Friday, April 30, 2010
जीने की ललक अभी बाकी है
स्वत्व पर मेरे पर्दा डाला ,
मुझको अपने जैसा ढाला ,
बातों ही बातों में मेरा ,
मन बहलाना चाहा ,
स्वावलम्बी ना होने दिया ,
अपने ढंग से जीने न दिया |
तुमने जो खुशी चाही मुझसे ,
उसमें खुद को भुलाने लगी ,
अपना मन बहलाने लगी ,
अपना अस्तित्व भूल बैठी ,
मन की खुशियां मुझ से रूठीं ,
मै तुम में ही खोने लगी |
आखिर तुम हो कौन ?
जो मेरे दिल में समाते गए ,
मुझको अपना बनाते गए ,
प्रगाढ़ प्रेम का रंग बना ,
उसमें मुझे डुबोते गए ,|
पर मै ऊब चुकी हूं अब ,
तुम्हारी इन बातों से ,
ना खेलो जजबातों से,
मुझको खुद ही जी लेने दो ,
कठपुतली ना बनने दो ,
उम्र नहीं रुक पाती है ,
जीने कीललक अभी बाकी है |
आशा
आशा जी ने नारी ब्लॉग पर कमेन्ट दिया था वहाँ से मे उनके ब्लॉग तक गयी और इस कविता को पढ़ा आप भी पढे
उनके ब्लॉग पर कमेन्ट दे शायाद वो पढ़े क्युकी उनका ईमेल आ ई डी नहीं मिला हैं सो उनको सूचित नहीं कर सकी
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Saturday, April 17, 2010
विश्वास
तुम किसी को कुछ भी कहो
किसी को डाँटो, प्यार करो
पर मैं कुछ न बोलूँ
मुँह न खोलूँ
और बोलने से पहले
स्वयं को तोलूँ
फिर कैसे जीऊँ !
समाज की असंगतियाँ
और विसंगतियाँ
कब होंगी समाप्त
कब मिलेगा समान रूप से
जीने का अधिकार,
रेत होता अस्तित्व
कब लेगा सुंदर आकार
किसी साकार कलाकृति का !
इसी आशा में, इसी प्रत्याशा में
जी रही है आज की नारी
कि कोई तो कल आएगा
जो देगा ठंडक मन को,
काँटों में फूल खिलाएगा
देगा हिम्मत तन-मन को,
खुशियों से महकाएगा
जीवन को !
जागेगी तन में आस,
जीने की प्यास
और जागेगा
मन में विश्वास !
पूरा है भरोसा
और पूरी है आस्था
कि वह अनोखा एक दिन
अवश्य आएगा !
डॉ. मीना अग्रवाल
Monday, April 12, 2010
'मज़हब' की सलीब पर टंगी औरतें
आज़ाद मुल्क की ग़ुलाम औरतें...
मुस्लिम समाज में
जन्म लेने की
उम्रभर सज़ा भोगतीं
बेबस, लाचार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
शाहबानो, इमराना
और गुड़िया-सी
कठमुल्लों के ज़ुल्मों की
शिकार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
'मज़हब' की सलीब पर तंगी
इंसानों के बाज़ार में
ऐश का सामान-सी
हरम में चार-चार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
इंसाफ़ के लिए
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर
हैवानों के हाथों
सरेआम मरतीं संगसार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
मुस्लिम समाज में
जन्म लेने की
उम्रभर सज़ा भोगतीं
बेबस, लाचार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
शाहबानो, इमराना
और गुड़िया-सी
कठमुल्लों के ज़ुल्मों की
शिकार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
'मज़हब' की सलीब पर टंगी
इंसानों के बाज़ार में
ऐश का सामान-सी
हरम में चार-चार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
इंसाफ़ के लिए
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर
हैवानों के हाथों
सरेआम मरतीं संगसार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
पुरुषों को जन्म देने वालीं
मर्दों के शोषण से कराहती
ख़ुद जीने का मांगती
अधिकार औरतें...
आज़ाद मुल्क की
ग़ुलाम औरतें...
-फ़िरदौस ख़ान
Monday, March 29, 2010
नारी और नदी
मौसम की हर मार को सहना
क्योंकि नदी बहने के साथ-साथ
सिखाती है गतिशील रहना
देती है संदेश निरंतरता का
देती है संदेश तत्परता का
नदी देती है शीतलता हृदय को
देती है तरलता मन को
सिखाती है बँधना किनारों से
सिखाती है जुड़ना धरती से !
नदी कराती है समन्वय मौसम से
कराती है मिलन धारा से
देती है संदेश प्रेम का
नदी नहीं सिखाती भँवर में फँसना
वह तो सिखाती है भँवर से उबरना !
नदी नाम है निरंतरता का
नदी नाम है एकरूपता का
नदी ही नाम है समरूपता का
नदी कल्याणी है मानवता की
वह तो संवाहक है नवीनता की
आओ हम भी सीखें नदी से
कर्मपथ पर गतिशील रहना
कंटकाकीर्ण मार्ग पर
निरंतर आगे ही आगे चलना,
नदी की ही तरह निरंतर बहना,
और हर मौसम में
या फिर तूफ़ानी क्षणों में
दृढ़ता के साथ
अडिग खड़े रहकर
ऊँचाइयों के चरम शिखर की
अंतिम सीढ़ी पर पहुँचना !
डॉ.मीना अग्रवाल
नारी की सृष्टि
एक क्षेत्र है जहां
पुरुष का प्रवेश नहीं
नितांत नारी की
सृष्टि है वह
पुरुष का समावेश सही,
गृह संसार का अनाड़ी है
पुरुष प्राणी
दुनिया जीतने का
दावा करने वाले
भी बगलें झांकते
यहां!
नहीं असंभव ब्रह्माण्ड में विचरना
किन्तु
कठिन है
रसोई में चावल ढूंढना;
अन्नपूर्णा के
सपनों का स्वर्ग!!!
जहां यथार्थ से
लोहा लिया जाता है
वर्तमान को
संवारते संवारते
शुभकामनाओं के साथ
भविष्य रचा जाता है
तमाम झंझावातों का
कवच है,
शंका है न
डर ,झिझक
डगर के कांटों से
बिना किसी बाधा के
नारी निर्द्वदं
है चलती जाती
साम्राज्ञी की भांति
सभी बाधायें
चटकाती जाती
चुटकियों में सुलझाती
विकट
पारिवारिक पहेलियां,
मानस संसार की
व्याधियों का दमन
धैर्य से करती नारी
सहज सधे हाथों से
साधती
घर परिवार और
परिचित
बच्चों से लेकर
नौकरों तक
भर ममत्व उंड़ेलती ;
समाज
परिवार
बंधुजन को एक
डोर से बांधती;
पुरातन से
अधुनातन
सदैव
रुप भले
नवीन नित
किंतु सदावाही है
उसमें
ममत्व
प्रेम
स्नेह
संघर्ष
संतोष.........किरण राजपुरोहित नितिला
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Sunday, March 28, 2010
इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।
इसलिये
कि उसने मेरे साथ सात फेरे लिये
कि उसने मुझे सामाजिक सुरक्षा दी
कि उसने मेरे साथ घर बसाया
कि उसने मुझे माँ बनाया
सौपा मैने अपना शरीर उसे
इस लिये
क्योंकि "उस समय" उसे जरुरत थी
मेरे शरीर की , मेरे प्यार , दुलार की
और उसके बदले नहीं माँगा मैने
उससे कुछ भी , ना रुपया , ना पैसे
ना घर , ना बच्चे , ना सामाजिक सुरक्षा
फिर भी मुझे कहा गया की मै दूसरी औरत हूँ !!
घर तोड़ती हूँ ।
प्रश्न है मेरा पहली औरतो से , क्या कभी तुम्हें
अपनी कोई कमी दिखती है ??
क्यो घर से तुम्हारे पति को कहीं और जाना पड़ता है ?
क्यो हमेशा तुम इसे पुरुष की कमजोरी कहती हो ?
क्यो कभी तुम्हें अपनी कोई कमजोरी नहीं दिखती ?
जिस शरीर को सौपने के लिये ,
तुम सात फेरो की शर्ते लगती हो ,
उसे तो मैने योहीं दे दिया बिना शर्त ,
बिना शिक़ायत
इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।
ये एक पुरानी कविता हैं लेकिन आज कल के संदर्भो मे इतनी पुरानी भी नही हैं ब्लॉग पर हर जगह आज लिव इन रिलेशन पर चर्चा हो रही हैं जबकि मैने ये कविता १७ दिसम्बर २००७ को लिखी थी और फिर १० जुलाई 2008 कि पोस्ट मै इसी ब्लॉग पर इस कविता को पुनेह डाला था और काफी बहस हुई थी आप ही देखे और अपने विचार दे
उसी पुराने लिंक पर
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Friday, March 26, 2010
प्रीत --- वि-- प्रीत
भाग १
सालों बाद
घर से बाहर रहा
पति लौट आया
घर मे ताँता लग गया
बधाईयों का, मिठाईयों का
आशीष वचनों का, प्रवचनों का
गैस पर चाय बनाती
पत्नी सोच रही हैं
क्या वो सच में भाग्यवान हैं ?
