सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Monday, March 30, 2009

प्रेम - व्यापार

देव हो या दानव

वासना का समुद्र

जब - जब उफनता हैं

सयम का कगार टूट जाता हैं ।

सुंदर प्रकाशवान मछली

सम्मोहन के जाल मै

स्वयं फँस जाती हैं ।

तामसी - वृत्तियाँ

प्यार के अनछुये आकाश पर

काले बादल बन छा जाती हैं ।

चारो और फैले

तामसी कोहरे के भीतर

बलात्कार होता हैं

चीखे उभरती हैं

पर

सत्यवती को बचाने वाला

कोई नहीं आता ।

चीखे मौन हो जाती हैं

वासना तृप्त

चलता रहता हैं

संसार का प्रेम - व्यापार



कमेंट्स यहाँ दे प्रेम - व्यापार


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Friday, March 27, 2009

मै अपनी धरती को अपना वोट दूंगी आप भी दे कैसे ?? क्यूँ ?

शनिवार २८ मार्च २००९
समय शाम के ८.३० बजे से रात के ९.३० बजे
घर मे चलने वाली हर वो चीज़ जो इलेक्ट्रिसिटी से चलती हैं उसको बंद कर दे
अपना वोट दे धरती को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के लिये
पूरी दुनिया मे शनिवार २८ मार्च २००९ समय शाम के .३० बजे से रात के .३० बजे

ग्लोबल अर्थ आर { GLOBAL EARTH HOUR } मनाये गी और वोट देगी अपनी धरती को
इस विषय मे ज्यादा जानकारी यहाँ उपलब्ध हैं

जीवन के भीतर स्त्री


लम्बी चौडी जायदाद नहीं
एक घर चाहती हैं वे केवल
शायद पूरा घर भी नहीं
बस एक चुल्हा ताकि
घर भर को खिला कर
संतुष्ट हो, सो सके
कल के भोजन के बारें में
फिक करते हुये।


चाँद की कहानी कहते हुये वे चाँद पर जा पहुँचती हैं
अपनी कमनियता के किस्सों को
हवाओं में बिखरते हुये
कुछ न करते हुये भी
बहुत कुछ कर रही होती हैं वे
अपनी सृजनशीलता से रच रही होती है
स्वपनिले संसार की रूपरेखा


हमेशा बचाये रखा है उन्होनें
घर का सपना
आँधी तुफानों के बीच भी
जितनी शिद्दत से वे प्रेम करती है
उतनी ही शिद्दत से घृणा
मासुमियता, उदारता, करुणा के विष्षणों के साथ
वे बेहद खूबसूरत दिखाई पडती हैं


कभी कभी वे सच के इतने करीब होती हैं
की छू सकती हैं अपनी आत्मा का पवितर जल
कभी वे बिना पक्षपात के इतनी झूठी हो सकती है
की आप दुनिया जहान से नफरत करने लगें
अपनी अनेकता के साथ
राधा, मीरा, सीता का बाना ओढती हैं
एक देश में अरृणा राय तो
दुसरे देश में सु कि
किसी तीसरे देश में शीरीन आबादी बन
अपने आप को सिदध कर रही होती हैं

उन्कें यहाँ हक्कीत और स्वपन में अधिक अंतर नहीं है
यही एकमात्र कारण है
हक्कीत को सपना और
सपने को हक्कीत समझनें में वे भूल कर देती हैं
जीवन का नब्बे प्रतिशत प्रेम
उन्के करीब से हो कर गुजरता है


उन्का साथ इन्दरधनुष, तितली, फुल, कविता,
खुश्बू, घटाओं और जिंदगी का साथ है
उन्की आखें जिस क्षण तुम्हारी ओर
देखती है वे क्षण ठहरे रहते हैं हमेशा
तमाम उमर तुम उन क्षणों के बीच से होकर
गुजरना चाहते हो तुम


कभी वे मुस्कुराहट बन
तस्वीर के चारों कोनों में फैल जाती हैं
तो कभी आँसुओं की तरह
शून्य में सिमट जाती हैं
स्त्री कभी बिखरती नहीं
अरबों खरबों अणुओं में जुडती नहीं
बिम्ब से मूरत में तबदील हो्
माँ, बहन, बेटी बन जाती है
और कविता के अंदर
हमेशा जीवित रहती हैं
संवेदना बन कर।

Friday, March 13, 2009

होली

फागुन आया उड़ रहाअबीर और गुलाल
होली में सब मस्त हुएकिसका पूछे हाल


बसंती रंगो मे डूबे
khila हास परिहासफागुन में मदमस्त हुए सबछाया उल्लास
सरसों फूली टेसू महकाखिला हारसिंगार


पीली चुनर ओढ़करप्रकृति ने किया श्रृंगार .

Tuesday, March 10, 2009

होली के पावन पर्व की हिन्दी ब्लॉग परिवार को बधाई ।

*रोशनी*

मन के अंधेरों में भटकोगे तो रोशनी कैसे पाओगे ,
सोचने को तो बहुत है पर कुछ करके तो दिखाओगे ,
कल्पना की उड़ान तज कर अब यथार्थ अपना लो ,
तभी तो संकट- संघर्ष में धरा पर पैर जमालोगे.।

साहस करो तो मन के अंदर भी तेज ही पाओगे ,
तन की तपन तज तब ही तो तुम आगे आओगे,
जीवन की सूखी फुलवारी में आशा के दीप जलेंगे ,
विद्युत् लय से तिमिर चीरकर स्वप्न पूरा पाओगे।


*अलका मधुसूदन पटेल*


Monday, March 9, 2009

औरतें औरतें नहीं हैं !

कविता का मन

ये पोस्ट कविता वाचक्नवीजी की मेहनत हैं । आप भी पढे और अपने विचार दे



बचपन
में खेलते खेलते या खाते-खाते, या कई बार सोते में ही (मुख्य तो यही क्रम होता है, उस उम्र में) एक आवाज, बल्कि आवाज़ भी क्या चीत्कार सुनाई पड़ा करती थी, यह चीत्कार इतनी भयंकर इतनी तीखी होने के साथ साथ इतनी दीर्घकालिक होती कि कई बार उस चीखने वाले/वाली से ही घृणा से भर जाता मन।उस चीख /चीत्कार की खोज में दौड़ते एक दिन पाया कि .... की बस्ती के कुछ लोग एक सूअर/ सूअरी को पकड़ने के लिए धड़े दल में उस मोहल्ले से इस मोहल्ले तक की घेरेबंदी वाली दौड़ लगा रहे हैं और हमें घृणित प्रतीत होने वाला वह प्राणी भाग भाग कर बेहाल दुरावस्था में है| हर बार अंत में वह पकडा जाता /जाती। अंत उसका यही होता कि उस बिरादरी के लोगों के यहाँ होने जा रहे आयोजन के लिए उसे जिंदा जला कर भूना जाता। वह पूरी प्रक्रिया तो जान ने का कभी दुस्साहस नहीं हो पाया किंतु उसके चारों पैर बाँध कर उसे अग्नि के हवाले किए जाते तक देखा। भीषण दृश्य होता था। हवा में दुर्गन्ध चीत्कारें। कई कई रात डर पीड़ा में कांपते गुजरते। बचपन बीता, घर छूटा और वह चीत्कार दृश्य भी।

गत दिनों एक ऐसे यथार्थ से आँखें फटी रह गईं कि वह बचपन का दृश्य उस दिन से बार बार डरपा रहा है, यादों में उमड़ा रहा है। आज के एक भीषण यथार्थ को प्रस्तुत करती कविता के लिए जब मैंने तत्सम्बन्धी वास्तविकताओं के चित्र देखे तो तब से हाथ- पैर बँधी एक स्त्री का चित्र ठीक उस सूअरी की याद दिलाता है, जिसे जिंदा आग में झोंक दिया जाता था और उसके तड़फड़ा कर आग से बाहर उलट/ झपट पड़ने की आशंका को दूर करने के लिए चारों और लोग उसे डंडे से ताने आग पर सेंकते रहते, धकेलते रहते। यदि किसी स्त्री को आज के युग में आप ऐसी अवस्था में देखें तो क्या हो मन की स्थिति ? ऐसी ही कष्ट में बेहाल स्त्रियों के चित्र देख मेरे रोंगटे खड़े हो गए, उनकी पीड़ा से त्रस्त हूँ .


चित्र के लिए तो वहीं जाना होगा ( वहाँ पहला चित्र ), किंतु इस पीड़ा को ऋषभदेव जी ने जो शब्द दिए हैं उन्हें मैं अपनी पसंद के रूप में आप को यहीं पढ़वा रही हूँ --





औरतें औरतें नहीं हैं !

