रोज देखते हैं बल्कि ऐसा कम ही देखते हैं. कभी कोई कन्या सड़क पर फ़ेंक दी, कभी मंदिर में और कभी अस्पताल में ही छोड़ कर चल दिए. पढ़ लिया और रख दिया लेकिन कभी ऐसी ही कोई बात द्रवित कर जाती है. ऐसे ही आज ही ये खबर पढ़ी और फिर कुछ लिख ही गया उस कन्या का दर्द उसकी जुबानी ही छलक गया.
माँ , ओ मेरी माँ !
गर जिन्दा रही मैं
तो मैं लड़की ही रहूंगी,
बस तू ये दुआ कर -
जिसको तूने मरने को फेंका था
बस वो जिन्दा रह जाए.
ईश्वर मुझे बचा ले,
आँचल तेरा नहीं था
गर मेरे नसीब में,
कचरे के हवाले तो
तूने इस तरह से न किया होता.
तडपी मैं बहुत हूँ,
कुत्तों ने जब नोचा था,
लहुलुहान मेरे तन से ज्यादा पीड़ा
मेरे मन को हो रही थी.
नफरत की चिंगारी एक
मन में सुलग रही थी.
वो खुदा का बंदा था
देखा जिसने कचरे में
सीने से लगा कर मुझको
अस्पताल ले गया था .
उससे बड़े दयालु वे हैं
कितना सहेज कर
घावों को धो सुखाकर
दवा मुझे लगाई औ'
फाहों में मुझे रखा.
माँ गर जिन्दा रही मैं
लड़की तो मैं रहूंगी
पर तेरी जैसे
निर्मम माँ न बनूगी,
अपने जिगर के टुकड़े को
तेरे जैसे न तजूंगी.
गर जीने नहीं देना था,
तो जीवन क्यों दिया था?
टकराऊंगी जहाँ से
आँचल उसे मैं दूँगी,
ज़माने की हर हवा से
बचा के उसको हरदम
फूल सा कोमल जीवन उसे मैं दूँगी.
सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता
Saturday, December 18, 2010
Thursday, December 16, 2010
स्त्री का उदघोष
कोमल नहीं हैं कर मेरे;
न कोमल कलाई है;
दिल नहीं है मोम का
प्रस्तर की कड़ाई है.
***********************
नहीं हैं झील सी ऑंखें;
हैं इनमे खून का दरिया;
मै हूँ मजबूत इरादों की
नहीं मै नाजुक -सी गुडिया.
***************************
उठेगा वार तेरा जो मुझे
दबाने के लिए;
उसे मै तोड़ डालूंगी
भले पहने हूँ चूड़िया.
************************
मुझे जो सोचकर अबला
करोगे बात शोषण की;
मिटा दूंगी तेरी हस्ती
है मुझमे आग शोलों की.
****************************
न कोमल कलाई है;
दिल नहीं है मोम का
प्रस्तर की कड़ाई है.
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नहीं हैं झील सी ऑंखें;
हैं इनमे खून का दरिया;
मै हूँ मजबूत इरादों की
नहीं मै नाजुक -सी गुडिया.
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उठेगा वार तेरा जो मुझे
दबाने के लिए;
उसे मै तोड़ डालूंगी
भले पहने हूँ चूड़िया.
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मुझे जो सोचकर अबला
करोगे बात शोषण की;
मिटा दूंगी तेरी हस्ती
है मुझमे आग शोलों की.
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Sunday, December 12, 2010
सीढ़ियाँ दर सीढ़ियाँ
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
एक दिन
अपने ही विचारों में खोई
बैठी थी अकेली
तभी अचानक
प्यारी सखी चमेली
आई मेरे पास
और बोली
सुन ओ सहेली !
बता मेरी एक
साधारण-सी पहेली,
यह समाज और
समाज के सुसंस्कृत लोग
क्यों हो गए हैं संकुचित ?
क्यों खोए हैं अपने में ?
क्यों हैं सभी कुंठाग्रस्त ?
या फिर क्यों हैं
एक-दूसरे से त्रस्त ?
उत्तर साधारण-सा है बहन
आज किसी को
किसी के दुख से
न तो है कोई सरोकार,
न कोई मतलब
और न कोई दरकार,
कोई नहीं है सुखी
दूसरे के सुख से,
तो किसी के दु:ख से भी
नहीं हैं दुखी,
शायद होते हैं ऐसे ही
निर्विकार लोग
जिन्हें किसी से
नहीं होती है प्रीत
जो नहीं होते हैं
किसी के शत्रु
और न किसी के मीत ।
सखी की बात सुनकर
मन में विचारों को गुनकर
मैंने समझाया उसे
जीने का मतलब---
'सखी रोली !
बड़ी है तू भोली
क्या इतना नहीं जानती
इसमें है अपनी भलाई,
क्योंकि इस जग में
हरेक उठने वाले को
मिलती है एक चुनौती,
उसके लिए यह
होती है परीक्षा की घड़ी
कि उसमें कितना है धैर्य
और कितना आक्रोश,
या फिर कितना है रोष ।
इस चुनौती को
जो करता है स्वीकार
और नहीं करता तकरार
पाता है वह एकदिन
ऊँचाई का सर्वोच्च शिखर
जहाँ पहुँचना असम्भव नहीं
तो आसान भी नहीं ।
मेरी सलोनी-सी
प्यारी-सी सखी ।
मत हो उदास,
बात को ध्यान से समझ,
सुन और गुन
मत रख किसी से आस,
न कर किसी पर विश्वास,
निरंतर बढ़ती रह आगे
चढ़ती रह जीवन की सीढ़ियाँ
सीढ़ियाँ-दर-सीढ़ियाँ,
वह दिन दूर नहीं
जब पहुँचेगी तू
अंतिम सोपान पर
न होगा वहाँ स्वार्थ
न पीड़ा, न त्रास,
जहाँ मिलेगी नई दिशा
नई खुशी और
मिलेगा नया सवेरा
नया उल्लास ।
डॉ. मीना अग्रवाल
एक दिन
अपने ही विचारों में खोई
बैठी थी अकेली
तभी अचानक
प्यारी सखी चमेली
आई मेरे पास
और बोली
सुन ओ सहेली !
बता मेरी एक
साधारण-सी पहेली,
यह समाज और
समाज के सुसंस्कृत लोग
क्यों हो गए हैं संकुचित ?
क्यों खोए हैं अपने में ?
क्यों हैं सभी कुंठाग्रस्त ?
या फिर क्यों हैं
एक-दूसरे से त्रस्त ?
उत्तर साधारण-सा है बहन
आज किसी को
किसी के दुख से
न तो है कोई सरोकार,
न कोई मतलब
और न कोई दरकार,
कोई नहीं है सुखी
दूसरे के सुख से,
तो किसी के दु:ख से भी
नहीं हैं दुखी,
शायद होते हैं ऐसे ही
निर्विकार लोग
जिन्हें किसी से
नहीं होती है प्रीत
जो नहीं होते हैं
किसी के शत्रु
और न किसी के मीत ।
सखी की बात सुनकर
मन में विचारों को गुनकर
मैंने समझाया उसे
जीने का मतलब---
'सखी रोली !
बड़ी है तू भोली
क्या इतना नहीं जानती
इसमें है अपनी भलाई,
क्योंकि इस जग में
हरेक उठने वाले को
मिलती है एक चुनौती,
उसके लिए यह
होती है परीक्षा की घड़ी
कि उसमें कितना है धैर्य
और कितना आक्रोश,
या फिर कितना है रोष ।
इस चुनौती को
जो करता है स्वीकार
और नहीं करता तकरार
पाता है वह एकदिन
ऊँचाई का सर्वोच्च शिखर
जहाँ पहुँचना असम्भव नहीं
तो आसान भी नहीं ।
मेरी सलोनी-सी
प्यारी-सी सखी ।
मत हो उदास,
बात को ध्यान से समझ,
सुन और गुन
मत रख किसी से आस,
न कर किसी पर विश्वास,
निरंतर बढ़ती रह आगे
चढ़ती रह जीवन की सीढ़ियाँ
सीढ़ियाँ-दर-सीढ़ियाँ,
वह दिन दूर नहीं
जब पहुँचेगी तू
अंतिम सोपान पर
न होगा वहाँ स्वार्थ
न पीड़ा, न त्रास,
जहाँ मिलेगी नई दिशा
नई खुशी और
मिलेगा नया सवेरा
नया उल्लास ।
डॉ. मीना अग्रवाल
nari ke tulya keval nari
क्या कभी कोई कर पायेगा
तुलना नारी के नाम से,
क्या कोई अदा कर पायेगा
सेवा की कीमत दाम से.
नारी के जीवन का पल-पल
नर सेवा में समर्पित है,
नारी के रक्त का हरेक कण
नर सम्मान में अर्पित है.
क्या चुका पायेगा कोई नर
प्यार का बदला काम से,
क्या कोई अदा कर पायेगा
सेवा की कीमत दाम से.
माँ के रूप में हो नारी
तो बेटे की बगिया सींचें,
पत्नी के रूप में होकर वह
जीवन रथ को मिलकर खींचें.
क्या कर सकता है कोई नर
दूर उनको मुश्किल तमाम से,
क्या कोई अदा कर पायेगा
सेवा की कीमत दाम से.
बहन के रूप में हो नारी
तो भाई की सँभाल करे,
बेटी के रूप में आकर वह
पिता सम्मान का ख्याल करे.
क्या दे पायेगा उनको वह
जीवन के सुख आराम से,
क्या कोई अदा कर पायेगा
सेवा की कीमत दाम से.
तुलना नारी के नाम से,
क्या कोई अदा कर पायेगा
सेवा की कीमत दाम से.
नारी के जीवन का पल-पल
नर सेवा में समर्पित है,
नारी के रक्त का हरेक कण
नर सम्मान में अर्पित है.
क्या चुका पायेगा कोई नर
प्यार का बदला काम से,
क्या कोई अदा कर पायेगा
सेवा की कीमत दाम से.
माँ के रूप में हो नारी
तो बेटे की बगिया सींचें,
पत्नी के रूप में होकर वह
जीवन रथ को मिलकर खींचें.
क्या कर सकता है कोई नर
दूर उनको मुश्किल तमाम से,
क्या कोई अदा कर पायेगा
सेवा की कीमत दाम से.
बहन के रूप में हो नारी
तो भाई की सँभाल करे,
बेटी के रूप में आकर वह
पिता सम्मान का ख्याल करे.
क्या दे पायेगा उनको वह
जीवन के सुख आराम से,
क्या कोई अदा कर पायेगा
सेवा की कीमत दाम से.
Saturday, December 11, 2010
एक बेहतरीन पोस्ट "मैं यह जान गयी हूँ कि…"
मैं यह जान गयी हूँ कि कितना ही बुरा क्यों न हुआ हो और आज मन में कितनी ही कड़वाहट क्यों न हो, यह ज़िंदगी चलती रहती है और आनेवाला कल खुशगवार होगा.
मैं यह जान गयी हूँ कि किसी शख्स को बारिश के दिन और खोये हुए लगेज के बारे में कुछ कहते हुए, और क्रिसमस ट्री में उलझती हुई बिजली की झालर से जूझते देखकर हम उसके बारे में बहुत कुछ समझ सकते हैं.
मैं यह जान गयी हूँ कि हमारे माता-पिता से हमारे संबंध कितने ही कटु क्यों न हो जाएँ पर उनके चले जाने के बाद हमें उनकी कमी बहुत शिद्दत से महसूस होती है.
मैं यह जान गयी हूँ कि पैसा बनाना और ज़िंदगी बनाना एक ही बात नहीं है.