कि इतना घूम कर पति
वापस तो घर ही आया
पर पत्नी खुश हैं कि
अब कम से कम घर से बाहर
तो मै जा पाऊँगी
समाज मै मुहँ तो दिखा पाऊँगी
कुलक्षिणी के नाम से तो नहीं
अब जानी जाऊँगी
भाग २
सालों बाद
घर से बाहर रही
पत्नी लौट आयी
घर में एक सन्नाटा है
व्याप्त है मौन
जैसे कोई मर गया हो और
मातम उसका हो रहा है
दो चार आवाजें जो गूँज रही हैं
वह पूछ रही हैं
कुलक्षिणी क्यों वापस आयी ??
जहाँ थी वहीं क्यों नहीं बिला गयी
सिगरेट के कश लेता
सोच रहा हैं पति
समाज मे क्या मुँह
अब मै दिखाऊँगा
कैसे घर से बाहर
अब मै जाऊँगा
और घर में भी
इसके साथ
अब कैसे मैं रह पाऊँगा ??
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Thursday, March 18, 2010
हम किराये पर लेते हें विदेशी कोख
पहले बेटियों को मारते थे
बहुओ को जलाते थे
अब तो हम
कन्या भ्रूण हत्या करते है
दूर नहीं है वो समय
जब हम फक्र से कहेगे
पुत्र पैदा करने के लिये
हम किराये पर लेते हें
विदेशी कोख
कुछ पुराने कमेंट्स यहाँ देखे और अपनी बात भी वही कहे
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Tuesday, March 16, 2010
तुम क्यूं
पुरूषों को
जो नित्य ही मनुष्य के खोल
से बाहर आते हैं,
अधिकतर पुरूष का भी लबादा
नहीं रखते
बन जाते है हाड़ मांस के वहषी
सिर्फ मादा ही नजर आती है
हर नारी
जो कभी माँ,बहन-पत्नि होती है,
भभूका सा काबिज हो जाता है
हर लेता है समस्त विवेक
पुरूष से,मनुष्य से,
ओ! कापुरूषों क्यूं नही छोड़ देते
ये वहशीपन
जो दुनिया को गर्त में धकेल रहा है!
..किरण राजपुरोहित नितिला
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Thursday, March 11, 2010
वह चीख चीखकर कहती है मै आज की नारी हूँ
हर बात मे पुरुष से उसकी बराबरी है
शिक्षित है कमाती है
खाना बनाने जेसे
निकृष्ट कामो मे
वक़्त नहीं गवाँती है
घर कैसे चलाए
बच्चे कब पैदा हो
पति को वही बताती है
क्योकि उसे अपनी माँ जैसा नहीं बनना था
पति को सिर पर नहीं बिठाना था
उसे तो बहुत आगे जाना था
अपने अस्तित्व को बचाना था
फिर क्यों
आज भी वह आंख
बंद कर लती है
जब की उसे पता है
की उसका पति कहीँ और भी जाता है
किसी और को चाहता है
समय कहीं और बिताता है
क्यों आज भी वह
सामाजिक सुरक्षा के लिये
ग़लत को स्विकारती है
सामाजिक प्रतिशठा के लिये
अपनी प्रतिशठा को भूल जाती है
और पति को सामाजिक प्रतिशठा कव्च
कि तरह ओढ़ती बिछाती है
पति कि गलती को माफ़ नहीं
करती है
पर पति की गलती का सेहरा
आज भी
दूसरी औरत के स्रर पर
रखती है
माँ जेसी भी नहीं बनी
और रूह्रिवादी संस्कारो सै
आगे भी नहीं बढी.
फिर भी वह चीख चीखकर कहती है
मै आज की नारी हूँ
पुरुष की समान अधिकारी हूँ
कमेन्ट यहाँ दे
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Tuesday, March 9, 2010
यह एक दिन
हर वर्ष आता है
या शायद
लाया जाता है
यह दिन ,
आंकड़ों को टटोलते हुये
कभी कहता 1000 पर 945
कभी 33प्रतिशत
कभी 18 प्रतिशत ,
इनमें हेरफेर से
हो जाता है
क्या समाज में परिवर्तन ?
बदल तो नही जाती
मानसिकता ,
प्रकृति की प्रकृति
और कुछ कुछ नियति,
कम तो नही होती
रोज की घटनायें
प्रताड़ना
गली सड़क पर
उछलते फिकरे
बसों में हाथों की हरकतें
भीड़ में ठेलमठेल
मां से शुरु होकर
बहन तक जाती गालियां
लड़कियों की पाबंदी
बचपन से स्त्री बनने का दबाव
और नुमाइश लड़की की
कुछ लोगों के सामने
जो आखिर पुरुष बन
तय करता है
उसका भविश्य
अपनी शर्तों पर
रिवाजों की दुहाई देकर !
सदियों की मानसिकता ही तो
कायम रखता है ,
कितनी ही उचाईयां छूकर भी
समाज की
प्रश्नवाचक दृष्टि
वक्रता कम नही होती
वह तीक्ष्ण होकर
कसौटियों के कांटे
और बिछाकर कहता
अब!
पार होकर
दिखाओ तो जानें!
..............किरण राजपुरोहित नितिला
Saturday, March 6, 2010
हे नर क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
कि नारी को हथियार बना कर
अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
कि नारी शरीर कि
संरचना को बखाने बिना
साहित्यकार नहीं समझे जाते हो
तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालय
बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
वह फैशन वीक मे काम करे
तो नंगी नाच रही है
तुम्हारी तारीफ हो तो
तुम तारीफ के काबिल हो
उसकी तारीफ हो तो
वह "औरत" की तारीफ है
तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
वह वेश्या बने तो बदनाम है
हे नर
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
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Friday, March 5, 2010
अनैतिकता बोली नैतिकता से
मंडियों , बाजारों और कोठो
पर मेरे शरीर को बेच कर
कमाई तुम खाते थे
अब मै खुद अपने शरीर को
बेचती हूँ , अपनी चीज़ की
कमाई खुद खाती हूँ
तो रोष तुम दिखाते हो
मनोविज्ञान और नैतिकता
का पाठ मुझे पढाते हो
क्या अपनी कमाई के
साधन घट जाने से
घबराते हों इसीलिये
अनैतिकता को नैतिकता
का आवरण पहनाते हो
ताकि फिर आचरण
अनैतिक कर सको
और नैतिक भी बने रह सको
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Thursday, March 4, 2010
तुम्हारे अस्तित्व की जननी हूँ मै
दुर्गा भी मै
सीता भी मै
मंदोदरी भी मै
रुकमनी भी मै
मीरा भी मै
राधा भी मै
गंगा भी मै
सरस्वती भी मै
लक्ष्मी भी मै
माँ भी मै
पत्नी भी मै
बहिन भी मै
बेटी भी मै
घर मे भी मै
मंदिर मे भी मै
बाजार मे भी मै
"तीन तत्वों " मे भी मै
पुजती भी मै
बिकती भी मै
अब और क्या
परिचय दू
अपने अस्तित्व का
क्या करुगी तुम से
करके बराबरी मै
जब तुम्हारे
अस्तित्व की
जननी हूँ मै
तुम जब मेरे बराबर
हो जाना तब ही
मुझ तक आना
पार्वती माता का प्रतीक
दुर्गा शक्ति का प्रतीक
सीता , मंदोदरी, रुकमनी भार्या का प्रतीक
मीरा , राधा प्रेम का प्रतीक
गंगा , पवित्रता का प्रतीक
सरस्वती , ज्ञान का प्रतीक
लक्ष्मी , धन का प्रतीक
बाजार , वासना का प्रतीक
तीन तत्व , अग्नि , धरती , वायु
Wednesday, March 3, 2010
अघोषित अपराधी - बेटी का पिता!
निरीह प्राणी है -
अपने जिगर के टुकड़े को
साथ लिए लिए
उसके बचपन से
जवानी तक
घूमता रहा.
कभी पढ़ाई, कभी कोचिंग,
औ' फिर कभी
एडमिशन, कम्पटीशन, जॉब सर्चिंग
हाथ पकड़े घूमता रहा,
जब तक
उसके पैरों तले ठोस जमीं न मिली.
उस मुकाम पर पहुंचा कर
फिर खुद का सफर,
एक नया सफर
अपनी उम्र के तीसरे पड़ाव पर,
दर-दर भटका
अब बारी थी
बेटी के ब्याहने की.
कहीं दरवाजा खोला गया,
कहीं एक गिलास पानी मिला
औ' कहीं
बंद दरवाजे से आवाज आई
घर में कोई नहीं है,
फिर कभी आइयेगा.
कई कई दरवाजों की
धूल छानकर
पसीना पोंछते हुए वापस
घर में आकर सांस ली.
पत्नी पानी का गिलास
हाथ में लेकर
चेहरा पढ़ने की कोशिश में
हताश चेहरा
अपनी कहानी खुद
बयां कर रहा होता.