-ऋषभ देव शर्मा




वे वीर हैं
मैं वसुंधरा.
उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध -
'वीर भोग्या वसुंधरा.'

वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
भोगते आए हैं,
उनकी विजयलिप्सा अनादि है
अनंत है
विराट है.

जब वे मुझे नहीं जीत पाते
तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
दिखाते हैं अपनी वीरता.

युद्ध कहने को राजनीति है
पर सच में जघन्य अपराध !
अपराध - मेरी बेटियों के खिलाफ
औरतों के खिलाफ !

युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
उनके वस्त्र उतारे जाते थे
बाल खींचे जाते थे
अंग काटे जाते थे
शील छीना जाता था ,
आज भी यही सब होता है.
पुरुष तब भी असभ्य था
आज भी असभ्य है,
तब भी राक्षस था
आज भी असुर है.

वह बदलता है हार को जीत में
औरतों पर अत्याचार करके.

सिपाही और फौजी
बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
निचोड़ लेते हैं प्राण देह से.

औरते या तो मर जाती हैं
[ लाखों मर रही हैं ]
या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
..

वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !

वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
मेरी आँखों के आगे.
पति की आँखों के आगे
पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें.
माता-पिता की आँखों आगे
कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के.

एक एक औरत की जंघाओं पर से
फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !

औरतें औरतें हैं
न बेटियाँ हैं, न बहनें;
वे बस औरतें हैं
बेबस औरतें हैं.
दुश्मनों की औरतें !

फौजें जानती हैं
जनरल जानते हैं
सिपाही जानते हैं
औरतें औरतें नहीं होतीं
अस्मत होती हैं किसी जाति की.

औरतें हैं लज्जा
औरतें हैं शील
औरतें हैं अस्मिता
औरते हैं आज़ादी
औरतें गौरव हैं
औरतें स्वाभिमान.

औरतें औरतें नहीं
औरतें देश होती हैं.
औरत होती है जाति
औरत राष्ट्र होती है.

जानते हैं राजनीति के धुरंधर
जानते हैं रावण और दुर्योधन
जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
जानते हैं हिटलर और याहिया
कि औरतें औरतें नहीं हैं,
औरतें देश होती हैं.
औरत को रौंदो
तो देश रौंदा गया ,
औरत को भोगो
तो देश भोगा गया ,
औरत को नंगा किया
तो देश नंगा होगा,
औरत को काट डाला
तो देश कट गया.

जानते हैं वे
देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
जब तक स्वाभिमान बचा रहे!

इसीलिए
औरत के जननांग पर
फहरा दो विजय की पताका
देश हार जाएगा आप से आप!

इसी कूटनीति में
वीरगति पा रही हैं
मेरी लाखों लाख बेटियाँ
और आकाश में फहर रही हैं
कोटि कोटि विजय पताकाएँ!

इन पताकाओं की जड़ में
दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
बच्चियों की
उनकी माताओं की
उनकी दादियों-नानियों की.

उन सबको सजा मिली
औरत होने की
संस्कृति होने की
सभ्यता होने की.

औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!

औरत को जीतने का अर्थ है
संस्कृति को जीतना
सभ्यता को जीतना,
औरत को हराने का अर्थ है
मनुष्यता को हराना,
औरत को कुचलने का अर्थ है
कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,

इसीलिए तो
उनके लिए
औरतें ज़मीनें हैं;
वे ज़मीन जीतने के लिए
औरतों को जीतते हैं!
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Friday, February 27, 2009

मर्दानगी

संजय ग्रोवर जी की ये कविता हम अतिथि कवि की कलम से के तहत पोस्ट कर रहे हैं
हिन्दी ब्लॉगर ऋषभ देव शर्मा जी नारी आधरित विषयों पर अपनी राय ब्लॉग के माध्यम से हम तक पहुचाते रहे हैं उनकी कलम से हमेशा एक संवेदन शील बात निकलती रही हैं जिस मे नारी के प्रति एक ऐसा नजरिया देखने को मिला हैं जो कम लोग रखते हैं
इस कविता को यहाँ पोस्ट करके हम शायद बस इतना कर रहे के की उनके कलम से निकली "अपनी बात को " एक बार फिर दोहरा रहे हैं ।


मर्दानगी

गर्वीले चेहरे पर
अकड़ी हुई मूँछें
बाहों पर उछलती हुई मछलियां
गरज़दार आवाज़
Align Center


मर्दानगी
रखी है इतिहास के शोकेस में
चाबी भरने पर आवाज़ भी करती है
जब जम जाती है इस पर धूल
तो क्रेज़ी स्त्रीत्व अपने कोमल हाथों से
इसे झाड़-बुहार कर
फिर रख देता है शोकेस में



जब पुरानी पड़ जाती है
याकि मर जाती है
तो पुरानी की जगह नई सजा दी जाती है



मर्दानगी
खुश है अपने सजने पर



साल दर साल
पीढ़ी दर पीढ़ी
शोकेस में सजती आ रही है
मर्दानगी



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Thursday, February 19, 2009

अश्लील है तुम्हारा पौरुष

ऋषभ देव शर्मा जी की ये कविता हम अतिथि कवि की कलम से के तहत पोस्ट कर रहे हैं ।
हिन्दी ब्लॉगर ऋषभ देव शर्मा जी नारी आधरित विषयों पर अपनी राय ब्लॉग के माध्यम से हम तक पहुचाते रहे हैं । उनकी कलम से हमेशा एक संवेदन शील बात निकलती रही हैं जिस मे नारी के प्रति एक ऐसा नजरिया देखने को मिला हैं जो कम लोग रखते हैं ।
इस कविता को यहाँ पोस्ट करके हम शायद बस इतना कर रहे के की उनके कलम से निकली "अपनी बात को " एक बार फिर दोहरा रहे हैं ।

अश्लील है तुम्हारा पौरुष

पहले वे
लंबे चोगों पर सफ़ेद गोल टोपी
पहनकर आए थे
और
मेरे चेहरे पर तेजाब फेंककर
मुझे बुरके में बाँधकर चले गए थे.



आज वे फिर आए हैं
संस्कृति के रखवाले बनकर
एक हाथ में लोहे की सलाखें
और दूसरे हाथ में हंटर लेकर.



उन्हें शिकायत है मुझसे !



औरत होकर मैं
प्यार कैसे कर सकती हूँ ,
सपने कैसे देख सकती हूँ ,
किसी को फूल कैसे दे सकती हूँ !



मैंने किसी को फूल दिया
- उन्होंने मेरी फूल सी देह दाग दी.
मैंने उड़ने के सपने देखे
- उन्होंने मेरे सुनहरे पर तराश दिए.
मैंने प्यार करने का दुस्साहस किया
- उन्होंने मुझे वेश्या बना दिया.



वे यह सब करते रहे
और मैं डरती रही, सहती रही,
- अकेली हूँ न ?



कोई तो आए मेरे साथ ,
मैं इन हत्यारों को -
तालिबों और मुजाहिदों को -
शिव और राम के सैनिकों को -
मुहब्बत के गुलाब देना चाहती हूँ.
बताना चाहती हूँ इन्हें --



''न मैं अश्लील हूँ , न मेरी देह.
मेरी नग्नता भी अश्लील नहीं
-वही तो तुम्हें जनमती है!
अश्लील है तुम्हारा पौरुष
-औरत को सह नहीं पाता.
अश्लील है तुम्हारी संस्कृति
- पालती है तुम-सी विकृतियों को !



''अश्लील हैं वे सब रीतियाँ
जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती हैं.
अश्लील हैं वे सब किताबें
जो औरत को गुलाम बनाती हैं ,
-और मर्द को मालिक / नियंता .
अश्लील है तुम्हारी यह दुनिया
-इसमें प्यार वर्जित है
और सपने निषिद्ध !



''धर्म अश्लील हैं
-घृणा सिखाते हैं !
पवित्रता अश्लील है
-हिंसा सिखाती है !''



वे फिर-फिर आते रहेंगे
-पोशाकें बदलकर
-हथियार बदलकर ;
करते रहेंगे मुझपर ज्यादती.



पहले मुझे निर्वस्त्र करेंगे
और फिर
वस्त्रदान का पुण्य लूटेंगे.



वे युगों से यही करते आए हैं
- फिर-फिर यही करेंगे
जब भी मुझे अकेली पाएँगे !



नहीं ; मैं अकेली कहाँ हूँ ....
मेरे साथ आ गई हैं दुनिया की तमाम औरतें ....
--काश ! यह सपना कभी न टूटे !