मैं यह जान गयी हूँ कि ज़िंदगी हमें कभी-कभी एक मौका और देती है.
मैं यह जान गयी हूँ कि ज़िंदगी में राह चलते मिल जाने वाली हर चीज़ को उठा लेना मुनासिब नहीं है. कभी-कभी उन्हें छोड़ देना ही बेहतर होता है.
मैं यह जान गयी हूँ कि जब कभी मैं खुले दिल से कोई फैसला लेती हूँ तब मैं अमूमन सही होती हूँ.
मैं यह जान गयी हूँ कि मुझे दर्द सहना गवारा है मगर दर्द बन जाना मुझे मंज़ूर नहीं.
मैं यह जान गयी हूँ कि हर दिन मुझे किसी को प्यार से थाम लेना है. गर्मजोशी से गले मिलना या पीठ पर दोस्ताना धप्पी पाना किसी को बुरा नहीं लगता.
मैं यह जान गयी हूँ कि लोग हमारे शब्द और हमारे कर्म भूल जाते हैं पर कोई यह नहीं भूलता कि हमने उन्हें कैसी अनुभूतियाँ दीं.
मैं यह जान गयी हूँ कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है.
माया ऐन्जेलूये पोस्ट निशांत ने अपने ब्लॉग पर दी हैं । माया ऐन्जेलू के नाम को क्लिक किया तो काफी जानकारी मिली इनके बारे मे । निशांत के कमेंट्स ब्लोग्स पर पढ़ती रहती हूँ और नारी आधरित मुद्दों पर भी इनका साथ मिलता रहता हैं
सोच आज इनके ब्लॉग कि इस पोस्ट को अतिथि पोस्ट के रूप मे यहाँ दे दूँ ।
Thursday, December 9, 2010
वह नारी
देखा था मैंने 'उस' नारी को,
फूलों सी कोमल सुकुमारी को |
जन्म लेते होठों पर उसकी एक हँसी खिली थी,
परियों सी प्यारी वह एक नन्ही कली थी|
उन आँखों में कुछ आशा थी,
पर चारों ओर निराशा थी|
निराशा थी कुछ गरीबी की,
कुछ थी 'उसके' जन्म की |
डर था कुछ चिंताएं थीं ,
भय और कुछ शंकाएँ भी |
क्या यह नन्ही कली खिल पायेगी ?
या गरीबी के धुल में मिल जाएगी ?
क्या यौवन का फूल हँस पायेगा ?
या किसी के हाथों मसला जायेगा ?
सीता के लिए था एक रावण,
जो अब कदम कदम पर बसता है |
महाभारत में था था एक दुर्योधन,
पग पग पर जो अब हँसता है |
सीता को तो राम मिले थे,
द्रौपदी को कृष्ण सहाय हुए थे |
इसे भी कोई राम मिलेगा क्या ?
इसके लिए कोई कृष्ण बनेगा क्या ?
नियति उसके साथ में नहीं था,
मौत भी उसके हाथ में नहीं था |
जन्म लिया तो उसे जीना ही था,
गम को खाके आंसुओं को पीना हीं था|
अध् खिली थी यौवन की कली अभी ,
पर संकटें आ चुकी थी सभी |
हर एक कदम पे रावण, तो दुसरे पर दुर्योधन खड़ा था |
न राम ना हीं रक्षा में उसके कोई कृष्ण खड़ा था |
मौके पर सबने उसे अंगूठा हीं दिखलाया |
काम आया तो बस आत्मबल हीं काम आया |
नहीं थी वह निर्बल, शक्तिहीन, अबला |
थी वह तो सबल, सशक्त, सबला |
देखा है आज भी मैंने उस नारी को ,
कष्टों में घिरी देखा उस बेचारी को |
होठों पर उसके अब हँसी नहीं है ,
आँखों में अब आशाएं नहीं है |
गरीबी की भट्टी और भाग्य के आंच में खूब तपी है ,
पर चमकता सोना नहीं वह तो पत्थर बन चुकी है |
पत्थर क्यूँ? क्यूंकि वह रोती नहीं है ?
री अभागिनी तू क्यूँ रोती नहीं है ?
हाँ वह क्यूँ रोएगी ? रोकर वह क्या पायेगी ?
रोने से क्या नियति बदल जाएगी?
विधि को उसपे तरस आएगी ?
नहीं वह नहीं रोएगी कभी नहीं रोएगी |
भाग्य नहीं कर्म हीं की होकर रहेगी |
कर्म हीं से से तो वह रोटी पायेगी |
भाग्य भरोसे बस आँसु पायेगी |
रोकर वह क्या क्या कर पायेगी ?
क्या भाग्य को बदल पायेगी ?
नहीं वह दरिद्र है, दरिद्र हीं रह जाएगी |
नारी है बस नारी हीं रह जाएगी |
पत्थर है सोना नहीं बन पायेगी |
हाँ मजदूरनी है बस वही बनी रह जाएगी |
.................आलोकिता
Wednesday, December 8, 2010
मैं बेटी का हक मांगूंगी.......
क्यों किया पता हे मात -पिता !
कि कोख में मैं एक बेटी हूँ ,
उस पर ये गर्भ-पात निर्णय ;
सुनकर मैं कितनी चिंतित हूँ ?
*************************
हाँ ! सुनो जरा खुद को बदलो ,
मैं ऐसे हार न मानूगी ,
हे ! माता तेरी कोख में अब
मैं बेटी का हक़ मागूंगी !
**************************
बेटी के रूप में जन्म लिया ,
क्यों देख के मुरझाया चेहरा ?
मैं भी संतान तुम्हारी हूँ ,
फिर क्यों छाया दुःख का कोहरा ?
हाँ ! सुनो जरा खुद को बदलो !
मैं ऐसे हार न मानूगी ,
हे ! माता तेरी गोद में अब
मैं बेटी का हक़ मगूंगो !
*****************************
लालन -पालन मेरा करके
मुझको भी जीने का हक़ दो !
मैं करू तुम्हारी सेवा भी ,
ऐसी मुझमे ताकत भर दो ,
बेटी होकर ही अब मैं तुमसे
बेटों जैसा हक़ मागूंगी !
हे ! माता tere मन में अब
मैं बेटी का हक़ मागूंगी !
कि कोख में मैं एक बेटी हूँ ,
उस पर ये गर्भ-पात निर्णय ;
सुनकर मैं कितनी चिंतित हूँ ?
*************************
हाँ ! सुनो जरा खुद को बदलो ,
मैं ऐसे हार न मानूगी ,
हे ! माता तेरी कोख में अब
मैं बेटी का हक़ मागूंगी !
**************************
बेटी के रूप में जन्म लिया ,
क्यों देख के मुरझाया चेहरा ?
मैं भी संतान तुम्हारी हूँ ,
फिर क्यों छाया दुःख का कोहरा ?
हाँ ! सुनो जरा खुद को बदलो !
मैं ऐसे हार न मानूगी ,
हे ! माता तेरी गोद में अब
मैं बेटी का हक़ मगूंगो !
*****************************
लालन -पालन मेरा करके
मुझको भी जीने का हक़ दो !
मैं करू तुम्हारी सेवा भी ,
ऐसी मुझमे ताकत भर दो ,
बेटी होकर ही अब मैं तुमसे
बेटों जैसा हक़ मागूंगी !
हे ! माता tere मन में अब
मैं बेटी का हक़ मागूंगी !
अनुमति दो माँ ...
चरणों से दूर मत करो
जो अधिकार जन्म से है मिला
उस अधिकार को मत हरो
ऐसा क्या अनर्थ हुआ मुझसे
कि आपने मूंह फेर लिया
नौ महीने गर्भ में स्थान दिया
और दुनिया में लाकर त्याग दिया
माना कि गलती थी मेरी
आपकी सुध मैंने नही लिया
पर ममता नही होता क्षण-भंगुर
कभी त्याग दिया कभी समेट लिया
माना मै हूँ स्वार्थ का मारा
माँ की ममता न पहचान पाया
पर आप ने भी अधिकार न जताया
मुझे पराया कर तज दिया
अब मेरी बस इतनी इच्छा है
आप की गोद में वापस आऊँ
अपने संतान से आहत हुआ जब
लगा आपकी गोद में ही सिमट जाऊं
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Friday, December 3, 2010
ana कि कविता --- तोडती पत्थर
पत्थरों को तोडती वो अधमरी सी बुढ़िया
बन गयी है वो आज बेजान सी गुडिया
कभी वो भी रहती थी महलों के अन्दर
कभी थी वो अपने मुकद्दर का सिकंदर
असबाबों से था भरा उसका भी महल
नौकरों और चाकरों का भी था चहल पहल
बड़े घर के रानी का राजा था दिलदार
नहीं थी कमी कुछ भी भरा था वो घरबार
किलकारियां खूब थी उस सदन में
अतिथि का स्वागत था भव्य भवन में
पूरे शहर में था ढिंढोरा इनका
गरीब जो आये न जाए खाली हाथ
शहर के धनिकों में था इनका स्वागत
शहर बड़े लोग थे इनसे अवगत
पर चाहो हमेशा जो होता नहीं वो
कठीनाइयों से भरे दिन आ गए जो
व्यवसाय की हानि सम्भला न उनसे
बेटे-बहू ने रखा न जतन से
बड़े घर के राजा न सहा पाए वो सब दिन
वरन कर लिया मृत्यु को पल गया छिन
बुढ़िया बेचारी के दिन बद से बदतर
गर्भधारिणी माँ को किया घर से बेघर
करती वो क्या कोई चारा नहीं था
इस उम्र में कोई सहारा भी नहीं था
मेहनत मजदूरी ही थी उसकी किस्मत
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Wednesday, December 1, 2010
आलोकिता कि कविता
हमारे देश में देवियों की पूजा की जाती है बेटिओं को लक्ष्मी का रूप माना जाता है | फिर भी आज हमारे देश में कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध को अंजाम दिया जाता है | गर्भपात के दौरान मारी जाने वाली बच्चियों कि जगह खुद को रखकर कल्पना कीजिये तो रूह तक कांप उठेगी | कैसा लगता होगा उन्हें ? क्या सोचती होंगी वे ?शायद वे भी कुछ कहना चाहती होंगी अपनी माँ से ,अपने परिवार वालों से .......................................
~~~~~~~~~~
सुनो मुझे कुछ कहना है,
हाँ तुमसे हीं तो कहना है |
क्या कहकर तुम्हे संबोधित करूँ मैं ?
मैं कौन हूँ कैसे कहूँ मैं ?
एक अनसुनी आवाज़ हूँ मैं ,
एक अन्जाना एहसास हूँ मैं ,
एक अनकही व्यथा हूँ मैं ,
हृदय विदारक कथा हूँ मैं |
एक अजन्मी लड़की हूँ मैं |
मैं हूँ एक अजन्मी लड़की !
हाँ वही लड़की जिसे तुम जीवन दे न सकी,
हाँ वही मलिन बोझ जिसे तुम ढो न सकी |
अगर इस दुनिया में मैं आती, तुम्हारी बेटी कहलाती |
कहकर प्यार से माँ तुम्हे गले लगाती |
माँ तुम्हे कंहूँ तो कैसे ? जन्म तुमने दिया ही नहीं |
बेटी खुद को कहूँ तो कैसे ?जन्म तुमने दिया ही नहीं |
तुम सब ने मिलकर निर्दयता से मुझे मार डाला |
मेरे नन्हे जिस्म को चिथड़े चिथड़े, बोटी बोटी कर डाला |
सिर्फ लड़की होने की सजा मिली मुझको |
फाँसी से भी दर्दनाक मौत मिली मुझको |
सोचो क्या इस सजा की हकदार थी मैं ?