फिर दो चार दिन में
नए पते लेकर
फोटो और बायोडाटा के साथ
घर घर जाना
कोई पूछता--
आपका कितने का संकल्प है?
कितना खर्च करने की सोची है?
कुछ और बढ़ जाइये तो?
इतने ?? में तो
मैं बात ही नहीं करता.
अभी इससे अधिक देनेवालों को
मैं ने बुलाया ही नहीं है.
अजी पैसे नहीं है,
क्या मेरा ही घर बचा है?
कुछ रिश्तेदारों की सलाहें
पहले ही कहा था कि
अधिक मत पढ़ाइये
जल्दी शादी कर दीजिये.
कुछ के व्यंग्य भरे कटाक्ष
उनकी अपनी उपलब्धियों की गाथा
बिना मांगी सलाह
'मेरी मानिये तो
अब नीचे उतर आइये
बस देखिये
लड़का ठीक ठाक हो,
बेटी को कमा रही है
दोनों आराम से रहेंगे.'
वह निरीह प्राणी
रात की नींद
गिरवी रखकर
तारों को निहारता
सोचता है --
क्या गुनाह किया?
बेटी को जन्म दिया?
उसको उच्च शिक्षा दिलाई?
या उसके लिए
सुयोग्य वर की कामना की?
सब अनुत्तरित प्रश्न
उसको निरीह बना रहे हैं
क्योंकि
एक अघोषित अपराधी,
जिसका अपराध अक्षम्य है.
इस समाज की अदालत में
गुनाहगार बना खड़ा है.
क्योंकि वह एक
बेटी का पिता है.
Friday, February 26, 2010
Monday, February 22, 2010
नारी का एक और सच !
बचपन से बुढ़ापे तक
बेटी बनी,
एक गर्भ से,
एक घर में,
जन्म लेकर
पली बढ़ी
सब कुछ किया.
पर कही पराया धन ही गयी.
बेटा सब कुछ पा गया
उसको कहा--
ऐसा 'अपने घर ' जाकर करना
ये मेरे वश में नहीं.
पराया धन
अपनी समझ से
सब कुछ देकर विदा किया
जिनकी अमानत थी,
उनको बुलाकर सौप दिया.
इस घर में आकर
घर की दर औ' दीवारें
अपनेपन से सींच दीं,
यहाँ भी सब कुछ किया
पति के परिवार में
खोजे और सोचे
अपने रिश्ते
अपनापन और अपना घर
जिसकी बात बचपन से सुनी थी.
किन्तु
सास न माँ बन सकी,
पिता , बहन औ' भाई
का सपना अधूरा ही रहा.
इस यथार्थ की चाबुक
'क्या सीखा 'अपने घर' में?'
'वापस 'अपने घर ' जा सकती हो.'
'अपने घर ' की बात मत कर'
'अपना घर' समझ होता तो?'
जब बार बार सुना औ' हर घर में सुना
खुद को कटघरे में खड़ा किया
मेरा घर कौन सा है?
जहाँ जन्मी पराई थी,
अपने घर चली जायेगी एकदिन.
जहाँ आई वहाँ भी......
अपने घर को न खोज पायी.
जन्म से मृत्यु तक
बलिदान हुई
पर एक अपने घर के लिए
तरसते तरसते
रह गयी
क्योंकि वह तो
सदा पराई ही रही.
किसी ने अपना समझ कहाँ?
बिना अपने घर के जीती रही,
मरती रही जिनके लिए,
वे मेरे क्या थे?
एक अनुत्तरित सा यक्ष प्रश्न
हमेशा खड़ा रहेगा.
Sunday, February 21, 2010
स्त्री का सच
स्त्री सुहाती हैं
कब
जब
नयनो को
झुका कर
ओठ को दबा कर
इठलाती हैं
रति बन जाती हैं
या
आँखों मे आंसूं
झुकी हुई गर्दन
सहनशीलता कि प्रतिमा
बन जीती जाती हैं
जिन्दगी शांति से चलती रहे
चाहे स्त्री उसमे कितनी भी
तपती रहे
सच बोलने से
हर स्त्री को
मना किया जाता हैं
और रहेगा
क्युकी
स्त्री का सच
अपच
कल अपनी एक महिला मित्र से बात हुई जो जिन्दगी से परेशान हैं जबकि उसके पास सब कुछ हैं , पति भी , बच्चे भी । दुनिया कि नज़र मे मृदुभाषी हैं सर्व गुणी हैं , शांत हैं , धीर गंभीर हैं और खुश हैं क्युकी दुनिया वो देख रही हैं जो उसका बाहरी आवरण हैं । जब अविवाहित थी तब सौतेली माँ के आतंक से त्रस्त थी , सबने कहा शादी कर लो एक घर तुम्हारा अपना होगा । शादी हुई , बेटिया हुई लेकिन सुख और शांति कि तलाश आज भी बदस्तूर जारी हैं और ये सच वो किसी से नहीं कह सकती क्युकी स्त्री का सच अपच
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Sunday, February 14, 2010
पहला प्यार (वेलेंटाइन दिवस पर)
इन आँखों ने महसूस किया
हसरत भरी निगाहों को
ऐसा लगा
जैसे किसी ने देखा हो
इस नाजुक दिल को
प्यार भरी आँखों से
न जाने कितनी
कोमल और अनकही भावनायें
उमड़ने लगीं दिल में
एक अनछुये अहसास के
आगोश में समाते हुए
महसूस किया प्यार को
कितना अनमोल था
वह अहसास
मेरा पहला प्यार !!
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Sunday, January 10, 2010
एक लिंक
लिंक
Monday, January 4, 2010
नारीवादी नारीविरोधी
पर मतलब क्या हैं
कौन हैं नारीवादी
क्या हैं आज के परिवेश मे
नारी वादी कि परिभाषा तुम्हारी
जो नारी खाना नहीं जानती बनाना
उसको क्या तुम कहते हो नारीवादी ?
तो ज़रा आओ मुझसे बेहतर खाना तुम बना कर दिखाओ
जो नारी स्वेटर नहीं बुनना जानती
उसको क्या तुम कहते हो नारीवादी ?
तो ज़रा आओ और मुझसे बेहतर स्वेटर का डिज़ाइन तुम बुन कर दिखाओ
जो घर के काम नहीं करती
उसको क्या कहते हो तुम नारीवादी ?
तो ज़रा आओ और मेरे घर से साफ़ और सुंदर घर अपना मुझे दिखाओ
जो माता पिता कि सेवा नहीं करती
उस क्या कहते हो नारीवादी
तो आओ और देखो मेरी माँ आज भी गरम रोटी खाती हैं
जिसको मै बनाती हूँ
वैसी गोल रोटी , प्यार से सेक कर कभी अपनी माँ को तुमने खिलाई हो तो बताओ
बस शर्त इतनी हैं कि ये सब तुम कर के दिखाओ
अपनी माँ बहिन या पत्नी का किया मत मुझ को दिखाना
क्युकी कहीं कोई और उनको भी तमगा दे रहा होगा नारीवादी का
घर तुम्हारा एक नारी ही चलाती हैं
वंश तुम्हारा एक नारी ही चलाती हैं
अधिकार अपने ना कभी तुमसे मांगे
अपने अधिकारों को वो कभी ना जाने
इसीलिये
हर वो स्त्री नारीवादी हैं जो
उनको उनके अधिकार से अवगत कराती हैं
चलो और आगे बढते हैं
क्यूँ कहते हो तुम नारीवादी
केवल क्या इसलिये कि नारी कि बात को खुल कर
मै कहती हूँ और तुम्हारे अस्तित्व से हटकर
अपने अस्तित्व को जीती हूँ
खुद कमाती हूँ
खुद सोचती हूँ
और दूसरी नारियों को
उनके अधिकार से अवगत कराती हूँ
अगर इस लिये मै नारीवादी हूँ
तो फक्र हैं कि मै नारीवादी हूँ
और तुम क्या हो ज़रा सोच कर बताना
देखा हैं मैने तुमको एक ऐसी लाइन मे
खड़े हुए , जहां एक ऐसा व्यक्ति
बाँट रहा हैं पुरूस्कार
जो निरंतर नारियों का करता रहा हैं तिरस्कार
और तुम उन चंद रुपयों के लिये बेच रहे हो
अपनी थाती और कला
और बजा रहेहो उसका ढोल
जिसकी हर आवाज तुमको
नारी विरोधी बताती हैं
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Thursday, November 26, 2009
स्वर
Monday, November 9, 2009
वन्दे मातरम -- मातृ भूमि कुमाता कैसे हो जाये ??