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Tuesday, February 17, 2009

एक रिक्त अहसास है!

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
हाँ
मैं नारी हूँ,
वन्दनीय औ' पूजिता
कहते रहे हैं लोग,
कितने जीवन जिए हैं मैंने
कहाँ तो सप्तरिशी की पंक्ति में
विराजी गई,
सतियों की उपमा दे
पूजी गई।
मर्यादाओं में भी भारी
पड़ रही थी,
तब जागा पुरूष अंहकार
उसको परदे में बंद कर दिया,
सीमाओं में बाँध दिया
चारदीवारी से बाहर
देखना भी वर्जित था।
पति, पिता और पुत्र
यही पुरूष दर्शनीय थे।
तब भी जी रही थी
ओंठों को सिये
चुपचाप
आंसुओं के घूँट पी रही थी.
इसमें भी सदियाँ गुजरीं,
कहीं कोई
सद्पुरुष जन्म
नारी को भी मानव समझा
बहुत संघर्ष किए
तब
उनकी जंजीरों और बंधनों को
कुछ ढीले किए
शायद सद्बुद्धि आनी थी
नारी की भी
यही से बदलनी कहानी थी।
बदलते बदलते
आज यहाँ तक पहुँची
तो फिर
नकेल की होने लगी
एक नई तैयारी
क्या डाल पायेंगे नकेल?
ख़ुद सवालों में घिर गए
क्योंकि
अब की नारी
माटी का पुतला नहीं,
दुर्बल या अबला नहीं
ख़ुद को बचा सकती है।
अरे अपनी जन्मदात्री
का तो ख्याल करो
ये वही नारी है
जो सृष्टि को रचती है
शेष उसी से है
ये मानव जाति
ये नारी वह हस्ती है।
उसे संस्कार या मर्यादाओं
की शिक्षा तुम क्या दोगे?
जिससे सीखकर तुम आए हो
उसी को आइना दिखा रहे हो।
सडकों पर तमाशा
बनाकर क्या
वन्दनीय बन जाओगे।
सीता बन यदि
चुप है तो-
सब कुछ चलता है
गर दुर्गा बन
संहार पर उतर आई
तो तुम ही निंदनीय बन जाओगे।
सहेजो, समझाओ
उसे बहन बेटी बनाकर
प्यार से जग जीता जाता है
उनको दिशा दो
मगर प्यार से,
नासमझ वह भी नहीं,
जगत के दोनों ही
कर्णधार हैं।
नर-नारी से ही बना
ये संसार है।
इसे संयमित रहने दो
सृष्टि को नियमित चलने दो
न विरोधाभास है
न बैर का आभास है
एक दूसरे के बिना
दोनों एक रिक्त अहसास है.

अब तुलना चाहती हैं नारी

शारीरिक परिभाषाओ से उठ कर
क्षमताओं की परिभाषा मे
अब तुलना चाहती हैं नारी ।




© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Friday, February 13, 2009

कौन हो तुम ?

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

कभी -कभी अंतस से एक प्रश्न आता है ,
मेरे आस पास फ़ैल जाता है ।
ऊँचे पहाडों से टकराकर प्रतिध्वनित होता है ,
और मुझे लगता है
कि
सबकी आँखों में वही प्रश्न है ,
सबकी बातों में वही चिढ ।

कौन हो तुम ?
क्या चाहती हो ?

क्या कहूँ ?क्या उत्तर दूँ ?
दूँ भी...... तो क्या समझ लेंगे सब लोग मेरे उत्तर को?


सोचती हूँ कह दूँ -
एक नदी हूँ मैं
और चाहती हूँ कि मुझे अपने तरीके से बहने दिया जाए
अपने कगारों में बंधी ,
किनारे के पेडों से बतियाती ,बह लुंगी मैं
पर लोग हैं कि ...
बहने नही देते ।



कभी सोचती हूँ कह दूँ -
एक आग हूँ मैं ,
और चाहती हूँ
कि ,
मुझे अपने तरीके से जलने दिया जाए
किसी गृहणी के चूल्हे की लकडियों से बतियाती ,
भोजन बनाती जल लुंगी मैं
पर लोग हैं के ----
जलने नही देते ।

अब दिशाएं मौन हैं ,
न प्रश्न हैं ,न उत्तर हैं ।
जानती हूँ
मुझे अपने तरीके से जलने या बहने नही दिया जाएगा ।

फ़िर भी कहती हूँ ,
एक मनुष्य हूँ मैं ,
एक नारी हूँ मैं ,
और चाहती हूँ -----
कि.....
मुझे अपने तरीके से जीने दिया जाए .

Monday, February 9, 2009

लडकियां

आँगन की चाहत लडकियां
खयालो की हसरत लडकियां

शिक्षा की जोडो चुनर
शिखर की शोहोरत लडकियां

ख्वाबों को फलक दिखाती
आज की हकीक़त लडकियां

देहलीज़ पे उतरी चाँद सी
नही है तोहमत लडकियां



© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Saturday, February 7, 2009

एक लड़की

आकांशा जी ने ये कविता नारी ब्लॉग पर पोस्ट की हैं , मै उसे यहाँ पोस्ट कर रही हूँ ।


जाने कितनी बार
टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों में

हर किसी को देखती
याचना की निगाहों से
एक बार तो हाँ कहकर देखो
कोई कोर कसर नहीं रखूँगी
तुम्हारी जिन्दगी संवारने में

पर सब बेकार
कोई उसके रंग को निहारता
तो कोई लम्बाई मापता
कोई उसे चलकर दिखाने को कहता
कोई साड़ी और सूट पहनकर बुलाता

पर कोई नहीं देखता
उसकी आँखों में
जहाँ प्यार है, अनुराग है
लज्जा है, विश्वास है !!
आकांक्षा
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Sunday, January 25, 2009

यूँ ही

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
अक्सर ही हुआ यूँ
की
अंतस में उमड़ी कई कवितायें ,
और न लिखी जाकर
अंतत आँखों से झर गई ।

अक्सर ही हुआ यूँ
की
कई कहानियाँ उँगलियों के पोरों तक आ गई ,
और न लिखी जाकर
अंतत रोटी के आटे में गूँथ गईं ।

अक्सर ही हुआ यूँ
कि
कोई प्यारा सा गीत
गूंजता रहा मन में ,
होठों के कोरों तक आया ,
और चीख चिल्लाहट में बदल गया ।

अक्सर ही हुआ यूँ
कि
आषाढ़ की पहली बारिश के दिन
दिल की मिटटी से उठी
प्यार की सोंधी गंध
और
चाय पकोडों के साथ
पेट में चली गई ।

अक्सर ही नही
बार बार होता रहा यूँ
मेरी अजन्मी कविताओं ,
अनकही कहानियो ,
अनगाये गीतों और
अनकिये प्यार के साथ ।

फ़िर भी पीछे नही हटी मैं
डटी रही
ज़िन्दगी की आँखों मैं ऑंखें डाले ।
और फ़िर
लिख ही डालीं
मन की कवितायें ,
कह ही डाली
सब कहानियाँ ,
गा ही लिए
कुछ गीत ,
कर ही लिया
थोड़ा सा प्यार ।
कर ही ली
एक बार ही सही
अपनी मनमानी .

Saturday, January 24, 2009

तुम्हारे अस्तित्व की जननी हूँ मै

बालिका दिवस पर कविता
पार्वती भी मै
दुर्गा भी मै
सीता भी मै
मंदोदरी भी मै
रुकमनी भी मै
मीरा भी मै
राधा भी मै
गंगा भी मै
सरस्वती भी मै
लक्ष्मी भी मै
माँ भी मै
पत्नी भी मै
बहिन भी मै
बेटी भी मै
घर मे भी मै
मंदिर मे भी मै
बाजार मे भी मै
"तीन तत्वों " मे भी मै
पुजती भी मै
बिकती भी मै
अब और क्या
परिचय दू
अपने अस्तित्व का
क्या करुगी तुम से
करके बराबरी मै
जब तुम्हारे
अस्तित्व की
जननी हूँ मै

तुम जब मेरे बराबर
हो जाना तब ही
मुझ तक आना




पार्वती माता का प्रतीक
दुर्गा शक्ति का प्रतीक
सीता , मंदोदरी, रुकमनी भार्या का प्रतीक
मीरा , राधा प्रेम का प्रतीक
गंगा , पवित्रता का प्रतीक
सरस्वती , ज्ञान का प्रतीक
लक्ष्मी , धन का प्रतीक
बाजार , वासना का प्रतीक
तीन तत्व , अग्नि , धरती , वायु

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Thursday, January 8, 2009

नववर्ष की शुभकामनाएँ

नववर्ष की अनंत शुभकामनाएँ
नए वर्ष की नई दिशा हो
नई कामना, नई आस हो
नई भावना, नई सोच हो
नई सुबह की नई प्यास हो
नई धूप हो, नई चाँदनी
नई सदी का नव विकास हो
नया प्रेम औ' नया राग हो
हर सुख अपने आसपास हो
नई रौशनी, नई डगर हो
नया खून औ' नई श्वास हो
नया रूप औ' नव जुनून हो
मन में बसती नव मिठास हो
नए सपन हों, नई शाम हो
रंग-बिरंगा कैनवास हो
नए फूल औ' नई उमंगें
अंतर्मन में नव सुवास हो !