कहो तो क्या इतनी बड़ी गुनाहगार थी मैं ??
इंदिरा गाँधी, किरण बेदी मैं भी तो बन सकती थी!
नाम तुम्हारा जग में रौशन मैं भी कर सकती थी !
दलित, प्रताड़ित अबला नहीं सबला का रूप धर सकती थी|
तुम्हारे सारे दुःख संताप मैं भी तो हर सकती थी |
तुम्हारी तमनाएँ आशाएं सब को पूरा कर सकती थी |
न कर सकती तो बस इतना बेटा नहीं बन सकती थी |
बेटे से इतना प्यार तो बेटी से इतनी घृणा क्यूँ ?
दोनों तुम्हारे हीं अंश फिर फर्क उनमे इतना क्यूँ ?
काश ! तुम मुझे समझ पाती ,
प्यार से बेटी कह पाती |
काश ! मैं जन्म ले पाती,
जीवन का बोझ नहीं, प्यारी बेटी बन पाती |
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
बेटी का जीवन
बेटी का जीवन भी देखो कैसा अद्भुत होता है ,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
पैदा होती है जब बेटी ख़ुशी ना मन में आती है,
बाप के मुख पर छाई निराशा माँ भी मायूस हो जाती है,
विदा किये जाने तक उसके कल्पित बोझ को ढोता है,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
वंश के नाम पर बेटों को बेटी से बढ़कर माने,
बेटी के महत्व को ये तो बस इतना जाने,
जीवन में दान तो बस एक बेटी द्वारा होता है,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
पैदा होती है जब बेटी ख़ुशी ना मन में आती है,
बाप के मुख पर छाई निराशा माँ भी मायूस हो जाती है,
विदा किये जाने तक उसके कल्पित बोझ को ढोता है,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
वंश के नाम पर बेटों को बेटी से बढ़कर माने,
बेटी के महत्व को ये तो बस इतना जाने,
जीवन में दान तो बस एक बेटी द्वारा होता है,
देख के इसको पाल के इसको जीवनदाता रोता है.
Sunday, November 28, 2010
इग्नोर करो
चलती कार मे
एक लड़की कि अस्मिता को लुटा जाता हैं
और लड़की को ही समझाया जाता है
इग्नोर करो ये सब तो होता रहता हैं
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
एक लड़की कि अस्मिता को लुटा जाता हैं
और लड़की को ही समझाया जाता है
इग्नोर करो ये सब तो होता रहता हैं
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Saturday, November 20, 2010
जिजीविषा
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
शुष्क तपते रेगिस्तान के
अनंत अपरिमित विस्तार में
ना जाने क्यों मुझे
अब भी कहीं न कहीं
एक नन्हे से नखलिस्तान
के मिल जाने की आस है
जहां स्वर्गिक सौंदर्य से ओत प्रोत
सुरभित सुवासित रंग-बिरंगे
फूलों का एक सुखदायी उद्यान
लहलहा रहा होगा !
सातों महासागरों की अथाह
अपार खारी जलनिधि में
प्यास से चटकते
मेरे चिर तृषित अधरों को
ना जाने क्यों मुझे आज भी
एक मीठे जल की
अमृतधारा के मिल जाने की
जिद्दी सी आस है जो मेरे
प्यास से चटकते होंठों की
प्यास बुझा देगी !
विषैले कटीले तीक्ष्ण
कैक्टसों के विस्तृत वन की
चुभन भरी फिजां में
ना जाने क्यों मुझे
आज भी माँ के
नरम, मुलायम, रेशमी
ममतामय, स्नेहिल, स्निग्ध,
सहलाते से कोमल
स्पर्श की आस है
जो कैक्टसों की खंरोंच से
रक्तरंजित मेरे शरीर को
बेहद प्यार से लपेट लेगा !
सदियों से सूखाग्रस्त घोषित
कठोर चट्टानी बंजर भू भाग में
ना जाने क्यों मुझे
अभी भी चंचल चपल
कल-कल छल-छल बहती
मदमाती इठलाती वेगवान
एक जीवनदायी जलधारा के
उद्भूत होने की आस है
जो उद्दाम प्रवाह के साथ
अपना मार्ग स्वयं विस्तीर्ण करती
निर्बाध नि:शंक अपनी
मंजिल की ओर बहती हो !
लेकिन ना जाने क्यों
वर्षों से तुम्हारी
धारदार, पैनी, कड़वी और
विष बुझी वाणी के
तीखे और असहनीय प्रहारों में
मुझे कभी वह मधुरता और प्यार,
हितचिंता और शुभकामना
दिखाई नहीं देती
जिसके दावे की आड़ में
मैं अब तक इसे सहती आई हूँ
लेकिन कभी महसूस नहीं कर पाई !
साधना वैद
शुष्क तपते रेगिस्तान के
अनंत अपरिमित विस्तार में
ना जाने क्यों मुझे
अब भी कहीं न कहीं
एक नन्हे से नखलिस्तान
के मिल जाने की आस है
जहां स्वर्गिक सौंदर्य से ओत प्रोत
सुरभित सुवासित रंग-बिरंगे
फूलों का एक सुखदायी उद्यान
लहलहा रहा होगा !
सातों महासागरों की अथाह
अपार खारी जलनिधि में
प्यास से चटकते
मेरे चिर तृषित अधरों को
ना जाने क्यों मुझे आज भी
एक मीठे जल की
अमृतधारा के मिल जाने की
जिद्दी सी आस है जो मेरे
प्यास से चटकते होंठों की
प्यास बुझा देगी !
विषैले कटीले तीक्ष्ण
कैक्टसों के विस्तृत वन की
चुभन भरी फिजां में
ना जाने क्यों मुझे
आज भी माँ के
नरम, मुलायम, रेशमी
ममतामय, स्नेहिल, स्निग्ध,
सहलाते से कोमल
स्पर्श की आस है
जो कैक्टसों की खंरोंच से
रक्तरंजित मेरे शरीर को
बेहद प्यार से लपेट लेगा !
सदियों से सूखाग्रस्त घोषित
कठोर चट्टानी बंजर भू भाग में
ना जाने क्यों मुझे
अभी भी चंचल चपल
कल-कल छल-छल बहती
मदमाती इठलाती वेगवान
एक जीवनदायी जलधारा के
उद्भूत होने की आस है
जो उद्दाम प्रवाह के साथ
अपना मार्ग स्वयं विस्तीर्ण करती
निर्बाध नि:शंक अपनी
मंजिल की ओर बहती हो !
लेकिन ना जाने क्यों
वर्षों से तुम्हारी
धारदार, पैनी, कड़वी और
विष बुझी वाणी के
तीखे और असहनीय प्रहारों में
मुझे कभी वह मधुरता और प्यार,
हितचिंता और शुभकामना
दिखाई नहीं देती
जिसके दावे की आड़ में
मैं अब तक इसे सहती आई हूँ
लेकिन कभी महसूस नहीं कर पाई !
साधना वैद
Saturday, November 13, 2010
सच हूँ मैं
सच हूँ मैं
एक शाश्वत
कोई बेजान साया नहीं हूँ .
संपदा किसी की
या कोई सरमाया नहीं हूँ.
धडकता है एक दिल
मेरे भी सीने में
पाना चाहती हूँ मै भी वह ख़ुशी,
जो मिलती है उन्मुक्त जीने में
तुम समझते हो मुझे अपनी जागीर
तो यह तुम्हारी ही भूल है.
नही जान पाए मेरे खाबों की ताबीर
तो यह तुम्हारी ही भूल है.
मेरे खाबों में,
जीवन की बुनियादों में
भले ही रंग भरना न भरना.
पर फिर मुझे साया
या अपना सरमाया
समझने की गलती न करना.
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
एक शाश्वत
कोई बेजान साया नहीं हूँ .
संपदा किसी की
या कोई सरमाया नहीं हूँ.
धडकता है एक दिल
मेरे भी सीने में
पाना चाहती हूँ मै भी वह ख़ुशी,
जो मिलती है उन्मुक्त जीने में
तुम समझते हो मुझे अपनी जागीर
तो यह तुम्हारी ही भूल है.
नही जान पाए मेरे खाबों की ताबीर
तो यह तुम्हारी ही भूल है.
मेरे खाबों में,
जीवन की बुनियादों में
भले ही रंग भरना न भरना.
पर फिर मुझे साया
या अपना सरमाया
समझने की गलती न करना.
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Tuesday, November 9, 2010
फूल और काँटे
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
नारी ने सीखा
फूलों से खिलना,
मुस्कुराना और महकना,
तितलियों से सीखा
ऊँचाइयों तक उड़ना
और रंग बिखेरना,
भौंरों से सीखा
गीत गुनगुनाना,
चिड़ियों से सीखा
तिनका-तिनका जोड़कर
घौंसला बनाना,
और जीवन के
हर मोड़ पर चहचहाना,
नदी से सीखा
हरदम बहना
और गतिशील रहना,
सूरज से सीखा
रोशनी लुटाना,
चाँद से सीखा
शीतलता देना और
चाँदनी बिखेरना,
पत्तों से सीखा
हिल-मिल रहना
और इक-दूजे से
सुख-दुख की कथा कहना,
धरती से सीखी धीरता,
आकाश से सीखा विस्तार,
पर्वत से सीखा
संघर्ष के कठिन क्षणों में
फौलाद बन अडिग रहना,
दीपक की बाती से सीखा
निरंतर जलना,
स्थिर रहना,
जगमगाना
और जलकर भी
तम को दूर भगाना,
नारी ने सागर से पाई
मनभर गहराई,
पर्वत से पाई
अछोर ऊँचाई,
पेड़ से सीखा
हरा-भरा रहना
और थके मन-राही को
छाया देना,
नारी ने पवन से सीखा
प्राण लुटाना,
और जल से ली तरलता,
नारी काँटों से भी
करती है प्यार,
उनका भी करती है सत्कार,
क्योंकि फूल के
मुरझाने पर भी
कभी मुरझाते नहीं हैं काँटे!
काँटे करते हैं सदैव
रक्षा फूलों की
और महका देते हैं
पूरे वातावरण को
अपनी महक से !
फूल से इसीलिए तो
जोड़ दिए हैं काँटे भी
विधाता ने !
डॉ. मीना अग्रवाल
नारी ने सीखा
फूलों से खिलना,
मुस्कुराना और महकना,
तितलियों से सीखा
ऊँचाइयों तक उड़ना
और रंग बिखेरना,
भौंरों से सीखा
गीत गुनगुनाना,
चिड़ियों से सीखा
तिनका-तिनका जोड़कर
घौंसला बनाना,
और जीवन के
हर मोड़ पर चहचहाना,
नदी से सीखा
हरदम बहना
और गतिशील रहना,
सूरज से सीखा
रोशनी लुटाना,
चाँद से सीखा
शीतलता देना और
चाँदनी बिखेरना,
पत्तों से सीखा
हिल-मिल रहना
और इक-दूजे से
सुख-दुख की कथा कहना,
धरती से सीखी धीरता,
आकाश से सीखा विस्तार,
पर्वत से सीखा
संघर्ष के कठिन क्षणों में
फौलाद बन अडिग रहना,
दीपक की बाती से सीखा
निरंतर जलना,
स्थिर रहना,
जगमगाना
और जलकर भी
तम को दूर भगाना,
नारी ने सागर से पाई
मनभर गहराई,
पर्वत से पाई
अछोर ऊँचाई,
पेड़ से सीखा
हरा-भरा रहना
और थके मन-राही को
छाया देना,
नारी ने पवन से सीखा
प्राण लुटाना,
और जल से ली तरलता,
नारी काँटों से भी
करती है प्यार,
उनका भी करती है सत्कार,
क्योंकि फूल के
मुरझाने पर भी
कभी मुरझाते नहीं हैं काँटे!