ना जाने क्यूँ लोग बार बार
उनसे कहते हैं वन्दे मातरम गाओ
वन्दे मातरम
और
जन गण मन
तो वही गाते हैं
जिनके मन मे देश प्रेम होता हैं
मातृ भूमि को जो चाहेगे
वो ईश्वर से भी मातृ भूमि के लिये लड़ जायेगे
दो बीघा जमीन बस दो बीघा जमीन नहीं होती हैं
अन्न देती हैं , जीवन देती हैं
उस माँ कि तरह होती हैं
जो नौ महीने कोख मे रखती हैं
खून और दूध से सीचती हैं
पर माँ को माँ कब ये मानते हैं
कोख का मतलब ही कहां जानते हैं
मातृ भूमि भी माँ ही होती हैं
कुमाता नहीं हो सकती हैं
इसीलिये तो कर रही हैं इनको
अपनी छाती पर बर्दाश्त
ये जमीन हिन्दुस्तान कि
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एक फौज औरतो की
तैयार की जाती रही हैं
एक फौज
औरतो की जो चलती रहे
बिना प्रश्न किये , बिना मुंह खोले
करती रहे जो शादी जनति रहे जो बच्चे
जिसके सुख की परिभाषा हो
पति और पुत्र के सुख की कामना
और
जो लड़ती रहे एक दूसरे से
बिना ये जाने की वो
एक चाल मे फंस गयी हैं
जहाँ पूरक वो कहलाती हैं
पर पूरक शब्द का
अर्थ पूछने का अधिकार
भी उसका नहीं होता हैं
तैयार की जा रही हैं
एक फौज औरतो की
जिसकी संवेदना मर गयी हैं
उसके अपने लिये
क्युकी उस को कहा जाता हें
और जाता रहेगा
की औरत का सुख
पति बच्चो और घर से ही होता हैं
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Tuesday, October 20, 2009
राह
नही मिलती सागर की गहराई की थाह
शांत नजरों को देखकर ,
नही मिलतीनारी मन की राह
टुकडों में जीती जिन्दगी पत्नी ,प्रेमिका ,मां ,
अपना अक्स निहारती कितनी है तनहा
सूरज से धुप चुराकर सबकी राहें रोशन करती
उदास अंधेरों को मन की तहों में रखती
सरल सहज रूप को देखकर
नही मिलतीनारी मन की राह
Saturday, September 26, 2009
मेजर गौतम तुम्हे सलाम
गौतम बनना होगा तुमको
इंसान नहीं हो तुम
शिला हो , सो भाव ना हो तुममे
तुम हो तो सुरक्षित हम हैं गौतम
तुम जैसी शिलाओ से
सुरक्षित हैं सीमाये
माँ बनने वाली हैं पल्लवी
फिर जन्मेगा एक सुरेश
फिर उसको तुम्हे ही बनाना है मेजर
हम भी पीछे नहीं हैं गौतम
जहां कहोगे शिला बन कर खडे रहेगे
ना सुरेश अकेला था
ना पल्लवी अकेली होगी
तुम हुकुम करना
हम पूरा करेगे
मेजर गौतम तुम्हे सलाम
क्युकी जीते हो जिंदगी की
लड़ाई भी तुम
डॉ अनुराग की पोस्ट देखे सन्दर्भ के लिये
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Wednesday, September 23, 2009
खामोश क्यों हो?
कलम
क्या जज्बा संघर्ष का
कुछ टूटने लगा है,
या फिर
अपनी लड़ाई में
बढ़ते कदमों के नीचे
कुछ कांटे बिछाए गए हैं
उनकी चुभन ने
थाम दिए है पग
कुछ इस तरह
रखो कदम
चरमराकर पिस जाएँ
और सिर उठाकर गुजर जाओ
उनके ऊपर से।
कांटे क्या?
लोहे की सलाखें भी
जज्बों के आगे
मुड़कर नतमस्तक हो जायेंगी
कटाक्ष , लांछन
हमेशा श्रृंगार के लिए
तैयार रहे हैं।
जब भी किसी नारी ने
अपनी सीमाओं से परे
कुछ कर के दिखाया है।
अंगुलियाँ उठती ही
रहती हैं।
आखिर कब तक
उठेंगी
अपनी मंजिल की तरफ
चुपचाप चले चलो
जब मिल जायेगी
यही अंगुलियाँ
झुककर
तालियाँ बजायेंगी
लांछन लगाने वाली
जबान
शाबाशी भी देगी।
बस
मेधा , क्षमता, शान्ति से,
जीत लो मन सबका.
Saturday, August 22, 2009
'प्रतिभा' ~ रश्मि स्वरुप
'प्रतिभा'
और उससे भी अधिक गुमनाम थी
घनघोर अँधेरे में रोशनी का एक कतरा गया
उसे जगाया गया, सहलाया गया
पर संकोच की परतों में वह, ढंकी रही, छिपी रही
पहचान तो गयी खुद को, पर सबकी नजरों से बची रही
ठहर ठहर के उसे ललकारा और उभारा गया
आ दिखा जौहर अपना, कहकर उसे पुकारा गया
मान अटल इस पुकार को, कठिन साधना से निखरी
ओजस्वी उसका आत्मबल, किरणें जिसकी बिखरी
आखिर जम कर चमकी गगन में, नजरो में उसकी कौंध चुभी
वो तो नहाई रोशनी में, औरों को उसकी चकाचौंध चुभी
लेकर आड़ खुबसूरत परन्तु खोखली बातों की, दुहाई दी,
फुसलाया और डराया भी
बनी रही जब हठी तनिक वह, ज़रा उसे बहलाया भी
चकित हुई दोहरे बर्ताव से, हताश हुई, दुःख की हुँकार उठी
चख लिया था स्वाद उसने स्वतंत्रता का, कुचले जाने पर फुंफकार उठी
अंत किया इस द्वंद का, की सिंहनी सी गर्जना
जन्म लिया विद्रोह ने, तोड़ दी ये वर्जना
बीत गयी रात अन्धकार की, ये सुनहरी प्रभा है
ना छिप सकेगी, न दबेगी, ये अदम्य प्रतिभा है...!
रश्मि स्वरुप ने भेजी हैं लिंक हैं
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Saturday, August 15, 2009
रहस्यमयी
एक लड़की-
१६ वर्ष की,
मन के अन्दर सिमटी रहती है...
पुरवा का हाथ पकड़
दौड़ती है खुले बालों मे
नंगे पाँव....
रिमझिम बारिश मे !
अबाध गति से हँसती है
कजरारी आंखो से,
इधर उधर देखती है...
क्या खोया? - इससे परे
शकुंतला बन
फूलों से श्रृंगार करती है
बेटी" सज़ा-ए-आफ़ता पत्नी" बनती होगी
पर यह,
सिर्फ़ सुरीला तान होती है!
यातना-गृह मे डालो
या अपनी मर्ज़ी का मुकदमा चलाओ ,
वक्त निकाल ,
यह कवि की प्रेरणा बन जाती है ,
दुर्गा रूप से निकल कर
" छुई-मुई " बन जाती है-
मौत तक को चकमा दे जाती है....
Thursday, August 6, 2009
मुझसे सुंदर कौन??????????
मैं हूँ गीत,
रिमझिम-रिमझिम बारिश हूँ..
।मैं हूँ खनकती पुरवाई,
मैं ही बसंत की खुशबू हूँ...
मैं हूँ आँगन,
मैं हूँ पवन,
मैं ही बाबुल की दुनिया हूँ....
मैं हूँ ममता का दूजा रूप,
भाई की कलाई की डोरी हूँ,
मैं हूँ शक्ति,
मैं विद्या हूँ,
मैं ही लक्ष्मी का रूप हूँ....
बुलबुल हूँ,
गौरैया हूँ,
कोयल की गूंजती कूक हूँ....
धरती में हूँ,
अम्बर पे हूँ,
मुझसे सुंदर कौन?
थामलो मेरा हाथ,
मुझसे कर लो बात,
मैं ही मन हूँ,
मैं हूँ जीवन,
धड़कनों के संग-संग हूँ....
क्यूँ मुझको यूँ खोते हो,
मुझसे सुंदर कौन?
कहो...मुझसे सुंदर कौन??????????
Saturday, August 1, 2009
जीत निश्चित है !
अग्नि-परीक्षा........................
जाने कितने अंगारों से गुजरी
ये मासूम काया !
यातनाओं के शिविर में,
विरोध की शिक्षा ने ,
उसे संतुलन दिया ,
शरीर पर पड़े निशानों ने
'स्व' आकलन का नजरिया दिया !
हर देहरी पर ,
'बचाव' की गुहार लगाती,
अपशब्दों का शिकार होती,
लान्छ्नाओं से धधकती नारी ने
अपना वजूद बनाया.........
माँ सरस्वती से शिक्षा,
दुर्गा से नवशक्ति ली ,
लक्ष्मी का आह्वान किया-
प्रकाशपुंज बनकर ख़ुद को स्थापित किया !
समाज का दुर्भाग्य -
उसकी शक्ति,उसकी क्षमताओं से परे
ह्त्या पर उतर आया !
आज फिर ,
कुरुक्षेत्र का मैदान है ,
और कृष्ण नारी सेना के सारथी............
यकीनन,
जीत निश्चित है !
Wednesday, July 29, 2009
परिणाम !!!!!!!
अपनी इच्छा ,अपने ख्यालों से
उसे एक अनोखा रंग दूंगी........
ख्वाहिशों की टोकरी में
यह भी एक ख्वाहिश रही नारी की,
पर घर?
