तब नहीं जानती थी मैं
कि क्यों रोकती है मुझे अम्मी
दुहाई दे दे कर जमाने की.
क्यों नहीं खेलने देती मुझे
हमसायों के संग
देर तक अकेले में.
अब ,जब मैं
स्वयं पहुंच गयी हूँ
अम्मी की उम्र तक.
और जान गयी हूँ
उन दुहाइओं का सच.
और समझाना चाहती हूँ
अपनी मासूम कली को
तो वो भी
नहीं समझ पा रही मेरी बात.
वो भी पूछती है मुझसे
वही सवाल
जो तब
मैं अपनी अम्मी से पूछती थी.
और अब
मैं भी जूझती हूँ
उसी कशमकश से,
जिससे कभी
मेरी अम्मी जूझती थी.
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