काँटे करते हैं सदैव
रक्षा फूलों की
और महका देते हैं
पूरे वातावरण को
अपनी महक से !
फूल से इसीलिए तो
जोड़ दिए हैं काँटे भी
विधाता ने !
डॉ. मीना अग्रवाल
तुम्हें पता है ???
तुम्हें पता है ???
बादलों की अनधुनी
अधधुली रुई
सिमटी है मेरे आंचल में
महसूस किया तुम्हें
मैंने और
भीगे तुम मेरे प्यार में
लहर लहर लहराये
तुम्हारे इषारे
पत्तियों में छनती धूप की तरह
मेरे हदय आंगन में
समेट लिया
तुम्हारे छुए प्यार को
पवित्र ओस की तरह
और सज गया एक फूल
मेरे जीवन में
हूबहू तम्हारी तरह !!!!
तुम्हें पता है ???
वो फूल
अब भी
इर्द गिर्द ही है
मेरे !!....किरण राजपुरोहित नितिला
बादलों की अनधुनी
अधधुली रुई
सिमटी है मेरे आंचल में
महसूस किया तुम्हें
मैंने और
भीगे तुम मेरे प्यार में
लहर लहर लहराये
तुम्हारे इषारे
पत्तियों में छनती धूप की तरह
मेरे हदय आंगन में
समेट लिया
तुम्हारे छुए प्यार को
पवित्र ओस की तरह
और सज गया एक फूल
मेरे जीवन में
हूबहू तम्हारी तरह !!!!
तुम्हें पता है ???
वो फूल
अब भी
इर्द गिर्द ही है
मेरे !!....किरण राजपुरोहित नितिला
Friday, October 22, 2010
कुछ लोग औरत को जमीन समझते हैं
कुछ लोग औरत को जमीन समझते हैं
हमेशा पैरो तले रौंदते हैं
कुछ लोग औरत को जमीन समझते हैं
जब चाहते हैं बेचते खरीदते हैं
कुछ लोग औरत को जमीन समझते हैं
फसल पर फसल उगाते हैं
कुछ लोग औरत को जमीन समझते हैं
माँ कहते हैं पर कुपुत्र ही रहते हैं
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
हमेशा पैरो तले रौंदते हैं
कुछ लोग औरत को जमीन समझते हैं
जब चाहते हैं बेचते खरीदते हैं
कुछ लोग औरत को जमीन समझते हैं
फसल पर फसल उगाते हैं
कुछ लोग औरत को जमीन समझते हैं
माँ कहते हैं पर कुपुत्र ही रहते हैं
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Thursday, October 21, 2010
तुम्हें बदलना होगा
औरों से अब मत दया की भीख ले
अपना बनता हक छीनना सीख ले.
अब चुप रहना कायरता मानी जाती है,
क्रोधित स्वर की शक्ति पहचानी जाती है.
शांति और अहिंसा के आयाम हैं बदले,
जीवन-मूल्य भी बदले, उनके नाम भी बदले.
समय के परिवर्तन से तुम्हें बदलना होगा,
छोड़ पुरानी राह नयी पे चलना होगा.
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Monday, October 11, 2010
स्वयंवर
स्वयंवर
जो हुआ था
अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका का
सीता और द्रौपदी का
क्या वास्तव में स्वयं-वर था?
अगर था
तो क्या थी स्वयंवर की परिभाषा?
स्वेछित वर चुनने का अधिकार
अथवा कन्या का नीलामी युक्त प्रदर्शन!
जिसमें
इच्छुक उमीदवार
धन-बल की अपेक्षा
लगाते थे अपना बाहू-बल
दिखाते थे अपना पराक्रम और कौशल
और जीत ले जाते थे कन्या को
भले ही इसमें उसकी सहमति
हो या न हो.
तभी तो उठा लाया था भीष्म
उन तीन बहनों को
अपने बीमार और नपुंसक भाइयों के लिए.
और अर्जुन ने बाँट ली थी याज्ञसेनी
अपने भाइयों में बराबर.
वास्तव में ही अगर
स्वयंवर का अधिकार
नारी को मिला होता
तो अम्बिका और अम्बा की
(आत्म) हत्या का बोझ
इतिहास न ढोता.
महा विध्वंसकारी महाभारत का
युद्ध न होता
और हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास
कुछ और ही होता.
हाँ ! कुछ और ही होता.
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जो हुआ था
अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका का
सीता और द्रौपदी का
क्या वास्तव में स्वयं-वर था?
अगर था
तो क्या थी स्वयंवर की परिभाषा?
स्वेछित वर चुनने का अधिकार
अथवा कन्या का नीलामी युक्त प्रदर्शन!
जिसमें
इच्छुक उमीदवार
धन-बल की अपेक्षा
लगाते थे अपना बाहू-बल
दिखाते थे अपना पराक्रम और कौशल
और जीत ले जाते थे कन्या को
भले ही इसमें उसकी सहमति
हो या न हो.
तभी तो उठा लाया था भीष्म
उन तीन बहनों को
अपने बीमार और नपुंसक भाइयों के लिए.
और अर्जुन ने बाँट ली थी याज्ञसेनी
अपने भाइयों में बराबर.
वास्तव में ही अगर
स्वयंवर का अधिकार
नारी को मिला होता
तो अम्बिका और अम्बा की
(आत्म) हत्या का बोझ
इतिहास न ढोता.
महा विध्वंसकारी महाभारत का
युद्ध न होता
और हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास
कुछ और ही होता.
हाँ ! कुछ और ही होता.
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Tuesday, October 5, 2010
अजन्मी बिटिया के मन की पुकार
अजन्मी बिटिया के मन की पुकार
सपने में आई
ठुमकती-ठुमकती
रुनझुन करती
शरमाई, सकुचाई
नन्ही-सी परी
धीरे से बोली
माँ के कान में
माँ!तू मुझे जनम तो देती।
मैं धरती पर आती
मुझे देख तू मुस्कुराती,
तेरी पीड़ा हरती,
दादी की गोद में
खेलती-मचलती,
घुटवन चलती,
ख़ुशियों से बाबुल की
मैं झोली भरती,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
मैयाँ-मैयाँ चलती मैं
बाबुल के अँगना में
डगमग डग धरती,
घर के हर कोने में
फूलों-सी महकती,
घर की अँगनाइयों में
रिमझिम बरसती,
माँ-बापू की
बनती मैं दुलारी,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
तोतली बोली में
चिड़ियों को बुलाती,
दाना चुगाती
उनके संग-संग
मैं भी चहकती,
दादी का भी
मन बहलाती,
बाबा की मैं
कहलाती लाड़ली,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
आँगन बुहारती
गुड़ियों का ब्याह रचाती
बाबुल के खेत पर
रोटी पहुँचाती,
सबकी आँखों का
बनती मैं सितारा,
पर जनम तो लेती माँ!
जनम तो लेती मैं।
ऊँचाइयों पर चढ़ती,
धारा के साथ-साथ
आगे ही आगे बढ़ती,
तेरे कष्टों को
मैं दूर करती,
तेरे तन-मन में
दूर तक उतरती,
जीवन के अभावों को
नन्हे भावों से भरती,
तेरे जीवन की
बनती मैं आशा,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
ओढ़ चुनरिया
बनती दुल्हनियाँ
अपने भैया की
नटखट बहनियाँ,
ससुराल जाती तो
दोनों कुलों की
लाज मैं रखती,
देहरी दीपक बन
दोनों घरों को
भीतर और बाहर से
जगमग मैं करती,
सावन में मेहा बन
मन-आँगन भिगोती,
भैया की कलाई की
राखी मैं बनती,
बाबुल के
तपते तन-मन को
छाया मैं देती,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
माँ बनती तो
तेरे आँगन को मैं
खुशियों से भरती,
बापू की आँखों की
रोशनी बनकर
जीवन में आशा का
संचार करती
तेरे आँगन का
बिरवा बनकर
तेरी बिटिया बनकर
माटी को मैं
चन्दन बनाती,
दुख दूर करती सारे
सुख के गीत गाती,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
तेरे और बापू के
बुढ़ापे की लकड़ी बनकर
डगमग जीवन का
सहारा मैं बनती,
संघर्षों की धूप में
तपते तन को
देती मैं छाया
उदास मन को
देती मैं दिलासा,
पर जनम तो लेती
मैं जनम तो लेती
माँ!जनम तो देती
तू मुझे जनम तो देती।
डॉ. मीना अग्रवाल
सपने में आई
ठुमकती-ठुमकती
रुनझुन करती
शरमाई, सकुचाई
नन्ही-सी परी
धीरे से बोली
माँ के कान में
माँ!तू मुझे जनम तो देती।
मैं धरती पर आती
मुझे देख तू मुस्कुराती,
तेरी पीड़ा हरती,
दादी की गोद में
खेलती-मचलती,
घुटवन चलती,
ख़ुशियों से बाबुल की
मैं झोली भरती,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
मैयाँ-मैयाँ चलती मैं
बाबुल के अँगना में
डगमग डग धरती,
घर के हर कोने में
फूलों-सी महकती,
घर की अँगनाइयों में
रिमझिम बरसती,
माँ-बापू की
बनती मैं दुलारी,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
तोतली बोली में
चिड़ियों को बुलाती,
दाना चुगाती
उनके संग-संग
मैं भी चहकती,
दादी का भी
मन बहलाती,
बाबा की मैं
कहलाती लाड़ली,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
आँगन बुहारती
गुड़ियों का ब्याह रचाती
बाबुल के खेत पर
रोटी पहुँचाती,
सबकी आँखों का
बनती मैं सितारा,
पर जनम तो लेती माँ!
जनम तो लेती मैं।
ऊँचाइयों पर चढ़ती,
धारा के साथ-साथ
आगे ही आगे बढ़ती,
तेरे कष्टों को
मैं दूर करती,
तेरे तन-मन में
दूर तक उतरती,
जीवन के अभावों को
नन्हे भावों से भरती,
तेरे जीवन की
बनती मैं आशा,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
ओढ़ चुनरिया
बनती दुल्हनियाँ
अपने भैया की
नटखट बहनियाँ,
ससुराल जाती तो
दोनों कुलों की
लाज मैं रखती,
देहरी दीपक बन
दोनों घरों को
भीतर और बाहर से
जगमग मैं करती,
सावन में मेहा बन
मन-आँगन भिगोती,
भैया की कलाई की
राखी मैं बनती,
बाबुल के
तपते तन-मन को
छाया मैं देती,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
माँ बनती तो
तेरे आँगन को मैं
खुशियों से भरती,
बापू की आँखों की
रोशनी बनकर
जीवन में आशा का
संचार करती
तेरे आँगन का
बिरवा बनकर
तेरी बिटिया बनकर
माटी को मैं
चन्दन बनाती,
दुख दूर करती सारे
सुख के गीत गाती,
पर जनम तो देती माँ!
तू मुझे जनम तो देती।
तेरे और बापू के
बुढ़ापे की लकड़ी बनकर
डगमग जीवन का
सहारा मैं बनती,
संघर्षों की धूप में
तपते तन को
देती मैं छाया
उदास मन को
देती मैं दिलासा,
पर जनम तो लेती
मैं जनम तो लेती
माँ!जनम तो देती
तू मुझे जनम तो देती।
डॉ. मीना अग्रवाल
Sunday, September 19, 2010
कितनी मौत?
वे उसकी मौत पर
मातम मना रहे थे,
चिल्ला-चिल्ला कर
सब रो रहे थे.
