
स्वयं के होने को
स्त्री का,

किंतु आज
जब मैं खोजती हूँ
हर स्त्री मैं
नैसेर्गिक सुंदरता
करुणा-शील-धेर्य का स्पंदन,
तो पाती हूँ
एक कृत्रिमता
निर्जीव सी तस्वीर नज़र आती हैं
अर्धनग्न ओर कुत्सित भी,
सोचती हूँ
समानता का अधिकार
पुरुष से मेरा संबल हैं
या मेरा विकार,
मैं तो श्रेष्ठा थी
दिग दिगान्तर से,
पूज्‍यनीय भी
पुरुष द्वारा ओर
समाज द्वारा भी,
ओर समानता का 
ये अधिकार भी कैसा
बस मैं सीट ओर टिकट  
प्राप्त करलेने भर जेसा,
शारीरिक हो केवल
बौद्धिक ना हो जैसे,

समानता तो तब हैं की
मैं बस स्टाप से अकेले
घर तक आ पाऊ
बिना किसी की
चुभती आँखो का सामना किए ,
जब मैं चुन सकु अपना सत्व
सामाजिकता की परिधि मैं,
चुनाव ही तो हैं
हे राम !!
सीता होने का दर्शन
तो तुमने मुझे दिया था
पर उर्मिला होने का धेर्य तो
मैने खुद ही चुना था,

ओर मेरे लिए तो
ये भी बहुत हैं
की वो कहें किसी दिन

प्रिय
आज तुम उनिग्ध सी हो
.
उठों मत
.
रहने दो !!!
.
लो ...
आज
चाय
मैने बनाई हैं ...........!!!!


 © 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Wednesday, January 12, 2011

मै नारी हूँ ....

अपने अस्तित्व  को ढूँढती हुई
दूर चली जाती हूँ 
मै नारी हूँ ....
अस्मिता को बचाते  हुए 
धरती में समा जाती हूँ 
माँ- बहन इन शब्दों में 
ये कैसा कटुता 
है भर गया 
इन शब्दों में अपशब्दों के 
बोझ ढोते जाती हूँ 
पत्नी-बहू के रिश्तो में 
उलझती चली जाती हूँ 
अपने अस्तित्व  को ढूँढती हुई
दूर चली जाती हूँ 
अपने गर्भ से जिस संतान को 
मैंने है जन्म दिया 
अपनी इच्छाओं की आहुति देकर 
जिसकी कामनाओं को पूर्ण किया 
आज उस संतान के समक्ष 
विवश हुई जाती हूँ 
अपने अस्तित्व  को ढूँढती हुई
दूर चली जाती हूँ 
नारी हूँ पर अबला नही 
सृष्टि की जननी हूँ मै 
पर इस मन का क्या करूँ 
अपने से उत्पन्न सृष्टि के सम्मुख 
अस्तित्व छोडती जाती हूँ 

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Tuesday, January 11, 2011

कन्या भ्रूण हत्या को मना कीजिये...

वो कली जब गोद आयी ,
साँस थी महक गयी,
धीरे से जब मुस्कुराई ;
मोती से झोली भर गयी।
माँ कहा जब प्यार से;
मुझको तो जन्नत मिल गयी।
ऊँगली पकड़ कर जब चली;
खुशियाँ ही खुशियाँ छा गयी।
है मुझे गर्व खुद पर;
था लिया निर्णय सही।
भ्रूण हत्या को किया था;
दृढ़ता से मैंने नहीं।
जो कहीं कमजोर पड़कर;
दुष्कर्म मैं ये कर जाती;
फिर ये नन्ही सी कली ,
कैसे मेरे घर आ पाती?
ये महकेगी,ये चहकेगी,
सारे घर की रौनक होगी।
मेरी बिटिया की किलकारी;
पूरी दुनिया में गूंजेगी.

Monday, January 3, 2011

माँ की बात

मेरी माँ ने मुझको देखा,देख के वो यूं बोली,
  बिट्टो तूने आकर घर में भर दी मेरी झोली,
माँ के मुहं से ऐसा सुनकर खिल गया मेरा जीवन,
   अब सुन्दर मनभावन लगता अपने घर का आँगन,
माँ से ऐसी बात सुनकर मन मेरा लगा नाचने,
नए ख्याल अनोखे सपने आँखों में लगे आने ,
   माँ ने ऐसी बात है कह दी सार्थक हुई ज़िन्दगी,
   अपने पैरों पर खडी हों सपने उनके पूर्ण करूंगी.

Friday, December 31, 2010

मंगलमय हो यह नव-वर्ष!


नया साल आया है फिर से 
                 सबके लिए यह  हो आदर्श.
नये साल में सत्य अहिंसा
                  हो सबका जीवन-निष्कर्ष.
भूल जाएँ सब रंजोगम को
                 मिलजुल करें विचार विमर्श.
सुख-समृधि , धान्य-धन बढ़े
                 मधुर बने जीवन संघर्ष.
सुख-चैन रहे सभी दिलों में
                 गाएँ मिल सब गीत सहर्ष.
हे प्रभु! यही विनती हमारी
                  मंगल मय हो यह नव-वर्ष.


© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!