डॉ. मीना अग्रवाल

Sunday, January 4, 2009

करुण पुकार

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की ये कविता अतिथि कवि की पोस्ट के तहत पोस्ट की जा रही हैं । आप भी पढ़े और अपने कमेन्ट दे ।

करुण पुकार

(माँ के नाम अजन्मी बिटिया की)

माँ,
मुझे एक बार तो जन्मने दो,
मैं खेलना चाहती हूँ
तुम्हारी गोद मैं,
लगना चाहती हूँ
तुम्हारे सीने से,
सुनना चाहती हूँ
मैं भी लोरी प्यार भरी,
मुझे एक बार जन्मने तो दो;
माँ,
क्या तुम नारी होकर भी
ऐसा कर सकती हो,
एक माँ होकर भी
अपनी कोख उजाड़ सकती हो?
क्या मैं तुम्हारी चाह नहीं?
क्या मैं तुम्हारा प्यार नहीं?
मैं भी जीना चाहती हूँ,
मुझे एक बार जन्मने तो दो;
माँ,
मैं तो बस तुम्हे ही जानती हूँ,
तुम्हारी धड़कन ही पहचानती हूँ,
मेरी हर हलचल का एहसास है तुम्हे,
मेरे आंसुओं को भी
तुम जरूर पहचानती होगी,
मेरे आंसुओं से
तुम्हारी भी आँखें भीगती होगी,
मेरे आंसुओं की पहचान
मेरे पिता को कराओ,
मैं उनका भी अंश हूँ
यह एहसास तो कराओ,
मैं बन के दिखाऊंगी
उन्हें उनका बेटा,
मुझे एक बार जन्मने तो दो;
माँ,
तुम खामोश क्यों हो?
तुम इतनी उदास क्यों हो?
क्या तुम नहीं रोक सकती हो
मेरा जाना ?
क्या तुम्हे भी प्रिय नहीं
मेरा आना?
तुम्हारी क्या मजबूरी है?
ऐसी कौन सी लाचारी है?
मजबूरी..??? लाचारी...???
मैं अभी यही नहीं जानती,
क्योंकि
मैं कभी जन्मी ही नहीं,
कभी माँ बनी ही नहीं,
माँ,
मैं मिटाउंगी तुम्हारी लाचारी,
दूर कर दूंगी मजबूरी,
बस,
मुझे एक बार जन्मने तो दो.


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Friday, January 2, 2009

एक स्त्री के प्रति

हिमांशु पाण्डेय जी की ये कविता अतिथि कवि की पोस्ट के तहत पोस्ट की जा रही हैं । आप भी पढ़े और अपने कमेन्ट दे ।


एक स्त्री के प्रति

स्वीकार कर लिया
काँटों के पथ को
पहचाना फ़िर भी
जकड़ लिया बहुरूपी झूठे सच को
कुछ बतलाओ, न रखो अधर में
हे स्नेह बिन्दु !
क्यों करते हो समझौता ?

जब पूछ रहा होता हूँ, कह देते हो
'जो हुआ सही ही हुआ' और
'
जो बीत गयी सो बात गयी' ,
कहो यह मौन कहाँ से सीखा ?
जो समाज ने दिया
अंक में भर लेते हो
अपने सुख को, मधुर स्वप्न को
विस्मृत कर देते हो
यह महानता, त्याग तुम्हीं में पोषित
कह दो ना, ऐसा मंत्र कहाँ से पाया ?

मन के भीतर
सात रंग के सपने
फ़िर उजली चादर क्यों ओढी है तुमने
हे प्रेम-स्नेह-करुणा-से रंगों की धारित्री तुम
स्वयं, स्वयं से प्रीति न जाने
क्यों छोड़ी है तुमने ?

मैं अभिभूत खडा हूँ हाथ पसारे
कर दो ना कुछ विस्तृत
हृदय कपाट तुम्हारे
कि तेरे उर-गह्वर की मैं गहराई नापूँ
देखूं कितना ज्योतिर्पुंज
वहाँ निखरा-बिखरा है ।

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Thursday, January 1, 2009

एक नया संकल्प!

चलो
नए वर्ष के
इस प्रथम दिवस को
अपना संकल्प-दिवस
बना लें।
एक मशाल जलाकर
क्रांति की
मिटा डालें इबारत
इस भ्रान्ति की
कि नारी सिर्फ
अबला और आश्रित है,
सिर्फ पुरूष के पीछे - पीछे
चल कर जीवित है.
नारी सृष्टि का प्रतीक है
सृजकों का स्वागत
विध्वंसकों के अस्तित्व पर
अब प्रहार पर प्रहार कर
उन दुर्योधनों और दुशासनों
के अस्तित्व को मिटाना है।
उन्हें जीने का हक़ नहीं ।

अपने हाथ से
मस्तक पर
तिलक लगाने से
कोई पूज्य नहीं होता,
अहम् ब्रह्मास्मि
कहने भर से
कोई सृष्टा नहीं होता।
अब ठानना है,
महिषासुरों के लिए
दुर्गा बन कर
उनके लिए काल बनना है,
जो ममतामयी,
त्याग्शील औ' समर्पिवा
स्वरूप से
अपनी मर्जी से
खिलवाड़ करे ,
उनके अधिकारों को
अपनी मर्जी से
दें या फिर हनन करें
ऐसे लोगों से
लड़ने का संकल्प
करें और करते रहें.
साल- दर -साल के संकल्प
कुछ तो हमने पाया है
एक नए संकल्प से
सोच पुरातन पंथों की
बदलने के लिए
नया बीड़ा तो अब उठाया है.
हम न भी रहे
यह मशाल जलती ही रहेगी,
हम न सही
हम जैसे ही
और जन्म लेंगे
जो इसको जलाए रखेगें
जब तक कि
इस जहाँ में
अपने अर्धार्गिनी स्वरूप
को सार्थक सिद्ध करने
में सफल नहीं होती है।
सर्वस्व वह नहीं
बनना चाहती है
फिर भी
उसके बिना भी सृष्टि
अधूरी है
इस बात को
और अपने अस्तित्व के
महत्व को
इबारत में लिखकर
पुरूष ही नहीं
संपूर्ण मानवजाति
के लिए
स्वीकार्य
बना कर
समानता के सूत्र को
सार्थक करेगी।

Wednesday, December 31, 2008

आने वाला पल जाने वाला है

२००९ का आगमन हो रहा हैं
आप सब को नया साल शुभ हो
हमारे देश मे सदा शान्ति रहे और हम हमेशा हर जरुरत पर एक दूसरे के लिये खडे हो
हर आने वाला साल नई उम्मीदे लाता हैं

पर
बीते साल की यादे भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं
यादो को याद रखेगे तो उम्मीदे भी पूरी होगी
क्युकी
आज जो उम्मीद हैं कल वह ही याद होगी
२००८ को याद करते हुए चलिये चलते हैं २००९ मे
सफर यादो से उम्मीदों का

कुछ नया सा

पुराना कुछ बीत रहा

तो क्या

उसे भूलेंगे नही

कुछ अच्छी चीजे होंगी

और कुछ गलतियों की पोटली

सब को बाँध कर सहेज कर

उस में औ नया एहसास भर देंगे

लड़खडाए कदम फिर से चलेंगे

नए उत्साह के साथ

नई उम्मीद के निम् तले

ताकि पिचली कड़वाहट याद कर

कुछ मीठे रिश्ते बन सके

आने वाले नव पर्व पर कुछ नए

ख्वाबो को अंजाम दे सके ........



नारी समूह की और से सभी को नया साल मुबारक

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Wednesday, December 17, 2008

फिर भी तुम्हें, नहीं करूंगी अशक्त!