वह अपना होता कहाँ है !
पनाह मिलती है,
खाने को दो रोटी
और एक नाम.........
बहुत कम लोगों की पोटली के ख्वाहिश
सच होते हैं
वरना जिधर देखो
ख्वाहिशों के आंसू बहते हैं
जिनको पोछ्नेवाले भी बिरले होते हैं..........
बेटी होने का भय
यूँ ही नहीं प्रबल होता है !
सात फेरों का परिणाम अनिश्चित........
उससे पार पाने के लिए,
अपने पैरों पर खड़ा होना,
भीड़ में गुम हो जाना है,
घर की दीवारों से वह गंध नहीं आती,
जो खनकती चूड़ियों से होती है,
छनकते पायल से होती है
माँ-माँ की गूँज से होती है,
पर...............
रोटी की बराबरी ने
सबकुछ विछिन्न कर दिया !
सहमे,दबे रूप से अलग
जो काया निकली
वह या तो ज्वाला है
या किसी कोने में हतप्रभ आकृति........
Saturday, July 25, 2009
बसंत को आने दो !
संस्कारों की धरती ,
पावन गंगा................
लोग इसे भूल जाते हैं !
एक माँ , काली बन जाती है
जब उसके बच्चे पर कुदृष्टि पड़ती है !
एक औरत ,बन जाती है दुर्गा ,
करती है महिषासुर का वध
जब संस्कारों की धरती पर
पाप के बीज पड़ते हैं !
पावन गंगा बन जाती है विभीषिका
जब उसकी पावनता के उपभोग की अति होती है !
सूखी नज़र आती गंगा काल का शंखनाद बनती है
दिशा बदल - सर्पिणी बन जाती है !
लड़की के जन्म को नकारकर वंश की परम्परा में ख़ुद आग भरते हो ,
जो पुत्र जन्म लेता है लड़की की मौत के बाद ,
वह पुत्र -विनाश का करताल होता है !
जागो,संस्कारों की धरती को बाँझ मत बनाओ...........
गंगा में संस्कारों को मत प्रवाहित
करो विश्वास की देहरी कोअंधकारमय मत करो।
लक्ष्मी को आँगन से निष्कासित मत करो !
नारी का सम्मान करो,
उसकी ममता को मान दो,
अन्धकार से प्रकाश की ओर प्रस्थान करो ,
आँगन में -बसंत को आने दो !
Wednesday, July 22, 2009
स्वयम्बर से वनवास तक सीता ने बहुत सहा था
बनने चली वो सीता
उम्मीद थी उसको
मिलेगे राम
पर शायद ये भूल गयी
राम मिलेगे
तो एक कहीं धोबी भी होगा
और फिर एक वनवास भी होगा
क्यूँ उन प्रथाओं को बारबार
दोहराते हैं जिनको
मिटाने मे लोगो ने युग लगा दिये
स्वयम्बर क्यूँ हो फिर
अग्निपरीक्षा क्यूँ हो फिर
और वनवास भी क्यूँ हो फिर
मत दोहराओ इतिहास
मत बनाओ नारी को फिर
रुढिवादी सोच का दास
सीता से राखी तक सफर तो ठीक था
कहीं कुछ आगे तो बढ़ा था
पर राखी से सीता तक का सफर
एक तरीका होगा
फिर नारी के अस्तित्व को मिटने का
स्वयम्बर से वनवास तक
सीता ने बहुत सहा था
क्या राखी तुम भी सहना चाहोगी
नहीं तो फिर क्यूँ रचा
ये स्वयम्बर
क्यूँ पुरानी परिपाटी
फिर दोहरायी
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Sunday, July 19, 2009
ठहरा हुआ इंतजार

लगातार घुमती हुई खामोश बेचैनी
संदिग्ध लम्बा अंतराल
अनुगूंज की घिस चुकि आवाजें
मौन पवित्र प्रार्थनाऐ
सम्पूर्ण अतिंम आवेग
प्रेम की परकटी ऊडान
समुद की बंधुआ कसमसाहट
देर तक जागता ऊनींदा संदेश
तिलमिलाती हुई दारूण प्रतीक्षा
रिश्तों की भारी खुरदुराहट
सपनों का अथाह भारीपन
हँसी की भीतरी लडखडाहट
साथ ही
आहट की इंतहा कंपन भी
क्या कुछ नहीं है यहाँ
इस जीवन में
मगर फिर भी क्या
जरूरी है
हर मील के पत्थर के बाद
वही ठहरा हुआ इंतजार।
Wednesday, June 24, 2009
ड्रेस कोड ----- अब हुआ न्याय
दिल्ली की बस मे जा रही थी
लोगो ने छेडा ,
गालो पर चाकू से निशाँ बना दिये
हादसा था
साड़ी पहने एक महिला
इन्दोर मे सड़क पर
पति के साथ जा रही थी
कार मे चार लोगो ने
जबरन उठा लिया
हादसा था
कानपुर कॉलेज मे लडकियां
जींस पहन कर आयी
शोहदों ने सीटी बजाई
लड़की की गलती
प्राचार्या ने बतायी
क्युकी वो जींस पहन कर आयी
वाह क्या न्याय हैं
ड्रेस कोड लागू करवाओ
प्राचार्या ने गुहार लगाई
पर इस बार जिला प्रशासन
चेत गया
और ड्रेस कोड की जगह
हेल्प लाइन खुलवा दी
जहाँ लड़की
चाहे जींस मे हो या साड़ी मे
फोन पर बिना अपना नाम बताये
सीटी बजाने वालो के ख़िलाफ़
अपनी शिकायत दर्ज करवाये
अब हुआ न्याय
चीज़ नहीं लड़की की
गलती तुम्हारी और सजा भुगते वो
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Sunday, June 21, 2009
बाबुल
नयनो की जलधारा को, बह जाने दो सब कहते
पर तुम इस गंगा जमुना को मेरे बाबुल कैसे सहते
इसलिए छूपा रही हूँ दिल के एक कोने में
जहाँ तेरे संग बिताए सारे पल है रहते
होठों पर सजाई हँसी,ताकि तू ना रोए
इन आखरी लम्हों को,हम रखेंगे संजोए
आज अपनी लाड़ली की कर रहे हो बिदाई
क्या एक ही दिन मे, हो गयी हू इतनी पराई
जानू मेरे जैसा तेरा भी मन भर आया
चाहती सदा तू बना रहे मेरा साया
वादा करती हूँ निभाउंगी तेरे संस्कार
तेरे सारे सपनो को दूँगी में आकार
कैसी रीत है ये,के जाना तेरा बंधन तोड़के
क्या रह पाउंगी बाबुल, मैं तेरा दामन छोड़के.
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Friday, May 29, 2009
सबके लिये क्यूँ नहीं हैं
माँ नहीं बना चाहती
समाज कहता हैं
नहीं गर्भपात नहीं करवा सकती
कम उम्र अविवाहिता
माँ बनना चाहती हैं
समाज कहता हैं
नहीं गर्भपात करवा दो
बच्चे का आना
खुशी अगर हैं
माँ बनना खुशी अगर हैं
तो सबके लिये क्यूँ नहीं हैं
{ बालिका वधु सीरीयल की आज की कड़ी देखकर बस यही समझ आया }
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Thursday, May 14, 2009
बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ
कह कर कब तक
बेटी को बेटे से कमतर मानोगे
और
कब बेटी को सिर्फ़ और सिर्फ़ इस लिये चाहोगे
कि वो बेटी तुम्हरी हैं
हर समय बेटे रूपी कसौटी पर
क्यों बेटियों के हर किये को
कसा जाता हैं
और कब तक बेटियों को
अपना खरा पन
बेटे नाम कि कसौटी पर
घिस घिस कर
साबित करना पडेगा
कुछ इतिहास हमे भी बताओ
कुछ कारण यहाँ भी दे जाओ
बेटो ने ऐसा क्या किया
जो बेटी को बेटे जैसा
तुम बनाते जाते हो
और उसके अस्तित्व को
ख़ुद ही मिटाते जाते हो
या
बेटे जैसा कह कर
अपने मन को संतोष तुम देते हो
बेटा और बेटी
दोनों अंश तुम्हारे ही हैं
फिर जैसा कह कर
एक आंख को क्यूँ
दूसरी से नापते हो
बेटे जैसी नहीं होती हैं बेटियाँ
बेटियाँ बस बेटियाँ होती हैं
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Wednesday, May 13, 2009
ईश्वर बस बेटी न देना
कैसे अपने लिये हर जगह
जगह बना लेती हैं ??
कैसे जीतना हैं उनको
अपना मिशन बना लेती हैं ??
कैसे कम खाना खा कर भी
सेहत सही रहे ये जान लेती हैं ??