उनमें वे लोग भी थे
जो जीते जी उसका
जीवन नरक बनाये रहे
औ' देते रहे रोज नई मौत.
आज उसके मुर्दे को
सजा रहे हैं,
साथ ही आंसुओं से
नहला रहे हैं.
दूर उसकी आत्मा खड़ी
अट्टहास कर रही है -
वाह रे दुनिया वालो,
जिन्दा रहते जब
हजार मौत मरती रही
तब कहाँ थे?
पहली बार मैं तब मरी
जब दहेज़ के लिए
मेरे पिता को कोसा था तुमने
गालियों से नवाजा था मेरी माँ को,
दूसरी बार उस वक्त मरी
जब बेटी को जन्म था मैंने,
और फिर
बेटी के होने के ताने ने
बार बार मारा मुझे.
तुम्हारी बेटे की चाह ने
कई बार मारा मुझे,
आखिर मेरी बेटियों के साथ
घर से निकला तुमने.
मेरा सब्र टूट चुका था,
बेटियों को सुलाकर मंदिर में
जल समाधि ले ली मैंने
फिर भी नहीं छोड़ा ,
मेरी लाश भी ले आये.
अब दुनियाँ की नज़रों में
महान बन रहे हो,
फूलों की माला
सजीली साड़ी से मुँह ढक कर
चेहरा छुपा रहे हो.
मेरी इस पूरी मौत पर
दुनियाँ को तमाशा दिखा रहे हो.
Thursday, September 2, 2010
क्योकि मैने निष्ठा से सिर्फ तुमको चाहा
आये थे कृष्ण एक बार वापस विरंदावन
कहा था उन्होने राधा से
" तुम्हे ही चाहता हूँ मै प्रिये
लौटा हूँ
फिर एक बार पाने के लिये प्यार तुम्हारा "
बोली राधा
" मेरा प्यार तो सदा ही है तुम्हारा
पर क्या तुम रुक्मणी को छोड़ कर आये हों "
बोले कृष्ण " रुक्मणी पत्नी है और राधा तुम प्यार हों मेरा "
" अब वापस तो नहीं जाओगे " राधा का प्रश्न था
" नहीं वापस तो जाना है , संसार का कर्म निभाना है"
बोली फिर राधा " जाओ लॉट जाओ
रुक्मणी को छोड़ कर आते तो मेरा प्यार पाते
इस युग मे तो क्या किसी भी युग मे मुझे तक
वापस आओगे मेरा प्यार पाओगे पर
जैसे मै तुम्हारी हूँ
तुमको भी केवल मेरा बन कर रहना होगा
मुझे प्यार करना और रुक्मणी से विवाह करना
ये पहली गलती थी और
फिर वापस आकर मेरे प्यार की कामना
दूसरी ग़लती है तुम्हारी "
वापस चले गए कृषण
और जाकर अपनी इस यात्रा का विवरण
इतिहास से ही मिटा दिया
क्योकि उन्हें तो भगवान बनना था
मिटा दिया नारी की जागरुकता को
और पुरुष कि कायरता को
उन्होने इतिहास के पन्नो से
क्योकि इतिहास तो हमेशा पुरुष ही लिखते है
फिर एक दिन
फिर मिले वह राधा से
कई युगो बाद
एक मंदिर मे
कहा राधा ने
देखो आज मै भी वहीं स्थापित हूँ
जहां तुम स्थापित हो
पर मेरा नाम तुम्हारे नाम से पहले
लेते है लोग इस युग के
क्योकी उस युग मे मै सही थी
प्रेम एक वक़्त मे केवल एक से करना
हों सकता है फिर दुसरे युग मे
तुम पराई स्त्री के साथ नहीं
रुक्मणी के साथ पूजे जाओ
तुमने जो कुछ पाया
मुझे भी वही मिला
अलग अलग रास्तो से
एक ही जगह पहुंच गए है हम
पर है हम " राधा कृष्ण "
क्योकि मैने निष्ठा से
सिर्फ तुमको चाहा
और
अपना सम्मान मैने
स्वयम अर्जित किया
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
कहा था उन्होने राधा से
" तुम्हे ही चाहता हूँ मै प्रिये
लौटा हूँ
फिर एक बार पाने के लिये प्यार तुम्हारा "
बोली राधा
" मेरा प्यार तो सदा ही है तुम्हारा
पर क्या तुम रुक्मणी को छोड़ कर आये हों "
बोले कृष्ण " रुक्मणी पत्नी है और राधा तुम प्यार हों मेरा "
" अब वापस तो नहीं जाओगे " राधा का प्रश्न था
" नहीं वापस तो जाना है , संसार का कर्म निभाना है"
बोली फिर राधा " जाओ लॉट जाओ
रुक्मणी को छोड़ कर आते तो मेरा प्यार पाते
इस युग मे तो क्या किसी भी युग मे मुझे तक
वापस आओगे मेरा प्यार पाओगे पर
जैसे मै तुम्हारी हूँ
तुमको भी केवल मेरा बन कर रहना होगा
मुझे प्यार करना और रुक्मणी से विवाह करना
ये पहली गलती थी और
फिर वापस आकर मेरे प्यार की कामना
दूसरी ग़लती है तुम्हारी "
वापस चले गए कृषण
और जाकर अपनी इस यात्रा का विवरण
इतिहास से ही मिटा दिया
क्योकि उन्हें तो भगवान बनना था
मिटा दिया नारी की जागरुकता को
और पुरुष कि कायरता को
उन्होने इतिहास के पन्नो से
क्योकि इतिहास तो हमेशा पुरुष ही लिखते है
फिर एक दिन
फिर मिले वह राधा से
कई युगो बाद
एक मंदिर मे
कहा राधा ने
देखो आज मै भी वहीं स्थापित हूँ
जहां तुम स्थापित हो
पर मेरा नाम तुम्हारे नाम से पहले
लेते है लोग इस युग के
क्योकी उस युग मे मै सही थी
प्रेम एक वक़्त मे केवल एक से करना
हों सकता है फिर दुसरे युग मे
तुम पराई स्त्री के साथ नहीं
रुक्मणी के साथ पूजे जाओ
तुमने जो कुछ पाया
मुझे भी वही मिला
अलग अलग रास्तो से
एक ही जगह पहुंच गए है हम
पर है हम " राधा कृष्ण "
क्योकि मैने निष्ठा से
सिर्फ तुमको चाहा
और
अपना सम्मान मैने
स्वयम अर्जित किया
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
शुभ चिन्तक
वो हर इंसान जो
किसी भी नारी को
प्रेरित करता हो
दब्बू बन कर रहने को
और अपने को उस नारी का
शुभ चिन्तक कहता हो
वो एक झूठ को
खुद भी जीता हैं
और दुसरो को भी मजबूर करता हैं
उस झूठ को जीने को
किसी भी नारी को
प्रेरित करता हो
दब्बू बन कर रहने को
और अपने को उस नारी का
शुभ चिन्तक कहता हो
वो एक झूठ को
खुद भी जीता हैं
और दुसरो को भी मजबूर करता हैं
उस झूठ को जीने को
Tuesday, August 31, 2010
Sunday, August 15, 2010
आज़ाद इस दुनिया मे आयी हूँ आज़ाद ही रहूँगी
बहुत बार पूछा जाता हैं नारी से
क्यूँ वो आज़ादी चाहती हैं
और किस से
आज़ादी के पावन पर्व पर
कहती हैं नारी
सबसे पहले मै
आज़ादी चाहती हूँ इस प्रश्न से
कि क्यूँ और किस से मुझे
आज़ादी चाहिये
आज़ादी चाहती हूँ इस मानसिकता से
जहां मेरी सोच को ही दायरों मे बंधा जाता हैं
जहां मेरे विस्तार पर मेरे चरित्र को आंका जाता हैं
जहां मुझ से तर्क मे ना जीतने पर
मेरे शरीर पर निशाना साधा जाता हैं
जहां मेरे हर काम को
नारीवादी का कह कर नकारा जाता हैं
इस आज़ादी कि मै हकदार हूँ
और ले कर रहूंगी
जितना चाहो , जो चाहो
तुम कर के देख लो
आज़ाद इस दुनिया मे आयी हूँ
आज़ाद ही रहूँगी
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
क्यूँ वो आज़ादी चाहती हैं
और किस से
आज़ादी के पावन पर्व पर
कहती हैं नारी
सबसे पहले मै
आज़ादी चाहती हूँ इस प्रश्न से
कि क्यूँ और किस से मुझे
आज़ादी चाहिये
आज़ादी चाहती हूँ इस मानसिकता से
जहां मेरी सोच को ही दायरों मे बंधा जाता हैं
जहां मेरे विस्तार पर मेरे चरित्र को आंका जाता हैं
जहां मुझ से तर्क मे ना जीतने पर
मेरे शरीर पर निशाना साधा जाता हैं
जहां मेरे हर काम को
नारीवादी का कह कर नकारा जाता हैं
इस आज़ादी कि मै हकदार हूँ
और ले कर रहूंगी
जितना चाहो , जो चाहो
तुम कर के देख लो
आज़ाद इस दुनिया मे आयी हूँ
आज़ाद ही रहूँगी
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Thursday, August 12, 2010
सावन
रुकी रुकी सी बारिशों के बोझ से दबी दबी
झुके झुके से बादलों से -
धरती की प्यास बुझी
घटाओं ने झूमकर , मुझसे कुछ कहा तो है
बूंदे मुझे छू गई -
तेरा ख्याल आ गया
मेघों ने बरसकर ,
तुझसे कुछ कहा है क्या -
बूंदों की रिमझिम में ,भीगा सावन आ गया
Happy Teej to all!!!
झुके झुके से बादलों से -
धरती की प्यास बुझी
घटाओं ने झूमकर , मुझसे कुछ कहा तो है
बूंदे मुझे छू गई -
तेरा ख्याल आ गया
मेघों ने बरसकर ,
तुझसे कुछ कहा है क्या -
बूंदों की रिमझिम में ,भीगा सावन आ गया
Happy Teej to all!!!
Wednesday, August 11, 2010
बदलाव !
सदियों से कैद हैं जो साँसें
अब ज्वाला उगलने लगी हैं.
धधकती दिलों में वो आसें
अब दावानल बनने लगी हैं.
कब तक घुटेंगी ये बेजुबां
अब बगावत भी करने लगी हैं.
वो शीशे की दर औ' दीवारें
अब खिलाफत से दरकने लगी हैं.
कहाँ तक बनेंगी वो मोहरा
अब चालें पलटने लगीं है.
अब होश में आओ ज़माने
जब सदियाँ बदलने लगीं हैं.
जीने दो उनको भी मर्जी से
अब तो दम निकलने लगी है.
कहाँ तक सिखाएं हम तुमको
अब वे इतिहास लिखने लगी हैं.
वही परदे से बाहर निकल कर
अब हुकूमत चलाने लगी है.
अब ज्वाला उगलने लगी हैं.
धधकती दिलों में वो आसें
अब दावानल बनने लगी हैं.
कब तक घुटेंगी ये बेजुबां
अब बगावत भी करने लगी हैं.
वो शीशे की दर औ' दीवारें
अब खिलाफत से दरकने लगी हैं.
कहाँ तक बनेंगी वो मोहरा
अब चालें पलटने लगीं है.
अब होश में आओ ज़माने
जब सदियाँ बदलने लगीं हैं.
जीने दो उनको भी मर्जी से
अब तो दम निकलने लगी है.
कहाँ तक सिखाएं हम तुमको
अब वे इतिहास लिखने लगी हैं.
वही परदे से बाहर निकल कर
अब हुकूमत चलाने लगी है.