राष्ट्र प्रेमी जी की ये कविता अतिथि कवि की पोस्ट के तहत पोस्ट की जा रही हैं । आप भी पढ़े और अपने कमेन्ट दे ।
फिर भी तुम्हें, नहीं करूंगी अशक्त!
मैंने समझकर अपना,
अपनत्व के कारण,
की तुम्हारी सेवा,
तुमको खिलाई मेवा,
स्वयं सोकर भूखे पेट,
सावन हो या जेठ,
तुमने की अर्जित शक्ति
मैं करती रही तुम्हारी भक्ति।
मैंने किया प्रेम से समर्पण
सौंपा तन-मन-धन,
तुम बन बैठे मालिक,
मुझे घर में कैद कर,
पकड़ा दिया दर्पण,
मैं सज-धज कर,
करती रही तुम्हारी प्रतीक्षा
तुमने पूरी की,
केवल अपनी इच्छा।
मैंने ही दी तुमको शिक्षा,
सहारा देकर बढ़ाया आगे
तुम फिर भी धोखा दे भागे,
कदम-कदम पर दिया धोखा,
शोषण करने का,
नहीं गवांया कोई मौका।
मैंने साथ दिया कदम-कदम पर,
अपने प्राण देकर भी,
बचाये तुम्हारे प्राण,
तुमने उसे मानकर मेरा आदर्श,
सती प्रथा थोप दी मुझ पर ।
बना लिया मुझको दासी,
वर्जित कर दी मेरे लिए काशी।
लगाते रहे कलंक पर कलंक,
तुम राजा रहे हो या रंक।
दिया निर्वासन दे न पाये आसन।
स्वयं विराजे सिंहासन।
मुझे छोड़ जंगल में,
चलाया शासन।
दिखावा करने को दिया आदर,
पल-पल दी घुटन,
पल-पल किया निरादर।
नर्क का द्वार कहकर,
घृणित बताया।
शुभ कर्मो से किया वंचित,
भोजन,शिक्षा ,स्वास्थ्य,
संपत्ति व मानव अधिकार,
छीन लिया मेरा, सब कुछ संचित।
पैतृक विरासत तुम्हारी,
मैं भटकी दहेज की मारी,
छीन लिया जन्म का अधिकार,
भ्रूण हत्या कर,
छू लिया,
विज्ञान का आकाश।
क्या सोचा है कभी?
मेरे बिन,
बचा पाओगे जमीं?
तड़पायेगी नहीं मेरी कमी?
मेरे बिन जी पाओगे?
अपना अस्तित्व बचाओगे?
हृदय-हीन होकर
कब तक रह पाओगे?
तुम्हारी ही खातिर,
जागना होगा मुझको,
तुम्हारी ही खातिर,
अर्जित करनी होगी शक्ति,
तुम्हें विध्वंस से बचाने की खातिर,
शिक्षा-धन-शक्ति से,
बनूंगी सशक्त!
फिर भी तुम्हें, नहीं करूंगी अशक्त!


© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Monday, December 15, 2008

आज का कटु सत्य!

जीवन भर
वह जीती रही
बड़ों से छोटों तक
सबके लिए ।
ढोती रही
घर के दायित्व
नूतन सृष्टि की
उन्हें जीवन औ' नाम दिया
वे एक प्रतीक बन
आज भी
अपने जीवन में खुश हैं।
वह तो जीवन भर
उनके चेहरे की खुशी में ही
जीती रही और खुश रही।
आज अशक्त,वृद्ध औ' असहाय,
कोई भी नहीं,
सबके अपने जीवन हैं
दायित्व हैं,
सब अपने वक्त् के पहले
विदा कह कर चले गए।
एक नारी की
कल्पना
यहाँ भी मुखरित हुई
एकाकीपन के भयावह आतंक से
ख़ुद को बचने के लिए
जड़ लिए शीशे चारों तरफ
कम से कम एकाकी तो नहीं,
अक्ष ही दिखते रहेंगे
अपने अलावा।
अन्तिम क्षणों की वेदना
किस तरह जी और किस तरह पी
वह जो सृष्टि कर्ता थी
अपने जीवन में
अकेले ख़ुद ही
एक कहानी बना गई.
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Tuesday, December 9, 2008

ममता का सन्मान

दिल दहलानेवाला खौफनाक मंज़र
चारों और से गोलियों की बौछार
और बम के धमाको की दहाड़े
इतनी आवाज़ों में भी उसे सुनाई दी
बस नन्हे मोशे की करुन पुकार
जो उसे बुला रहा था

अपने माता पिता के खून से भरा
उस नन्हें मन को पता न था क्या हुआ ?
अपनी जान की परवाह किए बिना
स्टोर रूम से दौड़ी नॅनी सॅम्यूल
गोलिओंसे बचती छुपती
गोद में उठा लिया मोशे
और भागी जान बचा कर
उस वक़्त मौत के ख़ौफ़ से ज़्यादा
ममता का पलड़ा भारी रहा
ऐसी वीरांगना पर गर्व होता है

नन्हे मोशे की नॅनी सॅम्यूल को इस्राईल के सवोच नागरी
पुरस्कार से सम्मानित किया गया
ऐसी निस्वार्थ ममता को ढेरो बधाई नन्हे मोशे के साथ सभी
की दुआए रहेंगी अपने जान की परवाह किए बिना,अपने खुद के
दो बच्चों की सोचे बिना , और इतनी दहशत में खास कर अपना
आपा ना खोकर सूझ बुझ से काम लेना आसान तो नही होता

Sunday, December 7, 2008

तस्वीर का दूसरा रुख

जब ही कोई औरत कपडे उत्तार कर
तस्वीर अपनी खिचाती हैं
सबको नग्नता उसमे नहीं
उसके काम मे नज़र आती हैं
पर उसकी नग्न तस्वीर
ना जाने क्यों ? ऊँचे दामो मे
मन बहलाव के लिये खरीदी जाती हैं ।
अभी ना जाने और कब तक
मन के कसैले पन को
भूलने के लिये लोग तेरी तस्वीर
अपने घरो , कमरों , दीवारों पर टांगेगे
किसी भी उम्र के हो वो
पर औरत की तस्वीर
यानी एक मन बहलाव का साधन
कभी किताबो मे , कभी पोस्टर मे
और कभी ब्लॉग पर घूमती हैं
तस्वीरे औरतो की

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Wednesday, December 3, 2008

लिपस्टिक पाउडर लगाने वाली भी देश चलाने का जज़्बा रखती है

कल महक की ये कविता नारी कविता ब्लॉग पर आयी हैं , सब से निवेदन हैं की जरुर पढे । दोबारा पोस्ट कर रही हूँ ।

कई बार अपनी क्षमता का
एहसास कराने पर भी
बिना ग़लती के अक्सर
उस पर
उंगलिया उठती है ?

बड़े होकर जो भटकते लोग
किसी
में हिम्मत नही उन्हे सुधारे
याद रखना ऐसो को सिर्फ़ एक नारी
एक मा ही तमाचा
रसीद कर सकती है

कुर्सी पर बैठे ढोल पीटने वालो
सुनाई दे
रही है हमारी आवाज़
लिपस्टिक पाउडर लगाने वाली भी
देश चलाने का जज़्बा रखती
है

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Monday, December 1, 2008

शहीदों को शत-शत नमन

डॉ मीना अग्रवाल जी की ये पोस्ट नारी ब्लॉग से मै यहाँ दे रही हूँ
उन शहीदों को शत-मीना नमन जिन्होंने अपना जीवन देश की खातिर न्योछावर कर दिया. उनके इस ऋण को हम कभी नहीं चुका पाएँगे. वो माता-पिता भी धन्य हैं जिन्होंने ऐसे भारत-रत्न को जन्म दिया. माँ के दर्द को तो एक माँ ही समझ सकती है,राजनीति करने वाले उसकी पीड़ा को क्या समझेंगे.माँ तो अब भी इंतज़ार कर रही है अपने लाडले का . और कह रही है-
छ्त के ऊपर विमान गुज़रा है
कल्पनाएँ निहारती हैं तुझे
अजनबी लोग इसमें हैं लेकिन
मेरी आँखें पुकारतीं हैं तुझे !
माम को तो विश्वास ही नहीं है कि उसका बेटा अब उसके आँसू पोंछने के लिए भी नहीं आएगा. उसका मन तो बार-बार यही कहता है-
तपन बढ़ी है तो तन-मन जला है अब के बरस
शरद की रुत में भी सूरज तपा है अब के बरस
चला गया है जो अश्कों को पोंछने वाला
हमारी आँखों में सूखा पड़ा है अब के बरस !
माँ अपनी अंतिम साँस तक बेटे के लिए शुभकामनाएँ ही भेजती रहती है-
वह अपनी आँखों में उमड़ी घटाएँ भेजती है
वह अपने प्यार की ठंडी हवाएँ भेजती है
कभी तो ध्यान के हाथों, कभी पवन के साथ
वह माँ है, बेटे को शुभकामनाएँ भेजती है !
ऐसी माँ को हृदय की संम्पूर्ण भावनाओं के साथ शत-शत नमन .
मीना अग्रवाल
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Saturday, November 29, 2008

नारी

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!