बहुत आसन हैं
जब माँ के पेट मे होती हैं
तभी से सुनती हैं
माँ की हर धड़कन कहती हैं
इश्वर लड़की ना देना
जो कष्ट मैने पाया
वो संतान को पाते ना देख पाउंगी
हे विधाता बेटी ना देना
बस यही सुन सुन कर नौ महीने मे
माँ के खून के साथ
सरवाईवल ऑफ़ द फीटेस्ट
की परिभाषा
को जीती हैं लडकियां
और
जिन्दगी की आने वाली लड़ाई के लिये
अपने को तैयार कर लेती हैं
हर सफल लड़की के पीछे
होती हैं एक माँ की
कामना की
ईश्वर बस बेटी न देना
कुछ कमेंट्स पढ़ने के बाद ये लिखना जरुरी होगया हैं की ये किसी माँ की कामना नहीं हैं की उसके बेटी ना हो ये एक माँ का दर्द हैं जो ईश्वर से बेटी न देने की प्रार्थना कर रहा हैं कल मेरी एक दोस्त ने बताया था की वो अपनी बेटी के लिये विवाह योग्य वर देख रही हैं पर नहीं मिल रहा और क्युकी उसकी शादी से ले कर उसकी बेटी की शादी तक मे भी समाज मे कुछ नहीं बदला हैं । आज भी बेटी की शादी केवल और केवल पैसे से ही होती हैं ।
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Sunday, May 10, 2009
उड़ान
Monday, April 27, 2009
युवामन - वृद्धतन
दुसरो के सुख का संकल्प लिये / आज भी दौड़ता फिरता हैं
शरीर भले ही आयु से बंध जाए
मन तो सदैव स्वतंत्र चलता हैं ।
मै नहीं मानती मेरा बचपन खो गया कहीं
वह तो आज भी / ममता की झोली में
अबोध बच्चो की तुतली बोली में
उत्सुक चंचल आँखों में
झांकता हैं , स्वर्ग सुख मांगता हैं ।
मै नहीं मानती मेरी युवावस्था बीत गयी
वह तो आज भी युवा मित्रो के साहस मे
चहकती हैं , फूलो सी महकती हैं
मेरा वृद्ध तन युवा हो जाता हैं
जब किसी युवा साथी का हाथ
हाथ मे मदद को आता हैं ।
बुढापा कोई पड़ाव नहीं
प्रक्रिया हैं आगे बढ़ने की
जो नहीं कर सके अब तक
उसे पूरा करने की ।
भूत - भविष्य की चिंता छोडो
केवल वर्तमान से नाता जोडो ।
यही सच हैं बाकी सब बेमानी हैं ।
बुढापा अभिशाप नहीं
इश्वर की मेहरबानी हैं
कमेंट्स यहाँ दे युवामन - वृद्धतन
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Friday, April 24, 2009
घूँघट का पट
इतना अन्तर
तुझ में और मुझ में
मैं देख सकती हूँ
तारों के पार का जहाँ
बोल सकती हूँ
अपने आज़ादी के शब्द
सुन सकती हूँ
अपना मनचाहा स्वर
शायद मेरे इन्द्रिय
जाग उठे है समय के साथ
तू क्यूँ ग़लत परम्पराओं का
लंबा सा पल्लो
ओढ़ के बैठी है अब तक
जहाँ से तुझे सिर्फ़
अपने पैरों के नाखून ही नज़र आते है
एक कदम भी नही चल सकती तू
दूसरो के सहारे बिन
तेरी मुस्कान सिल जाती है जिस में
खोल दे वो घूँघट का पट सखी
मेरे संग तुझे बहुत दूर चलना है
नज़रों से पलकों का परदा हटा
तुझे नीला आसमान देखना है
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Wednesday, April 8, 2009
जीने का हक है मुझे
न जाने क्यों
बगावत कर
तन कर खड़ी हो गई
वर्जनाओं और प्रतिबंधों की
जंजीरों को तोड़कर
नए स्वरूप में
जंग का ऐलान कर.
माँ लगी समझाने
वे बड़े हैं,
पिता हैं,
भाई हैं ,
उन्हें हक है
कि तुझे अपने अनुसार
जीवन जीने देने का।
नहीं, नहीं, नहीं..........
बचपन से प्रतिबंधों की
जंजीरों में जकड़ी
औ' अपनी बेबसी पर
रोते हुए देखा है तुम्हें
घुट-घुटकर जहर
पीते हुए देखा है तुम्हें
तुम्हारी छाया में
पिसती मैं भी रही
लाल-लाल आँखों का डर
हर पल सहमाये रहा
पर अब क्यों?
नहीं उनका रिश्ता
मैं नहीं ओढ़ सकती
जीवन भर के लिए
अपने को
दूसरों की मर्जी पर
नहीं छोड़ सकती।
जिन्दगी मेरी है,
उसे जीने का हक है मुझे
चाहे झूठी मान्यताओं
औ' प्रथाओं से लडूं
जीवन अपने लिए
जीना है तो क्यों न जिऊँ
पिता के साए से डरकर
तेरी गोद में
छुपी रही
अब नए जीवन में
उनका साया नहीं,
उन जैसे किसी भी पुरूष की
छाया भी नहीं
मैं पति से डरकर
जीना नहीं चाहती
अब परमेश्वर की मिथ्या
परिकल्पना को
तोड़कर
एक अच्छे साथी
तलाश ख़ुद ही करूंगी
चाहे जब भी मिले
मंजिल
उसके मिलने तक
अपनी लडाई
ख़ुद ही लडूंगी
मुझे जीने का हक है
मुझे जीने का हक है
और मैं उसको
अपने लिए ही जिऊंगी.
Monday, March 30, 2009
प्रेम - व्यापार
देव हो या दानव
वासना का समुद्र
जब - जब उफनता हैं
सयम का कगार टूट जाता हैं ।
सुंदर प्रकाशवान मछली
सम्मोहन के जाल मै
स्वयं फँस जाती हैं ।
तामसी - वृत्तियाँ
प्यार के अनछुये आकाश पर
काले बादल बन छा जाती हैं ।
चारो और फैले
तामसी कोहरे के भीतर
बलात्कार होता हैं
चीखे उभरती हैं
पर
सत्यवती को बचाने वाला
कोई नहीं आता ।
चीखे मौन हो जाती हैं
वासना तृप्त
चलता रहता हैं
संसार का प्रेम - व्यापार
कमेंट्स यहाँ दे प्रेम - व्यापार
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Friday, March 27, 2009
मै अपनी धरती को अपना वोट दूंगी आप भी दे कैसे ?? क्यूँ ?
समय शाम के ८.३० बजे से रात के ९.३० बजे
घर मे चलने वाली हर वो चीज़ जो इलेक्ट्रिसिटी से चलती हैं उसको बंद कर दे
अपना वोट दे धरती को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के लिये
पूरी दुनिया मे शनिवार २८ मार्च २००९ समय शाम के ८.३० बजे से रात के ९.३० बजे
ग्लोबल अर्थ आर { GLOBAL EARTH HOUR } मनाये गी और वोट देगी अपनी धरती को ।
इस विषय मे ज्यादा जानकारी यहाँ उपलब्ध हैं ।
जीवन के भीतर स्त्री

एक घर चाहती हैं वे केवल
शायद पूरा घर भी नहीं
बस एक चुल्हा ताकि
घर भर को खिला कर
संतुष्ट हो, सो सके
कल के भोजन के बारें में
फिक करते हुये।
चाँद की कहानी कहते हुये वे चाँद पर जा पहुँचती हैं
अपनी कमनियता के किस्सों को
हवाओं में बिखरते हुये
कुछ न करते हुये भी
बहुत कुछ कर रही होती हैं वे
अपनी सृजनशीलता से रच रही होती है
स्वपनिले संसार की रूपरेखा
हमेशा बचाये रखा है उन्होनें
घर का सपना
आँधी तुफानों के बीच भी
जितनी शिद्दत से वे प्रेम करती है
उतनी ही शिद्दत से घृणा
मासुमियता, उदारता, करुणा के विष्षणों के साथ
वे बेहद खूबसूरत दिखाई पडती हैं
कभी कभी वे सच के इतने करीब होती हैं
की छू सकती हैं अपनी आत्मा का पवितर जल
कभी वे बिना पक्षपात के इतनी झूठी हो सकती है
की आप दुनिया जहान से नफरत करने लगें
अपनी अनेकता के साथ
राधा, मीरा, सीता का बाना ओढती हैं
एक देश में अरृणा राय तो
दुसरे देश में सु कि
किसी तीसरे देश में शीरीन आबादी बन
अपने आप को सिदध कर रही होती हैं
उन्कें यहाँ हक्कीत और स्वपन में अधिक अंतर नहीं है
यही एकमात्र कारण है
हक्कीत को सपना और
सपने को हक्कीत समझनें में वे भूल कर देती हैं
जीवन का नब्बे प्रतिशत प्रेम
उन्के करीब से हो कर गुजरता है
उन्का साथ इन्दरधनुष, तितली, फुल, कविता,
खुश्बू, घटाओं और जिंदगी का साथ है
उन्की आखें जिस क्षण तुम्हारी ओर
देखती है वे क्षण ठहरे रहते हैं हमेशा
तमाम उमर तुम उन क्षणों के बीच से होकर
गुजरना चाहते हो तुम
कभी वे मुस्कुराहट बन
तस्वीर के चारों कोनों में फैल जाती हैं
तो कभी आँसुओं की तरह
शून्य में सिमट जाती हैं
स्त्री कभी बिखरती नहीं
अरबों खरबों अणुओं में जुडती नहीं
बिम्ब से मूरत में तबदील हो्
माँ, बहन, बेटी बन जाती है
और कविता के अंदर
हमेशा जीवित रहती हैं
संवेदना बन कर।
Friday, March 13, 2009
होली
होली में सब मस्त हुएकिसका पूछे हाल
बसंती रंगो मे डूबे
khila हास परिहासफागुन में मदमस्त हुए सबछाया उल्लास
सरसों फूली टेसू महकाखिला हारसिंगार
पीली चुनर ओढ़करप्रकृति ने किया श्रृंगार .