Monday, August 9, 2010
ज़रूर आएगा
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित
अंदर-अंदर टूटन
अंतर में घुटन
और मुख पर मुस्कान,
खुशियाँ लुटाना
आदत-सी बन गई है!
इसी आशा में,
इसी प्रत्याशा में
कि शायद
वो एक दिन आएगा
ज़रूर आएगा,
जो नारी को
उसके अस्तित्व की
पहचान कराएगा,
आदर दिलाएगा
उसके अंतर की पीड़ा से
समाज तिलमिलाएगा!
और समाज के
सहृदय जन
एक दिन महसूस करेंगे
उसकी छटपटाहट को,
देंगे नारी को
उसकी पहचान,
देंगे उसे सम्मान
और जीने का अधिकार,
क्योंकि नारी
टूटकर भी
सदैव रही है संपूर्ण!
पक्का भरोसा है उसे
कि एक दिन आएगा,
ज़रूर आएगा
जब खोया हुआ अतीत
होगा उजागर!
इंतज़ार है उसे
उस दिन का
जो उसे न्याय दिलाएगा
देखते हैं,
कब आएगा
वह भाग्यशाली एक दिन!
डॉ.मीना अग्रवाल
अंदर-अंदर टूटन
अंतर में घुटन
और मुख पर मुस्कान,
खुशियाँ लुटाना
आदत-सी बन गई है!
इसी आशा में,
इसी प्रत्याशा में
कि शायद
वो एक दिन आएगा
ज़रूर आएगा,
जो नारी को
उसके अस्तित्व की
पहचान कराएगा,
आदर दिलाएगा
उसके अंतर की पीड़ा से
समाज तिलमिलाएगा!
और समाज के
सहृदय जन
एक दिन महसूस करेंगे
उसकी छटपटाहट को,
देंगे नारी को
उसकी पहचान,
देंगे उसे सम्मान
और जीने का अधिकार,
क्योंकि नारी
टूटकर भी
सदैव रही है संपूर्ण!
पक्का भरोसा है उसे
कि एक दिन आएगा,
ज़रूर आएगा
जब खोया हुआ अतीत
होगा उजागर!
इंतज़ार है उसे
उस दिन का
जो उसे न्याय दिलाएगा
देखते हैं,
कब आएगा
वह भाग्यशाली एक दिन!
डॉ.मीना अग्रवाल
Sunday, August 1, 2010
गांधारी की पीड़ा
क्यूँ नहीं कोई समझा मेरी पीड़ा
जब मैने आँख पर पट्टी बाँध कर
किया था विवाह एक अंधे से ।
पति प्रेम कह कर मेरे विद्रोह को
समाज ने इतिहास मे दर्ज किया ।
और सच कहूँ आज भी इस बात का
मुझे मलाल हैं कि ,
मेरी आँखों की पट्टी का इतिहास गवाह हैं
पर
ये सब भूल गए कि मैने
विद्रोह का पहला बिगुल बजाया था
बेमेल विवाह के विरोध मे ।
मेरी थी वो पहली आवाज
जिसको दबाया गया
और इतिहास मे , मुझे जो मै नहीं थी
वो मुझे दिखाया गया ।
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Friday, July 30, 2010
"मैं क्या चाहती हूं ?" शुक्रिया आशा जी इस कविता के लिये । आप प्रेरणा हैं हमारी पीढ़ी की .
लोग कहते हैं नयी लडकियां आजादी कि बात करती हैं और पता नहीं किस से आज़ादी चाहती हैं । कौन हैं नयी लड़कियों कि प्रेरणा । वो माँ जो आज उम्र के उस पढाव पर खड़ी हैं जहाँ उसको नानी / दादी कहते हैं । आशा मेम मे मैने वो प्रेरणा देखी हैं वो आग देखी हैं जो नयी लड़कियों मे आजाये तो समाज मे बदलाव आते देर नहीं लगेगी ।
आशा जी कि कविताओं मे मुझे वो सब दिखता हैं जो समाज को बदलने का आवाहन । शुक्रिया आशा जी इस कविता के लिये । आप प्रेरणा हैं हमारी पीढ़ी की . आशा जी के ब्लॉग का लिंक हैं
मुझे अपना ब्याह रचाना है ,
यह भली भांति जानती हूं ,
पर मैं कोई गाय नहीं कि ,
किसी भी खूंटे से बांधी जाऊं
ना ही कोई पक्षी हूं ,
जिसे पिंजरे में रखा जाए ,
मैं गूंगी गुड़िया भी नहीं ,
कि चाहे जिसे दे दिया जाए ,
मैं ऐसा सामान नहीं ,
कि बार बार प्रदर्शन हो ,
जिसे घरवालों ने देखा ,
वह मुझे पसंद नहीं आया ,
मैं क्या हूं क्या चाहती हूं ,
यह भी न कोई सोच पाया ,
ना ही कोई ब्यक्तित्व है ,
और ना ही बौद्धिकस्तर ,
ना ही भविष्य सुरक्षित उसका
फिर भी घमंड पुरुष होने का ,
अपना वर्चस्व चाहता है ,
जो उसके कहने में चले,
ऐसी पत्नी चाहता है ,
पर मैं यह सब नहीं चाहती ,
स्वायत्वता है अधिकार मेरा ,
जिसे खोना नहीं चाहती ,
जागृत होते हुए समाज में ,
कुछ योगदान करना चाहती हूं ,
उसमे परिवर्तन लाना चाहती हूं ,
वरमाला मैं तभी डालूंगी ,
यदि किसी को अपने योग्य पाऊँगी |
आशा
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
आशा जी कि कविताओं मे मुझे वो सब दिखता हैं जो समाज को बदलने का आवाहन । शुक्रिया आशा जी इस कविता के लिये । आप प्रेरणा हैं हमारी पीढ़ी की . आशा जी के ब्लॉग का लिंक हैं
मैं क्या चाहती हूं ?
मुझे अपना ब्याह रचाना है ,
यह भली भांति जानती हूं ,
पर मैं कोई गाय नहीं कि ,
किसी भी खूंटे से बांधी जाऊं
ना ही कोई पक्षी हूं ,
जिसे पिंजरे में रखा जाए ,
मैं गूंगी गुड़िया भी नहीं ,
कि चाहे जिसे दे दिया जाए ,
मैं ऐसा सामान नहीं ,
कि बार बार प्रदर्शन हो ,
जिसे घरवालों ने देखा ,
वह मुझे पसंद नहीं आया ,
मैं क्या हूं क्या चाहती हूं ,
यह भी न कोई सोच पाया ,
ना ही कोई ब्यक्तित्व है ,
और ना ही बौद्धिकस्तर ,
ना ही भविष्य सुरक्षित उसका
फिर भी घमंड पुरुष होने का ,
अपना वर्चस्व चाहता है ,
जो उसके कहने में चले,
ऐसी पत्नी चाहता है ,
पर मैं यह सब नहीं चाहती ,
स्वायत्वता है अधिकार मेरा ,
जिसे खोना नहीं चाहती ,
जागृत होते हुए समाज में ,
कुछ योगदान करना चाहती हूं ,
उसमे परिवर्तन लाना चाहती हूं ,
वरमाला मैं तभी डालूंगी ,
यदि किसी को अपने योग्य पाऊँगी |
आशा
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Thursday, July 22, 2010
अब तो जागो
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
कब तक तुम
अपने अस्तित्व को
पिता या भाई
पति या पुत्र
के साँचे में ढालने के लिये
काटती छाँटती
और तराशती रहोगी ?
तुम मोम की गुड़िया तो नहीं !
कब तक तुम
तुम्हारे अपने लिये
औरों के द्वारा लिये गए
फैसलों में
अपने मन की अनुगूँज को
सुनने की नाकाम कोशिश
करती रहोगी ?
तुम गूंगी तो नहीं !
कब तक तुम
औरों की आँखों में
अपने अधूरे सपनों की
परछाइयों को
साकार होता देखने की
असफल और व्यर्थ सी
कोशिश करती रहोगी ?
नींदों पर तुम्हारा भी हक है !
कब तक तुम
औरों के जीवन की
कड़वाहट को कम
करने के लिये
स्वयम् को पानी में घोल
शरबत की तरह
प्रस्तुत करती रहोगी ?
क्या तुम्हारे मन की
सारी कड़वाहट धुल चुकी है ?
तुम कोई शिव तो नहीं !
कब तक तुम
औरों के लिये
अपना खुद का वजूद मिटा
स्वयं को उत्सर्जित करती रहोगी ?
क्यों ऐसा है कि
तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं?
तुम्हारी कोई राय नहीं ?
तुम्हारा कोई निर्णय नहीं ?
तुम्हारा कोई सम्मान नहीं ?
तुम्हारा कोई अधिकार नहीं ?
तुम्हारा कोई हमदर्द नहीं ?
तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं ?
अब तो जागो
तुम कोई बेजान गुडिया नहीं
जीती जागती हाड़ माँस की
ईश्वर की बनायी हुई
तुम भी एक रचना हो
इस जीवन को जीने का
तुम्हें भी पूरा हक है !
उसे ढोने की जगह
सच्चे अर्थों में जियो !
अब तो जागो
नयी सुबह तुम्हें अपने
आगोश में समेटने के लिये
बाँहे फैलाए खड़ी है !
दैहिक आँखों के साथ-साथ
अपने मन की आँखें भी खोलो !
तुम्हें दिखाई देगा कि
जीवन कितना सुन्दर है !
साधना वैद
कब तक तुम
अपने अस्तित्व को
पिता या भाई
पति या पुत्र
के साँचे में ढालने के लिये
काटती छाँटती
और तराशती रहोगी ?
तुम मोम की गुड़िया तो नहीं !
कब तक तुम
तुम्हारे अपने लिये
औरों के द्वारा लिये गए
फैसलों में
अपने मन की अनुगूँज को
सुनने की नाकाम कोशिश
करती रहोगी ?
तुम गूंगी तो नहीं !
कब तक तुम
औरों की आँखों में
अपने अधूरे सपनों की
परछाइयों को
साकार होता देखने की
असफल और व्यर्थ सी
कोशिश करती रहोगी ?
नींदों पर तुम्हारा भी हक है !
कब तक तुम
औरों के जीवन की
कड़वाहट को कम
करने के लिये
स्वयम् को पानी में घोल
शरबत की तरह
प्रस्तुत करती रहोगी ?
क्या तुम्हारे मन की
सारी कड़वाहट धुल चुकी है ?
तुम कोई शिव तो नहीं !
कब तक तुम
औरों के लिये
अपना खुद का वजूद मिटा
स्वयं को उत्सर्जित करती रहोगी ?
क्यों ऐसा है कि
तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं?
तुम्हारी कोई राय नहीं ?
तुम्हारा कोई निर्णय नहीं ?
तुम्हारा कोई सम्मान नहीं ?
तुम्हारा कोई अधिकार नहीं ?
तुम्हारा कोई हमदर्द नहीं ?
तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं ?
अब तो जागो
तुम कोई बेजान गुडिया नहीं
जीती जागती हाड़ माँस की
ईश्वर की बनायी हुई
तुम भी एक रचना हो
इस जीवन को जीने का
तुम्हें भी पूरा हक है !
उसे ढोने की जगह
सच्चे अर्थों में जियो !
अब तो जागो
नयी सुबह तुम्हें अपने
आगोश में समेटने के लिये
बाँहे फैलाए खड़ी है !
दैहिक आँखों के साथ-साथ
अपने मन की आँखें भी खोलो !
तुम्हें दिखाई देगा कि
जीवन कितना सुन्दर है !