नारी
नारी नाम है उजाले का
नारी नाम है जीवन का
नारी नाम है प्रेम का
नारी ऐसी नदी है
जो बहती है निरंतर
देती है गति मानव को
सींचती है रिश्तों को
अपने खून-पसीने से
नारी उगाती है
संबंधों की फसल
अपने श्रम से
वह नहीं माँगती
प्रतिदान
वह तो चाहती है
बस सम्मान
जहाँ फैलती है
स्वर्णिम आभा प्रेम की
और जहाँ लहलहाते हैं
पौधे ममता के
नारी नाम है उस चरित्र का
जो पहुँचाता है
उच्चता के शिखर पर
नारी नाम है उस रोशनी का
जो देती है उजाला जग को
नारी नाम है उस दीपक का
जो जलता है हर क्षण नारी
देती है रोशनी अंधकार को
और तिल-तिल जलकर
मिटा देती है अपना अस्तित्व
पर दीपित करती है
मानवीय आत्मा को
नारी नाम है संगीत का
जो बिखरे स्वरों को
सँजोकर देती है
नया मधुरिम आकार
किसी अप्रचलित राग को
जो जोड़ती है
सितार के उन तारों को
जो टूटे हैं अधिक तानने से
नारी नाम है उस झंकार का
जो जोड़्ती है
उन बिखरे घुँघुरुओं को
जो थक गए हैं थिरकते-थिरकते
उन्हें ममता के धागे में पिरोकर
देती है नई गति
रूपायित करती है
नई ताल और नई लय
जो देती है नई पहचान
मानवता को
जिससे प्रकाशित है
धरती का कण-कण
नारी नाम है उस पुस्तक का
जो जलाती है ज्योति ज्ञान की
नारी नाम है वात्सल्य का
जिसके आँचल तले
पलती है पूरी मानवता
नारी नाम है जीवन-संगीत का
जो होता है झंकृत पल-पल
नारी नाम है उस अस्मिता का
जो देती है एक पहचान
समाज को
नारी नाम है प्रेरणा का
जो करती है प्रेरित
जन-जन को
नारी सागर है प्यार का
जो उमड़ता है पल-पल
और भिगो देता है
सबका तन-मन
नारी नाम है वीरता का
जो फूँक देती है प्राण
वीरों के सोए भावों में
नारी नाम है उस विश्वास का
जो जगा देती है
शक्ति कर्म की
नारी नाम है एसे साथी का
जो देता है सहारा
लड़खड़ाते पाँवों को
नारी नाम है
उस प्रकाश- स्तंभ का
जो देती है नेत्र-ज्योति
दृष्टिहीनों को
खड़ी रहती है
अडिग और अकेली
संघर्ष के क्षणों में भी
नारी नाम है
उस जीवनधारा का
जो गतिमान है सदियों से
जो जीवन-प्रदायिनी है
युगों-युगों से
नारी की इस संपूर्णता को
शत-शत नमन !

डॉ. मीना अग्रवाल्

Thursday, November 27, 2008

शोक और आक्रोश


आज टिपण्णी नहीं साथ चाहिये । इस चित्र को अपने ब्लॉग पोस्ट मे डाले और साथ दे । एक दिन हम सब सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दी ब्लॉग पर अपना सम्मिलित आक्रोश व्यक्त करे । चित्र आभार

Monday, November 24, 2008

बहती बलखाती चंचला

बहती बलखाती चंचला
खुद में एक उन्माद लिए चलती हूँ
या कोई जुनून सवार है हम पर
मिलो मिल की राहें तय करती हुई
मंज़िल-ए-निशा की चाहत में
निकल पड़ी हूँ
एक गहरी उम्मीद के सहारे
इस राह पर चलते हुए हर मोड़ पर
कुछ बदलाव आएगा
मैं कोशिश करती रहूंगी
बिना रुके ,बिना डरे
कुछ हासिल हुआ है
कुछ बाकि ..

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Thursday, November 20, 2008

कर्म करो कुछ ऐसे!

यदि नारी हो
तो क्या?
निर्बल मत बनो,
याचना के लिए
कर मत उठाओ,
कर्म कर उन्हें
सार्थक बनाओ ।
कर्म कभी होता निष्फल नहीं,
कम कभी अधिक भी देता है,
जन्म लेने की यही सार्थक दिशा होगी
ममता का जो सागर
ईश्वर ने दिया है
सिक्त कर प्रेम से
खुशी कुछ चेहरों पर लाओ
कभी इन हाथों से
उठाकर सीने से लगाओ
कभी इन हाथों से
आंसू किसी के सुखाओ
दीप एक आशा का
कर्म कर सबमें जगाओ
ज्योति उनके भी
मन में जलाकर
नई दिशा सबको दिखाओ
सोचो एक दीप जलाकर
प्रकाश कितनों को देता है
स्वयं को मिटा कर
रास्ता दिखा जाता है
हमसे सार्थक वही,
मनुज बनकर हम भी
क्यों न सार्थक हों।

Sunday, November 9, 2008

विश्वास

© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
विश्वास
तुम किसी को कुछ भी कहो
किसी को डाँटो, प्यार करो
पर मैं कुछ न बोलूँ
मुँह न खोलूँ
और बोलने से पहले
स्वयं को तोलूँ
फिर कैसे जीऊँ !
समाज की
असंगतियाँ और विसंगतियाँ
कब होंगी समाप्त
कब मिलेगा समान रूप से
जीने का अधिकार
रेत होता अस्तित्व
कब लेगा सुंदर आकार
किसी साकार कलाकृति का !
इसी आशा में इसी प्रत्याशा में
जी रही है आज की नारी
कि कोई तो कल आएगा
जो देगा ठंडक मन को
काँटों में फूल खिलाएगा
देगा हिम्मत तन-मन को
जीवन को
खुशियों से महकाएगा
तन में आस
जीने की प्यास और
मन में विश्वास जगाएगा
पूरा है भरोसा
और पूरी है आस्था
कि वह अनोखा
एक दिन अवश्य आएगा !

आखिर क्यों

ये कविता डा.मीना अग्रवाल ने नारी ब्लॉग पर पोस्ट की हैं । इस को मे यहाँ पोस्ट कर रही हूँ , मीना जी के लिये ब्लोगिंग एक नया मीडियम हैं अपनी अभिव्यक्ति का । नारी की सदस्य बनने के बाद ये उनकी पहली पोस्ट हैं । आप सब भी पढे ।