Tuesday, March 10, 2009
*रोशनी*
सोचने को तो बहुत है पर कुछ करके तो दिखाओगे ,
कल्पना की उड़ान तज कर अब यथार्थ अपना लो ,
तभी तो संकट- संघर्ष में धरा पर पैर जमालोगे.।
साहस करो तो मन के अंदर भी तेज ही पाओगे ,
तन की तपन तज तब ही तो तुम आगे आओगे,
जीवन की सूखी फुलवारी में आशा के दीप जलेंगे ,
विद्युत् लय से तिमिर चीरकर स्वप्न पूरा पाओगे।
*अलका मधुसूदन पटेल*
Monday, March 9, 2009
औरतें औरतें नहीं हैं !
ये पोस्ट कविता वाचक्नवीजी की मेहनत हैं । आप भी पढे और अपने विचार दे
बचपन में खेलते खेलते या खाते-खाते, या कई बार सोते में ही (मुख्य तो यही क्रम होता है, उस उम्र में) एक आवाज, बल्कि आवाज़ भी क्या चीत्कार सुनाई पड़ा करती थी, यह चीत्कार इतनी भयंकर व इतनी तीखी होने के साथ साथ इतनी दीर्घकालिक होती कि कई बार उस चीखने वाले/वाली से ही घृणा से भर जाता मन।उस चीख /चीत्कार की खोज में दौड़ते एक दिन पाया कि .... की बस्ती के कुछ लोग एक सूअर/ सूअरी को पकड़ने के लिए धड़े व दल में उस मोहल्ले से इस मोहल्ले तक की घेरेबंदी वाली दौड़ लगा रहे हैं और हमें घृणित प्रतीत होने वाला वह प्राणी भाग भाग कर बेहाल दुरावस्था में है| हर बार अंत में वह पकडा जाता /जाती। अंत उसका यही होता कि उस बिरादरी के लोगों के यहाँ होने जा रहे आयोजन के लिए उसे जिंदा जला कर भूना जाता। वह पूरी प्रक्रिया तो जान ने का कभी दुस्साहस नहीं हो पाया किंतु उसके चारों पैर बाँध कर उसे अग्नि के हवाले किए जाते तक देखा। भीषण दृश्य होता था। हवा में दुर्गन्ध व चीत्कारें। कई कई रात डर व पीड़ा में कांपते गुजरते। बचपन बीता, घर छूटा और वह चीत्कार व दृश्य भी।
गत दिनों एक ऐसे यथार्थ से आँखें फटी रह गईं कि वह बचपन का दृश्य उस दिन से बार बार डरपा रहा है, यादों में उमड़ा आ रहा है। आज के एक भीषण यथार्थ को प्रस्तुत करती कविता के लिए जब मैंने तत्सम्बन्धी वास्तविकताओं के चित्र देखे तो तब से हाथ- पैर बँधी एक स्त्री का चित्र ठीक उस सूअरी की याद दिलाता है, जिसे जिंदा आग में झोंक दिया जाता था और उसके तड़फड़ा कर आग से बाहर उलट/ झपट पड़ने की आशंका को दूर करने के लिए चारों और लोग उसे डंडे से ताने आग पर सेंकते रहते, धकेलते रहते। यदि किसी स्त्री को आज के युग में आप ऐसी अवस्था में देखें तो क्या हो मन की स्थिति ? ऐसी ही कष्ट में बेहाल स्त्रियों के चित्र देख मेरे रोंगटे खड़े हो गए, उनकी पीड़ा से त्रस्त हूँ .
चित्र के लिए तो वहीं जाना होगा ( वहाँ पहला चित्र ), किंतु इस पीड़ा को ऋषभदेव जी ने जो शब्द दिए हैं उन्हें मैं अपनी पसंद के रूप में आप को यहीं पढ़वा रही हूँ --
औरतें औरतें नहीं हैं !
-ऋषभ देव शर्मा
वे वीर हैं
मैं वसुंधरा.
उनके-मेरे बीच एक ही सम्बन्ध -
'वीर भोग्या वसुंधरा.'
वे सदा से मुझे जीतते आए हैं
भोगते आए हैं,
उनकी विजयलिप्सा अनादि है
अनंत है
विराट है.
जब वे मुझे नहीं जीत पाते
तो मेरी बेटियों पर निकालते हैं अपनी खीझ
दिखाते हैं अपनी वीरता.
युद्ध कहने को राजनीति है
पर सच में जघन्य अपराध !
अपराध - मेरी बेटियों के खिलाफ
औरतों के खिलाफ !
युद्धों में पहले भी औरतें चुराई जाती थीं
उनके वस्त्र उतारे जाते थे
बाल खींचे जाते थे
अंग काटे जाते थे
शील छीना जाता था ,
आज भी यही सब होता है.
पुरुष तब भी असभ्य था
आज भी असभ्य है,
तब भी राक्षस था
आज भी असुर है.
वह बदलता है हार को जीत में
औरतों पर अत्याचार करके.
सिपाही और फौजी
बन जाते हैं दुर्दांत दस्यु
और रौंद डालते हैं मेरी बेटियों की देह ,
निचोड़ लेते हैं प्राण देह से.
औरते या तो मर जाती हैं
[ लाखों मर रही हैं ]
या बन जाती हैं गूँगी गुलाम
..
वे विजय दर्प में ठहाके लगाते हैं !
वे रौंद रहे हैं रोज मेरी बेटियों को
मेरी आँखों के आगे.
पति की आँखों के आगे
पत्नी के गर्भ में घुसेड़ दी जाती हैं गर्म सलाखें.
माता-पिता की आँखों आगे
कुचल दिए जाते हैं अंकुर कन्याओं के.
एक एक औरत की जंघाओं पर से
फ्लैग मार्च करती गुज़रती है पूरी फौज,
माँ के विवर में ठूँस दिया जाता है बेटे का अंग !
औरतें औरतें हैं
न बेटियाँ हैं, न बहनें;
वे बस औरतें हैं
बेबस औरतें हैं.
दुश्मनों की औरतें !
फौजें जानती हैं
जनरल जानते हैं
सिपाही जानते हैं
औरतें औरतें नहीं होतीं
अस्मत होती हैं किसी जाति की.
औरतें हैं लज्जा
औरतें हैं शील
औरतें हैं अस्मिता
औरते हैं आज़ादी
औरतें गौरव हैं
औरतें स्वाभिमान.
औरतें औरतें नहीं
औरतें देश होती हैं.
औरत होती है जाति
औरत राष्ट्र होती है.
जानते हैं राजनीति के धुरंधर
जानते हैं रावण और दुर्योधन
जानते हैं शुम्भ और निशुम्भ
जानते हैं हिटलर और याहिया
कि औरतें औरतें नहीं हैं,
औरतें देश होती हैं.
औरत को रौंदो
तो देश रौंदा गया ,
औरत को भोगो
तो देश भोगा गया ,
औरत को नंगा किया
तो देश नंगा होगा,
औरत को काट डाला
तो देश कट गया.
जानते हैं वे
देश नहीं जीते जाते जीत कर भी,
जब तक स्वाभिमान बचा रहे!
इसीलिए
औरत के जननांग पर
फहरा दो विजय की पताका
देश हार जाएगा आप से आप!
इसी कूटनीति में
वीरगति पा रही हैं
मेरी लाखों लाख बेटियाँ
और आकाश में फहर रही हैं
कोटि कोटि विजय पताकाएँ!
इन पताकाओं की जड़ में
दफ़न हैं मासूम सिसकियाँ
बच्चियों की
उनकी माताओं की
उनकी दादियों-नानियों की.
उन सबको सजा मिली
औरत होने की
संस्कृति होने की
सभ्यता होने की.
औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!
औरत को जीतने का अर्थ है
संस्कृति को जीतना
सभ्यता को जीतना,
औरत को हराने का अर्थ है
मनुष्यता को हराना,
औरत को कुचलने का अर्थ है
कुचलना देवत्व की संभावनाओं को,
इसीलिए तो
उनके लिए
औरतें ज़मीनें हैं;
वे ज़मीन जीतने के लिए
औरतों को जीतते हैं!