साधना वैद
Wednesday, July 21, 2010
नन्ही परी
नन्ही परी
देख तेरे आंगन आई नन्ही परी
हर तरफ से देखो
वह प्रेम से भरी,
सुनकर उसकी कोयल सी आवाज
चला आये तू उस आगाज़
जहां वह खेल रही
देख तेरे अँागन आई नन्ही परी,
वह ले जाती तुझे
किसी और लोक में
जब होती वह
तेरी कोख में
तेज आवाज सुन
वह दुनिया से डरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी,
रौनक वह आँचल
में लेकर आई,
पास है उसके
चंचलता की झांई
जिसके छूकर
तू हो गई हरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी ..... रुचि राजपुरोहित 'तितली'
देख तेरे आंगन आई नन्ही परी
हर तरफ से देखो
वह प्रेम से भरी,
सुनकर उसकी कोयल सी आवाज
चला आये तू उस आगाज़
जहां वह खेल रही
देख तेरे अँागन आई नन्ही परी,
वह ले जाती तुझे
किसी और लोक में
जब होती वह
तेरी कोख में
तेज आवाज सुन
वह दुनिया से डरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी,
रौनक वह आँचल
में लेकर आई,
पास है उसके
चंचलता की झांई
जिसके छूकर
तू हो गई हरी
देख तेरे आँगन
आई नन्ही परी ..... रुचि राजपुरोहित 'तितली'
Friday, July 2, 2010
शुभकामना
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
मैंने तुम्हारे लिए
एक खिड़की खोल दी है
ताकि तुम
स्वच्छंद हवा में,
अनंत आकाश में,
अपने नयनों में भरपूर उजाला भर कर ,
अपने पंखों को नयी ऊर्जा से सक्षम बना कर
क्षितिज के उस पार
इतनी ऊँची उड़ान भर सको
कि सारा विश्व तुम्हें देखता ही रह जाए !
मैंने तुम्हारे लिए
बर्फ की एक नन्हीं सी शिला पिघला दी है
ताकि तुम पहाड़ी ढलानों पर
अपना मार्ग स्वयम् बनाती हुई
पहले दरिया तक पहुँच जाओ
तदुपरांत उसके अनंत प्रवाह में मिल
सागर की अथाह गहराइयों में
अपने स्वत्व को समाहित कर
उससे एकाकार हो जाओ
और उसके उस अबूझे रहस्य का हिस्सा बन जाओ
जिसे सुलझाने में
सारा संसार सदियों से लगा हुआ है !
मैंने तुम्हारे लिए
तुम्हारे घर आँगन की क्यारी में
सौरभयुक्त सुमनों के कुछ बीज बो दिये हैं
ताकि तुम उनमें नियम से खाद पानी डाल
उन्हें सींचती रहो
और समय पाकर तुम्हारे उपवन में उगे
सुन्दर, सुकुमार, सुगन्धित सुमनों के सौरभ से
सारा वातावरण गमक उठे
और उस दिव्य सौरभ की सुगंध से
तुम अपने काव्य को भी महका सको
जिसे पढ़ कर सदियों तक लोग
मंत्रमुग्ध एवं मोहाविष्ट हो बैठे रह जाएँ !
मैंने तुम्हारे लिए
मन की वीणा के तारों को
एक बार फिर झंकृत कर दिया है
ताकि तुम उस वीणा के उर में बसे
अमर संगीत को
अपनी सुर साधना से जागृत कर सको
और दिग्दिगंत में ऐसी मधुर स्वर लहरी को
विस्तीर्ण कर सको
कि सारी सृष्टि उसके सम्मोहन में डूब जाए
और तुम उस दिव्य संगीत के सहारे
सातों सागर और सातों आसमानों को पार कर
सम्पूर्ण बृह्मांड पर अपने हस्ताक्षर चस्पाँ कर सको !
तथास्तु !
साधना वैद
मैंने तुम्हारे लिए
एक खिड़की खोल दी है
ताकि तुम
स्वच्छंद हवा में,
अनंत आकाश में,
अपने नयनों में भरपूर उजाला भर कर ,
अपने पंखों को नयी ऊर्जा से सक्षम बना कर
क्षितिज के उस पार
इतनी ऊँची उड़ान भर सको
कि सारा विश्व तुम्हें देखता ही रह जाए !
मैंने तुम्हारे लिए
बर्फ की एक नन्हीं सी शिला पिघला दी है
ताकि तुम पहाड़ी ढलानों पर
अपना मार्ग स्वयम् बनाती हुई
पहले दरिया तक पहुँच जाओ
तदुपरांत उसके अनंत प्रवाह में मिल
सागर की अथाह गहराइयों में
अपने स्वत्व को समाहित कर
उससे एकाकार हो जाओ
और उसके उस अबूझे रहस्य का हिस्सा बन जाओ
जिसे सुलझाने में
सारा संसार सदियों से लगा हुआ है !
मैंने तुम्हारे लिए
तुम्हारे घर आँगन की क्यारी में
सौरभयुक्त सुमनों के कुछ बीज बो दिये हैं
ताकि तुम उनमें नियम से खाद पानी डाल
उन्हें सींचती रहो
और समय पाकर तुम्हारे उपवन में उगे
सुन्दर, सुकुमार, सुगन्धित सुमनों के सौरभ से
सारा वातावरण गमक उठे
और उस दिव्य सौरभ की सुगंध से
तुम अपने काव्य को भी महका सको
जिसे पढ़ कर सदियों तक लोग
मंत्रमुग्ध एवं मोहाविष्ट हो बैठे रह जाएँ !
मैंने तुम्हारे लिए
मन की वीणा के तारों को
एक बार फिर झंकृत कर दिया है
ताकि तुम उस वीणा के उर में बसे
अमर संगीत को
अपनी सुर साधना से जागृत कर सको
और दिग्दिगंत में ऐसी मधुर स्वर लहरी को
विस्तीर्ण कर सको
कि सारी सृष्टि उसके सम्मोहन में डूब जाए
और तुम उस दिव्य संगीत के सहारे
सातों सागर और सातों आसमानों को पार कर
सम्पूर्ण बृह्मांड पर अपने हस्ताक्षर चस्पाँ कर सको !
तथास्तु !
साधना वैद
Wednesday, June 30, 2010
हाँ मैं नारी हूँ !
सदियों से इस जगत में
पुनीता , पूजिता औ' तिरस्कृता
बनी और सब शिरोधार्य किया
कभी उन्हें दी सीख
औ' कभी मौत भी टारी हूँ ,
हाँ मैं नारी हूँ.
सदियाँ गुजरी ,
बहुरूप मिले
विदुषी भी बनी
औ बनी नगरवधू
धैर्य कभी न हारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
वनकन्या सी रही कभी,
कभी बंद कर दिया मुझे
सांस चले बस इतना सा
जीने को खुला था मुख मेरा
जीवित थी फिर भी
सौ उन पर मैं भारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
जीने की ललक मुझ में भी थी
जीवन मेरा सब जैसा था,
जुबान मेरे मुख में भी थी
पर बेजुबान बना दिया मुझे
बस उस वक्त की मारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
आज चली हूँ मर्जी से
आधी दुनिया में तूफान मचा
कैसे नकेल डालें इसको
जुगत कुछ ऐसी खोज रहे
कहीं बगावत बनी मौत
औ कहीं जीती मैं पारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
अब छोडो मुझे
जीने भी दो
तुम सा जीवन मेरा भी है
अपने अपने घर में झांको
मैं ही दुनियाँ सारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
पुनीता , पूजिता औ' तिरस्कृता
बनी और सब शिरोधार्य किया
कभी उन्हें दी सीख
औ' कभी मौत भी टारी हूँ ,
हाँ मैं नारी हूँ.
सदियाँ गुजरी ,
बहुरूप मिले
विदुषी भी बनी
औ बनी नगरवधू
धैर्य कभी न हारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
वनकन्या सी रही कभी,
कभी बंद कर दिया मुझे
सांस चले बस इतना सा
जीने को खुला था मुख मेरा
जीवित थी फिर भी
सौ उन पर मैं भारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
जीने की ललक मुझ में भी थी
जीवन मेरा सब जैसा था,
जुबान मेरे मुख में भी थी
पर बेजुबान बना दिया मुझे
बस उस वक्त की मारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
आज चली हूँ मर्जी से
आधी दुनिया में तूफान मचा
कैसे नकेल डालें इसको
जुगत कुछ ऐसी खोज रहे
कहीं बगावत बनी मौत
औ कहीं जीती मैं पारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
अब छोडो मुझे
जीने भी दो
तुम सा जीवन मेरा भी है
अपने अपने घर में झांको
मैं ही दुनियाँ सारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
Wednesday, June 23, 2010
भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं
पहले हमारी बेटी बनकर वो
नाम पाती थी
पहले हमारी पत्नी बनकर वो
नाम पाती थी
पहले हमारी माँ बन कर वो
नाम पाती थी
अब वो अपना नाम खुद बनाती हैं
हमारे नाम के बिना भी
जीना चाहती हैं
अब इसको भटकाव ना कहे तो
क्या कहे ??
वो समानता की बात करती हैं
वो बदलाव की बात करती हैं
वो निज अस्तित्व की बात करती हैं
ये सब भटकाव नहीं तो और क्या हैं
भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं
पहले हमारी बेटी बनकर वो
नाम पाती थी
पहले हमारी पत्नी बनकर वो
नाम पाती थी
पहले हमारी माँ बन कर वो
नाम पाती थी
अब वो अपना नाम खुद बनाती हैं
हमारे नाम के बिना भी
जीना चाहती हैं
अब इसको भटकाव ना कहे तो
क्या कहे ??
वो समानता की बात करती हैं
वो बदलाव की बात करती हैं
वो निज अस्तित्व की बात करती हैं
ये सब भटकाव नहीं तो और क्या हैं
भारतीये नारी पथ भटक गयी हैं
देवी हम उसको मानते थे
इंसान वो बनगई हैं
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Friday, June 18, 2010
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ------ सुभद्राकुमारी चौहान
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़
महाराष्टर कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में
ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबाई झांसी में
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छायी झांसी में
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छायी
किंतु कालगति चुपके चुपके काली घटा घेर लायी
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भायी
रानी विधवा हुई, हाय विधि को भी नहीं दया आयी
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक समानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हर्षाया
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झांसी हुई बिरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट फिरंगी की माया
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों बात
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात
उदैपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी रोयीं रनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
बहिन छबीली ने रण चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी
यह स्वतंत्रता की चिन्गारी अंतरतम से आई थी
झांसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी बढ़ी कालपी आयी, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खायी रानी से हार
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी गयी सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुष नहीं अवतारी थी
हमको जीवित करने आयी, बन स्वतंत्रता नारी थी
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी
यह तेरा बलिदान जगायेगा स्वतंत्रता अविनाशी
होये चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झांसी
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
सुभद्राकुमारी चौहान
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़
महाराष्टर कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में
ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबाई झांसी में
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छायी झांसी में
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छायी
किंतु कालगति चुपके चुपके काली घटा घेर लायी
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भायी
रानी विधवा हुई, हाय विधि को भी नहीं दया आयी
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक समानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हर्षाया
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झांसी हुई बिरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट फिरंगी की माया
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों बात
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात
उदैपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी रोयीं रनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
बहिन छबीली ने रण चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी
यह स्वतंत्रता की चिन्गारी अंतरतम से आई थी
झांसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी बढ़ी कालपी आयी, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खायी रानी से हार
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
रानी गयी सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुष नहीं अवतारी थी
हमको जीवित करने आयी, बन स्वतंत्रता नारी थी
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी
यह तेरा बलिदान जगायेगा स्वतंत्रता अविनाशी
होये चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झांसी
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
सुभद्राकुमारी चौहान
Wednesday, June 2, 2010
ऐसा क्यों होता है !