आखिर क्यों
सहती रहती है नारी
शायद इसलिए
कि उसने टूटकर भी
नहीं सीखा है टूटना
लेकिन एक अहम सवाल
कौंधता है
मस्तिष्क में बार-बार
कि कब तक सहेगी
और टूट्ती रहेगी
इसी तरह
जन्म होते ही
समाज के सुधारक
तथाकथित संभ्रांत जन
क्यों देखते हैं बेटी को
निरीह और उदास आँखों से
जन्म पर
क्यों नहीं बजतीं
शहनाइयाँ आँगन में
क्यों नहीं गाए जाते
मंगलगीत और बधाइयाँ
क्यों नहीं बाँटी जाती
मिठाई पूरे गाँव में
आखिर क्यों ?
क्यों नहीं
खेलने दिया जाता
स्वच्छंदता के साथ
बेटों की तरह
क्यों नहीं पढ़ने के लिए
भेजा जाता स्कूल
और यदि
स्कूल भेजा भी गया
तो रहती है उससे
यही अपेक्षा
कि वह घर आकर
कामों में हाथ बटाए
क्यों बेटों को
मिलता है दुलार
दिया जाता है
पौष्टिक आहार
और बेटी को
बचा हुआ भोजन
आखिर क्यों ?
बेटी को
क्यों नहीं दिया जाता
मज़बूत आधार
बराबर का अधिकार
क्यों उसकी इच्छाओं की
पूर्ति नहीं की जाती
विवाह के बाद
क्यों उसकी पहचान
नहीं दी जाती
क्यों समझा जाता है
उसे मशीन
क्यों नहीं होती
उसके पास
पंख फैलाने के लिए ज़मीन
आखिर क्यों ?
समाज के
अत्याचारों का ताप
क्यों सुखा देता है
उसे आँसू
क्या उसके मन में
नहीं उठता है तूफान
क्या उसके अंतरतम में
नहीं है कोई भावना
फिर क्यों
उसकी बात को
किया जाता है अनसुना
क्यों उसे
सबकुछ सहकर भी
चुप रहने के लिए
किया जाता है बाध्य
आखिर क्यों ?
वो टूट्कर भी
कण-कण जोड़ती है
सबको जोड़कर
ग़लत को भी
सही राह पर मोड़ती है
बिखरे हुए परिवार
और फिर समाज को
परस्पर तिल-तिल सहेजती है
फिर क्यों
उसके टूटे तन-मन को
नहीं समेटता ये समाज
नारी की दुश्मन
नारी ही क्यों है आज
क्यों उसके सपने
नहीं ले पाते हैं आकार
क्यों है वह लाचार
क्यों नहीं उसे
बनने दिया जाता है
उन्मुक्त आकाशचारी
क्यों पिंजड़े में बन्द
दूसरों के स्वार्थ की
भाषा बोलने के लिए
मज़बूर है नारी
क्यों उड़ने से पहले ही
काट दिए जाते हैं
उसके नन्हे-नन्हे
कोमल-कोमल पंख
आखिर क्यों ?
ग़लती सबसे होती है
लेकिन उसकी
एक छोटी-सी ग़लती
होती है
हज़ार के बराबर
और पुरुष को
हज़ार ग़ल्तियाँ
करने पर भी
वही स्म्मान वही आदर
आखिर क्यों ?
क्यों है इतना भेद-विभेद
क्यों है इतना दृष्टिभेद
आखिर क्यों ?
जब तक इस जलते हुए
सवाल का उत्तर
नहीं मिलता
जब तक नारी की
आँख के आँसू
बनकर सैलाब
नहीं ले जाते बहाकर
समाज के आडंबरों की
ऊँची-ऊँची गगनचुंबी
अट्टालिकाओं को
तब तक नारी­-मन
रहेगा भटकता
होते रहेंगे अत्याचार
होती रहेंगी भ्रूणहत्याएँ
इसी तरह !

डा. मीना अग्रवाल






© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Tuesday, October 28, 2008

शुभ दीपावली!




परमार्थ में जीवन को ही मिटा दे,
दीप सा दधीचि दूसरा हुआ कहाँ?
वह तो जल पूरा गया फिर भी,
हर मन में उजाला हुआ कहाँ?
एक दीप प्रेम का जलाएं,
जो हर मन का कलुष मिटाए,
सूनी आँखों में फिर से ,
एक जीवन ज्योति जलाये,
आओ ऐसी एक नयी दीपावली मनाएं.

हमारे "हिन्दी ब्लॉग समूह" को सपरिवार दीपावली शत-शत मंगलमय हो!

Monday, October 27, 2008

शुभा की कुछ और कविताएं

चिट्ठा चर्चा में अनूप शुक्ला ने `औरतों की कविताएं' पसंद करते हुए उनमें से एक कविता उद्धृत भी की है। उनकी एक व्यंग्य भरी शिकायत मेरी एक पंक्ति पर भी है और उन्होंने कहा है - `औरतों की कवितायें : औरतों की हैं,औरतों के बारे में हैं, औरतों के लिए हैं। मर्द पड़ेंगे तो समझ लें!`
सबसे पहले तो माफी औरतों की कविताओं को औरतों की कहने के लिए। वैसे भी हम गुलामों को कोई भी काम अपने लिए करने की मनाही रही है। अभी तो हमारे उन कामों का भी कोई खाता नहीं है जो सदियों से पुरुषों की सेवा में कए जा रहे हैं। लिखना-पढ़ना तो यों भी हमारे लिए सदियों तक वर्जित रहा। वैसे इन कविताओं को औरतों के लिए कहने के पीछे कोई मंशा नहीं थी। पुरुष वाकई हमारी लिखी चीजें पढ़ना, उन पर विचार करना और इस दुनिया को ज्यादा न्यायसंगत बनाने की लड़ाई में साथ देना चाहें तो इससे बेहतर क्या हो? आखिर जिस बेहतर समाज की लड़ाई हम औरतों के कंधों पर है, वो बेहतर समाज यहां रहने वाले सभों का ही है और इस लड़ाई में जिम्मेदारी भी सभों की बनती है।

रचना ने शुभा के बारे में जानना चाहा है, हालांकि अभी आलोचना की पुरुष दुनिया के पास एसे टूल्स नहीं हैं जो हम औरतों की लिखे-कहे को और उसके पीछे छिपे सार को देख सकें। लेकिन इस पुरुष दुनिया के पास एसे टूल्स बहुतायत में हैं जिनके जरिए वह हर विद्रोही स्वर को अनुकूलित कर लेती है। हम देख सकती हैं कि इन दिनों महिला लेखन के नामपर बहुतायत में एसा लिखा जा रहा है जो पहली नजर में विद्रोह लगता तो है लेकन साहित्य की दुनिया के संचालकों को जरा भी विचलित करने के बजाय सुकून देता है। धुर स्त्री विरोधी कट्टरवादी संघों-जमातों की बात छोड़ दें, स्त्री मुक्ति के मसीहा बने बैठे कितने ही राजेंद्र यादवों (यहां तमाम प्रगतिशील नामवर पुरुषों के नाम बदल-बदल कर पढ़ें) को अपनी छांव में एसा स्त्री लेखन पालने-पोसने का खासा शौक रहा है। सौभाग्य से शुभा की जो भी चीजें इधर-उधर छपीं देखीं, वे संरक्षकों के इस सुकून को भंग करती हैं।


शुभा अलीगढ़ में पैदा हुईं और एमए तक की शिक्षा उन्होंने वहीं पूरी की। 1977 के आसपास के कुछ वर्ष उन्होंने जेएनयू में बिताए। रोहतक (हरियाणा में) के एक कालेज में पढ़ाती हैं। नवजागरण मुहिम में बतौर एक्टिविस्ट हरियाणा के गांवों की खासी खाक छान चुकी हैं और इस वजह से लिखना बुरी तरह प्रभावित रहा है। छपा तो और भी कम है।
बहरहाल, दोस्तों के अनुरोध पर शुभा की कुछ और कविताएं-

आदमखोर
-------


एक स्त्री बात करने की कोशिश कर रही है
तुम उसका चेहरा अलग कर देते हो धड़ से
तुम उसकी छातियां अलग कर देते हो
तुम उसकी जांघें अलग कर देते हो

तुम एकांत में करते हो आहार
आदमखोर! तुम इसे हिंसा नहीं मानते


आदमखोर उठा लेता है
छह साल की बच्ची
लहूलुहान कर देता है उसे

अपना लिंग पोंछता है
और घर पहुँच जाता है
मुंह हाथ धोता है और
खाना खाता है

रहता है बिल्कुल शरीफ आदमी की तरह
शरीफ आदमियों को भी लगता है
बिल्कुल शरीफ आदमी की तरह।


सवर्ण प्रौढ़ प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच
----------------------
सवर्ण प्रौढ़ प्रतिष्ठित पुरुषों के बीच
मानवीय सार पर बात करना ऐसा ही है
जैसे मुजरा करना
इससे कहीं अच्छा है
जंगल में रहना पत्तियां खाना
और गिरगिटों से बातें करना।


अकलमंदी और मूर्खता
--------------

स्त्रियों की मूर्खता को पहचानते हुए
पुरुषों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है

इस बात को उलटी तरह भी कहा जा सकता है

पुरुषों की मूर्खताओं को पहचानते हुए
स्त्रियों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है

वैसे इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि
स्त्रियों में भी मूर्खताएं होती हैं और पुरुषों में भी

सच तो ये है
कि मूर्खों में अक्लमंद
और अक्लमन्दों में मूर्ख छिपे रहते हैं
मनुष्यता ऐसी ही होती है

फिर भी अगर स्त्रियों की
अक्लमंदी पहचाननी है तो
पुरुषों की मूर्खताओं पर कैमरा फोकस करना होगा।

Sunday, October 26, 2008

औरतों की कविताएं

ये कविताएं औरतों की हैं,औरतों के बारे में हैं, औरतों के लिए हैं। कवयित्री हैं शुभा। इस सीरीज की एक कविता मैंने अपने ब्लॉग पर डाली थी। अब सारी कविताएं एक साथ, नारी के कविता ब्लॉग पर।