Friday, February 27, 2009
मर्दानगी
हिन्दी ब्लॉगर ऋषभ देव शर्मा जी नारी आधरित विषयों पर अपनी राय ब्लॉग के माध्यम से हम तक पहुचाते रहे हैं । उनकी कलम से हमेशा एक संवेदन शील बात निकलती रही हैं जिस मे नारी के प्रति एक ऐसा नजरिया देखने को मिला हैं जो कम लोग रखते हैं ।
इस कविता को यहाँ पोस्ट करके हम शायद बस इतना कर रहे के की उनके कलम से निकली "अपनी बात को " एक बार फिर दोहरा रहे हैं ।
अकड़ी हुई मूँछें
बाहों पर उछलती हुई मछलियां
गरज़दार आवाज़

मर्दानगी
रखी है इतिहास के शोकेस में
चाबी भरने पर आवाज़ भी करती है
जब जम जाती है इस पर धूल
तो क्रेज़ी स्त्रीत्व अपने कोमल हाथों से
इसे झाड़-बुहार कर
फिर रख देता है शोकेस में
जब पुरानी पड़ जाती है
याकि मर जाती है
तो पुरानी की जगह नई सजा दी जाती है
मर्दानगी
खुश है अपने सजने पर
साल दर साल
पीढ़ी दर पीढ़ी
शोकेस में सजती आ रही है
मर्दानगी
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Thursday, February 19, 2009
अश्लील है तुम्हारा पौरुष
हिन्दी ब्लॉगर ऋषभ देव शर्मा जी नारी आधरित विषयों पर अपनी राय ब्लॉग के माध्यम से हम तक पहुचाते रहे हैं । उनकी कलम से हमेशा एक संवेदन शील बात निकलती रही हैं जिस मे नारी के प्रति एक ऐसा नजरिया देखने को मिला हैं जो कम लोग रखते हैं ।
इस कविता को यहाँ पोस्ट करके हम शायद बस इतना कर रहे के की उनके कलम से निकली "अपनी बात को " एक बार फिर दोहरा रहे हैं ।
पहले वे
लंबे चोगों पर सफ़ेद गोल टोपी
पहनकर आए थे
और
मेरे चेहरे पर तेजाब फेंककर
मुझे बुरके में बाँधकर चले गए थे.
आज वे फिर आए हैं
संस्कृति के रखवाले बनकर
एक हाथ में लोहे की सलाखें
और दूसरे हाथ में हंटर लेकर.
उन्हें शिकायत है मुझसे !
औरत होकर मैं
प्यार कैसे कर सकती हूँ ,
सपने कैसे देख सकती हूँ ,
किसी को फूल कैसे दे सकती हूँ !
मैंने किसी को फूल दिया
- उन्होंने मेरी फूल सी देह दाग दी.
मैंने उड़ने के सपने देखे
- उन्होंने मेरे सुनहरे पर तराश दिए.
मैंने प्यार करने का दुस्साहस किया
- उन्होंने मुझे वेश्या बना दिया.
वे यह सब करते रहे
और मैं डरती रही, सहती रही,
- अकेली हूँ न ?
कोई तो आए मेरे साथ ,
मैं इन हत्यारों को -
तालिबों और मुजाहिदों को -
शिव और राम के सैनिकों को -
मुहब्बत के गुलाब देना चाहती हूँ.
बताना चाहती हूँ इन्हें --
''न मैं अश्लील हूँ , न मेरी देह.
मेरी नग्नता भी अश्लील नहीं
-वही तो तुम्हें जनमती है!
अश्लील है तुम्हारा पौरुष
-औरत को सह नहीं पाता.
अश्लील है तुम्हारी संस्कृति
- पालती है तुम-सी विकृतियों को !
''अश्लील हैं वे सब रीतियाँ
जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती हैं.
अश्लील हैं वे सब किताबें
जो औरत को गुलाम बनाती हैं ,
-और मर्द को मालिक / नियंता .
अश्लील है तुम्हारी यह दुनिया
-इसमें प्यार वर्जित है
और सपने निषिद्ध !
''धर्म अश्लील हैं
-घृणा सिखाते हैं !
पवित्रता अश्लील है
-हिंसा सिखाती है !''
वे फिर-फिर आते रहेंगे
-पोशाकें बदलकर
-हथियार बदलकर ;
करते रहेंगे मुझपर ज्यादती.
पहले मुझे निर्वस्त्र करेंगे
और फिर
वस्त्रदान का पुण्य लूटेंगे.
वे युगों से यही करते आए हैं
- फिर-फिर यही करेंगे
जब भी मुझे अकेली पाएँगे !
नहीं ; मैं अकेली कहाँ हूँ ....
मेरे साथ आ गई हैं दुनिया की तमाम औरतें ....
--काश ! यह सपना कभी न टूटे !
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Tuesday, February 17, 2009
एक रिक्त अहसास है!
हाँ
मैं नारी हूँ,
वन्दनीय औ' पूजिता
कहते रहे हैं लोग,
कितने जीवन जिए हैं मैंने
कहाँ तो सप्तरिशी की पंक्ति में
विराजी गई,
सतियों की उपमा दे
पूजी गई।
मर्यादाओं में भी भारी
पड़ रही थी,
तब जागा पुरूष अंहकार
उसको परदे में बंद कर दिया,
सीमाओं में बाँध दिया
चारदीवारी से बाहर
देखना भी वर्जित था।
पति, पिता और पुत्र
यही पुरूष दर्शनीय थे।
तब भी जी रही थी
ओंठों को सिये
चुपचाप
आंसुओं के घूँट पी रही थी.
इसमें भी सदियाँ गुजरीं,
कहीं कोई
सद्पुरुष जन्म
नारी को भी मानव समझा
बहुत संघर्ष किए
तब
उनकी जंजीरों और बंधनों को
कुछ ढीले किए
शायद सद्बुद्धि आनी थी
नारी की भी
यही से बदलनी कहानी थी।
बदलते बदलते
आज यहाँ तक पहुँची
तो फिर
नकेल की होने लगी
एक नई तैयारी
क्या डाल पायेंगे नकेल?
ख़ुद सवालों में घिर गए
क्योंकि
अब की नारी
माटी का पुतला नहीं,
दुर्बल या अबला नहीं
ख़ुद को बचा सकती है।
अरे अपनी जन्मदात्री
का तो ख्याल करो
ये वही नारी है
जो सृष्टि को रचती है
शेष उसी से है
ये मानव जाति
ये नारी वह हस्ती है।
उसे संस्कार या मर्यादाओं
की शिक्षा तुम क्या दोगे?
जिससे सीखकर तुम आए हो
उसी को आइना दिखा रहे हो।
सडकों पर तमाशा
बनाकर क्या
वन्दनीय बन जाओगे।
सीता बन यदि
चुप है तो-
सब कुछ चलता है
गर दुर्गा बन
संहार पर उतर आई
तो तुम ही निंदनीय बन जाओगे।
सहेजो, समझाओ
उसे बहन बेटी बनाकर
प्यार से जग जीता जाता है
उनको दिशा दो
मगर प्यार से,
नासमझ वह भी नहीं,
जगत के दोनों ही
कर्णधार हैं।
नर-नारी से ही बना
ये संसार है।
इसे संयमित रहने दो
सृष्टि को नियमित चलने दो
न विरोधाभास है
न बैर का आभास है
एक दूसरे के बिना
दोनों एक रिक्त अहसास है.
अब तुलना चाहती हैं नारी
क्षमताओं की परिभाषा मे
अब तुलना चाहती हैं नारी ।
© 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Friday, February 13, 2009
कौन हो तुम ?
कभी -कभी अंतस से एक प्रश्न आता है ,
मेरे आस पास फ़ैल जाता है ।
ऊँचे पहाडों से टकराकर प्रतिध्वनित होता है ,
और मुझे लगता है
कि
सबकी आँखों में वही प्रश्न है ,
सबकी बातों में वही चिढ ।
कौन हो तुम ?
क्या चाहती हो ?
क्या कहूँ ?क्या उत्तर दूँ ?
दूँ भी...... तो क्या समझ लेंगे सब लोग मेरे उत्तर को?
सोचती हूँ कह दूँ -
एक नदी हूँ मैं
और चाहती हूँ कि मुझे अपने तरीके से बहने दिया जाए ।
अपने कगारों में बंधी ,
किनारे के पेडों से बतियाती ,बह लुंगी मैं ।
पर लोग हैं कि ...
बहने नही देते ।
कभी सोचती हूँ कह दूँ -
एक आग हूँ मैं ,
और चाहती हूँ
कि ,
मुझे अपने तरीके से जलने दिया जाए ।
किसी गृहणी के चूल्हे की लकडियों से बतियाती ,
भोजन बनाती जल लुंगी मैं ।
पर लोग हैं के ----
जलने नही देते ।
अब दिशाएं मौन हैं ,
न प्रश्न हैं ,न उत्तर हैं ।
जानती हूँ
मुझे अपने तरीके से जलने या बहने नही दिया जाएगा ।
फ़िर भी कहती हूँ ,
एक मनुष्य हूँ मैं ,
एक नारी हूँ मैं ,
और चाहती हूँ -----
कि.....
मुझे अपने तरीके से जीने दिया जाए .