औरतें
औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैं
मिट्टी के चूल्हे
और झाँपी बनाती हैं

औरतें मिट्टी से घर लीपती हैं
मिट्टी के रंग के कपडे पहनती हैं
और मिट्टी की तरह गहन होती हैं

औरतें इच्छाएं पैदा करती हैं और
ज़मीन में गाड़ देती हैं

औरतों की इच्छाएं
बहुत दिनों में फलती हैं
----------


2-औरत के हाथ में न्याय

औरत कम से कम पशु की तरह
अपने बच्चे को प्यार करती है
उसकी रक्षा करती है

अगर आदमी छोड़ दे
बच्चा मां के पास रहता है
अगर मां छोड़ दे
बच्चा अकेला रहता है

औरत अपने बच्चे के लिए
बहुत कुछ चाहती है
और चतुर ग़ुलाम की तरह
मालिकों से उसे बचाती है
वह तिरिया चरित्तर रचती है

जब कोई उम्मीद नहीं रहती
औरत तिरिया चरित्तर छोड़कर
बच्चे की रक्षा करती है

वह चालाकी छोड़
न्याय की तलवार उठाती है

औरत के हाथ में न्याय
उसके बच्चे के लिए ज़रूरी
तमाम चीजों की गारंटी है।
------------

3- औरत के बिना जीवन

औरत दुनिया से डरती है
और दुनियादार की तरह जीवन बिताती है
वह घर में और बाहर
मालिक की चाकरी करती है

वह रोती है
उलाहने देती है
कोसती है
पिटती है
और मर जाती है

बच्चे आवारा हो जाते हैं
बूढ़े असहाय
और मर्द अनाथ हो जाते हैं
वे अपने घर में चोर की तरह रहते हैं
और दुखपूर्वक अपनी थाली खुद मांजते हैं
-----------

4-औरतें काम करती हैं

चित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों की
दुनिया के बाहर
मालिकों की दुनिया के बाहर
पिताओं की दुनिया के बाहर
औरतें बहुत से काम करती हैं

वे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठ
नौजवान बना देती हैं
आटे को रोटी में
कपड़े को पोशाक में
और धागे को कपड़े में बदल देती हैं।

वे खंडहरों को
घरों में बदल देती हैं
और घरों को कुंए में
वे काले चूल्हे मिट्टी से चमका देती हैं
और तमाम चीज़ें संवार देती हैं

वे बोलती हैं
और कई अंधविश्वासों को जन्म देती हैं
कथाएं लोकगीत रचती हैं

बाहर की दुनिया के आदमी को देखते ही
औरतें ख़ामोश हो जाती हैं।

5-निडर औरतें

हम औरतें चिताओं को आग नहीं देतीं
क़ब्रों पर मिट्टी नहीं देतीं
हम औरतें मरे हुओं को भी
बहुत समय जीवित देखती हैं

सच तो ये है हम मौत को
लगभग झूठ मानती हैं
और बिछुड़ने का दुख हम
खूब समझते हैं
और बिछुड़े हुओं को हम
खूब याद रखती हैं
वे लगभग सशरीर हमारी
दुनियाओं में चलते-फिरते हैं

हम जन्म देती हैं और इसको
कोई इतना बड़ा काम नहीं मानतीं
कि हमारी पूजा की जाए

ज़ाहिर है जीवन को लेकर हम
काफी व्यस्त रहती हैं
और हमारा रोना-गाना
बस चलता ही रहता है

हम न तो मोक्ष की इच्छा कर पाती हैं
न बैरागी हो पाती हैं
हम नरक का द्वार कही जाती हैं

सारे ऋषि-मुनि, पंडित-ज्ञानी
साधु और संत नरक से डरते हैं

और हम नरक में जन्म देती हैं
इस तरह यह जीवन चलता है
----------

6- बाहर की दुनिया में औरतें


औरत बाहर की दुनिया में प्रवेश करती है
वह खोलती है
कथाओं में छिपी अंतर्कथाएं
और न्याय को अपने पक्ष में कर लेती हैं
वह निर्णायक युद्द को
किनारे की ओर धकेलती है
और बीच के पड़ावों को
नष्ट कर देती है

दलितों के बीच
अंधकार से निकलती है औरत
रोशनी के चक्र में धुरी की तरह

वह दुश्मन को गिराती है
और सदियों की सहनशक्ति
प्रमाणित करती है

Sunday, October 12, 2008

नारी - व्यथा

रेखा श्रीवास्तव की ये कविता हम अतिथि कवि की कलम से के तहत पोस्ट कर रहे हैं ।लेखिका रेखा श्रीवास्तव कानपुर की निवासी हैं और हिन्दी ब्लोगिंग मे नयी हैं उनके ब्लॉग पर उनकी ये कविता देखी , संपर्क सूत्र ना होने की वजह से संपर्क नहीं कर सकी । कविता को पढे जरुर और टिप्पणी भी दे की क्यों एक विवाहिता का दर्द इतना गहरा होता हैं ।

नारी - व्यथा

जीवन जिया,
मंजिलें भी मिली,
एक के बाद एक
बस नहीं मिला तो
समय नहीं मिला।
कुछ ऐसे क्षण खोजती ही रही ,
जो अपने और सिर्फ अपने लिए
जिए होते तो अच्छा होता।
जब समझा अपने को
कुछ बड़े मिले कुछ छोटे मिले
कुछ आदेश और कुछ मनुहार
करती रही सबको खुश ।
दूसरा चरण जिया,
बेटी से बन बहू आई,
झूलती रही, अपना कुछ भी नहीं,
चंद लम्हे भी नहीं जिए
जो अपने सिर्फ अपने होते।
पत्नी, बहू और माँ के विशेषण ने
छीन लिया अपना अस्तित्व, अपने अधिकार
चाहकर न चाहकर जीती रही ,
उन सबके लिए ,
जिनमें मेरा जीवन बसा था।
अपना सुख, खुशी निहित उन्हीं में देखि
थक-हार कर सोचा
कुछ पल अपने लिए
मिले होते
ख़ुद को पहचान तो लेती
कुछ अफसोस से
मुक्त तो होती
जी तो लेती कुछ पल
कहीं दूर प्रकृति के बिच या एकांत में
जहाँ मैं और सिर्फ मैं होती।
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Thursday, October 2, 2008

लाईट लो बिटिया , पत्नी बनकर जीवन लाईट होता हैं

आज एक ब्लॉग पर एक कविता पढी और फिर ये लिखा । पत्नी की भावनाओं को हमेशा लाईट ही लिया जाता हैं । ये कविता केवल एक कोशिश हैं पत्नी को लाईट ना समझ कर सीरियस समझने की । और बात अगर मनवानी पड़े तो समझिये की बात मे कुछ ग़लत जरुर हैं क्युकी पत्नी के पास भी एक दिमाग होता हैं सही और ग़लत समझने का । पत्नी आप की दासी नहीं होती की हर बात माने

तुम सदियों से लाईट लेते रहे
पत्नी पर व्यंग करते रहे और
सुधिजन संग तुम्हारे मंद मंद हँसते रहे
घर मे हमको लाकर
व्यवस्था के नाम पर
वो सब हम से करवाया
बिना हम से पूछे की
क्या हमने करना भी चाहा
हमारी पढाई गयी चूल्हे मे
तुम्हारी पढ़ाई से तरक्की हुई
हमारे माता पिता का सम्मान
उनके दिये हुए सामान से
तुम्हारे माता पिता का सम्मान
तुम्हे पैदा करने से
हम चाकर तुम मालिक
घर तुम्हारा बच्चे तुम्हारे वंश तुम्हारा
तुम हो तो हम श्रृगार करे
ना हो तो सफ़ेद वस्त्र पहने
हम पर कब तक व्यंग
और फब्तियां कसोगे
उस दिन समझोगे की
पिता की पीडा क्या होती हैं
जब अपनी बेटी ब्याहोगे
हम तब भी उसको यही समझायेगे
जो हमारी माँ ने हमको समझाया
बिटिया निभा लो जैसे हमने निभाया
समझोते का नाम जिन्दगी हैं
और जिन्दगी जीने का अधिकार
पति का हैं
पत्नी को तो जीवन
काटना होता हैं
लाईट लो बिटिया
पत्नी बनकर जीवन लाईट होता हैं
क्योकि भार तुम्हारा , तुम्हारा पति कहता हैं
की वह ढोता हैं
और
समय असमय व्यवस्था के नाम पर
पत्नी को कर्तव्य बोध कराता हैं
फिर
ख़ुद लाईट हो जाता हैं