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
ऐसा क्यों होता है
जब भी कोई शब्द
तुम्हारे मुख से मुखरित होते हैं
उनका रंग रूप, अर्थ आकार,
भाव पभाव सभी बदल जाते हैं
और वे साधारण से शब्द भी
चाबुक से लगते हैं,
तथा मेरे मन व आत्मा सभी को
लहूलुहान कर जाते है !
ऐसा क्यों होता है
जब भी कोई वक्तव्य
तुम्हारे मुख से ध्वनित होता है
तुम्हारी आवाज़ के आरोह अवरोह,
उतार चढ़ाव, सुर लय ताल
सब उसमें सन्निहित उसकी
सद्भावना को कुचल देते है
और साधारण सी बात भी
पैनी और धारदार बन
उपालंभ और उलाहने सी
लगने लगती है
और मेरे सारे उत्साह सारी खुशी को
पाला मार जाता है !
ऐसा क्यों होता है
तुमसे बहुत कुछ कहने की,
बहुत कुछ बाँटने की आस लिये
मैं तुम्हारे मन के द्वार पर
दस्तक देने जब आती हूँ तो
‘प्रवेश निषिद्ध’ का बोर्ड लटका देख
हताश ही लौट जाती हूँ
और भावनाओं का वह सैलाब
जो मेरे ह्रदय के तटबंधों को तोड़ कर
बाहर निकलने को आतुर होता है
अंदर ही अंदर सूख कर
कहीं बिला जाता है !
और हम नदी के दो
अलग अलग किनारों पर
बहुत दूर निशब्द, मौन,
बिना किसी प्रयत्न के
सदियों से स्थापित
प्रस्तर प्रतिमाओं की तरह
कहीं न कहीं इसे स्वीकार कर
संवादहीन खड़े रहते हैं
क्योंकि शायद यही हमारी नियति है !
साधना वैद
ऐसा क्यों होता है
जब भी कोई शब्द
तुम्हारे मुख से मुखरित होते हैं
उनका रंग रूप, अर्थ आकार,
भाव पभाव सभी बदल जाते हैं
और वे साधारण से शब्द भी
चाबुक से लगते हैं,
तथा मेरे मन व आत्मा सभी को
लहूलुहान कर जाते है !
ऐसा क्यों होता है
जब भी कोई वक्तव्य
तुम्हारे मुख से ध्वनित होता है
तुम्हारी आवाज़ के आरोह अवरोह,
उतार चढ़ाव, सुर लय ताल
सब उसमें सन्निहित उसकी
सद्भावना को कुचल देते है
और साधारण सी बात भी
पैनी और धारदार बन
उपालंभ और उलाहने सी
लगने लगती है
और मेरे सारे उत्साह सारी खुशी को
पाला मार जाता है !
ऐसा क्यों होता है
तुमसे बहुत कुछ कहने की,
बहुत कुछ बाँटने की आस लिये
मैं तुम्हारे मन के द्वार पर
दस्तक देने जब आती हूँ तो
‘प्रवेश निषिद्ध’ का बोर्ड लटका देख
हताश ही लौट जाती हूँ
और भावनाओं का वह सैलाब
जो मेरे ह्रदय के तटबंधों को तोड़ कर
बाहर निकलने को आतुर होता है
अंदर ही अंदर सूख कर
कहीं बिला जाता है !
और हम नदी के दो
अलग अलग किनारों पर
बहुत दूर निशब्द, मौन,
बिना किसी प्रयत्न के
सदियों से स्थापित
प्रस्तर प्रतिमाओं की तरह
कहीं न कहीं इसे स्वीकार कर
संवादहीन खड़े रहते हैं
क्योंकि शायद यही हमारी नियति है !
साधना वैद
Saturday, May 29, 2010
धनिया का सपना
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
धनिया लेटी है अपनी खाट पर
देख रही है सुंदर सपना
सोच रही है इस दुनिया में
कोई तो होगा अपना,
वो खुश है आज, बहुत खुश
क्योंकि कुछ ही महीनों के बाद
वो बनने वाली है माँ
उसके मन में
माँ बनने की उमंग है
दिल में ममता की तरंग है,
सोच रही है
मेरे जैसी होगी मेरी बेटी
जो घूमेगी घर के आँगन में
रुनझुन-रुनझुन,
जो बोलेगी
अपनी तोतली बोली में
और कहेगी ‘माँ जला छुन
जब मेली छादी होदी न
सुंदल-सा दूल्हा आएदा
मैं दोली में बैठतल
अपनी छुछराल चली जाऊँदी !
पर माँ लोना नईं
जब तू बुलाएगी ना
मैं झत से दौलतल
तेरे पास चली आऊँगी
या फिल तुझे बुला लूँदी अपने पाछ !’
धनिया खुश थी मन ही मन
उसके दिल में
प्रसन्नता की हिलोरें उठ रही थीं
उसने पहले ही सोच लिया था
कि अपनी चाँद-सी बेटी को
पढ़ना सिखाऊँगी,
लिखना सिखाऊँगी
और उससे खत लिखवाऊँगी,
फिर मैं अपने मन की बात को
अपनी अम्मा और बापू तक
पहुँचा सकूँगी !
इन्हीं विचारों में उलझी
धनिया बड़ी बेसब्री से
सुबह होने का
कर रही थी इंतज़ार
सोच रही थी बारंबार
कल जब अल्ट्रासाउंड की
रिपोर्ट आएगी घर पर
तो खुश होंगे
मेरे साथ-साथ सभी परिवारी-जन
करेंगे इंतज़ार
नन्ही-सी परी के आने का !
पास-पड़ौस के सभी लोग
देने आएँगे बधाई
मेरे माँ-बापू भी मनाएँगे उत्सव
गाए जाएँगे मंगलगीत
मिलेगी मुझे सबकी प्रीत !
अपनी परी का नाम
रखूँगी चमेली जो बड़ी होकर बनेगी
अनोखी, अलबेली
रक्षाबंधन के दिन
भैया की सूनी कलाई पर
बाँधेगी राखी
भैया भी उसको
देगा रक्षा का वचन !
मेरे सपनों की परी
जब और बड़ी होगी
तो घर के कामों में
बटाएगी मेरा हाथ
मेरे थकने पर प्यार से
मेरा सिर सहलाएगी,
अपने दादी-बाबा की
वो बनेगी लाडली
घर में बनेगी सबकी दुलारी
दोपहर को खेत पर
अपने बापू के लिए
लेकर जाएगी रोटी
तब मेरे बुझे मन को
और थके तन को
मिलेगा थोड़ा-सा आराम
मुझे मिलेगा मेरा खोया हुआ
अपना ही सुंदर नाम !
यही सोचते-सोचते धनिया
न जाने कब सो गई
मीठे-मीठे सपनों में खो गई
मुँह अँधेरे ही वो उठकर बैठ गई
जब उठी तो थी बहुत
उल्लसित और प्रफुल्लित,
जल्दी-जल्दी कर रही थी
घर के सारे काम
कामों से निपटकर
वह बैठी ही थी
कि अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट लेकर
उसका पति मुँह लटकाए आया
समझ नहीं आ रहा था
उसकी उदासी का राज़
पूछने पर उसने बताया
‘रिपोर्ट नहीं है अच्छी’
सभी थे चिंतामग्न
सभी थे परेशान
अनहोनी की आशंका से
सब तरफ थी खामोशी ,चुप्पी
और सभी कर रहे थे इंतज़ार
रिपोर्ट को जानने का !
छाई हुई खामोशी को तोड़ते हुए
धनिया का पति बोला ¬–
‘ रिपोर्ट में तो लड़की बताई है ‘
घर के सभी सदस्यों ने
ठंडी साँस ली और बोले-
‘ इसमें चिंता की क्या बात है
अब तो हमारे देश ने
बड़ी उन्नति कर ली है ‘
घर के बुजुर्ग बोले-
‘ चिंता मतकर
डॉक्टर से मिलकर
इस आफत से मुक्ति पा लेंगे
इस बार नहीं
तो कोई बात नहीं
अगली बार
घर का चिराग पा लेंगे !’
पर किसी ने
उस माँ के दिल की पीड़ा को
न समझा, न जाना
न उसकी मन:स्थिति को पहचाना !
वह बुझी-सी, टूटी-सी
उठकर चली गई अंदर
और बहाती रही आँसू
वह अपने मन की टीस को
किसी से बाँट भी तो नहीं सकती
अपने मन की बात
किसी से कह भी तो नहीं सकती
कहेगी तो सुनेगा कौन
इसीलिए तो वो है मौन !
धनिया की आँखें निरंतर
बरस रही थीं झर-झर
मानो कह रही हों, सुनो,
समाज के कर्णधारो ! सुनो
समाज के सुधारको सुनो,
बेटों के चाहको सुनो न !
मेरा तो बस यही है कहना
ऐसे सोच को समाज के
दिलो-दिमाग से पूरी तरह
निकालकर फेंक दो न !
और उन सबको समझाओ
जो बेटी नहीं, चाहते हैं बेटा !
यदि देश में इसी तरह
सताई जाती रहेंगी बेटियाँ
होती होती रहेंगी भ्रूण हत्याएँ
तो एकदिन ऐसा आएगा
जब हमारे चारों ओर
होंगे केवल बेटे-ही-बेटे
दु:ख-दर्द को मिटाने वाली
बेटियाँ कहीं दूर तक
नज़र नहीं आएँगीं,
और एकदिन ऐसा आएगा
जब पुरुष रह जाएगा अकेला
अच्छा नहीं लगेगा
उसे दुनिया का मेला,
और फिर वह अकेले ही अकेले
ढोएगा जीवन का ठेला !
डॉ. मीना अग्रवाल
धनिया लेटी है अपनी खाट पर
देख रही है सुंदर सपना
सोच रही है इस दुनिया में
कोई तो होगा अपना,
वो खुश है आज, बहुत खुश
क्योंकि कुछ ही महीनों के बाद
वो बनने वाली है माँ
उसके मन में
माँ बनने की उमंग है
दिल में ममता की तरंग है,
सोच रही है
मेरे जैसी होगी मेरी बेटी
जो घूमेगी घर के आँगन में
रुनझुन-रुनझुन,
जो बोलेगी
अपनी तोतली बोली में
और कहेगी ‘माँ जला छुन
जब मेली छादी होदी न
सुंदल-सा दूल्हा आएदा
मैं दोली में बैठतल
अपनी छुछराल चली जाऊँदी !
पर माँ लोना नईं
जब तू बुलाएगी ना
मैं झत से दौलतल
तेरे पास चली आऊँगी
या फिल तुझे बुला लूँदी अपने पाछ !’
धनिया खुश थी मन ही मन
उसके दिल में
प्रसन्नता की हिलोरें उठ रही थीं
उसने पहले ही सोच लिया था
कि अपनी चाँद-सी बेटी को
पढ़ना सिखाऊँगी,
लिखना सिखाऊँगी
और उससे खत लिखवाऊँगी,
फिर मैं अपने मन की बात को
अपनी अम्मा और बापू तक
पहुँचा सकूँगी !
इन्हीं विचारों में उलझी
धनिया बड़ी बेसब्री से
सुबह होने का
कर रही थी इंतज़ार
सोच रही थी बारंबार
कल जब अल्ट्रासाउंड की
रिपोर्ट आएगी घर पर
तो खुश होंगे
मेरे साथ-साथ सभी परिवारी-जन
करेंगे इंतज़ार
नन्ही-सी परी के आने का !
पास-पड़ौस के सभी लोग
देने आएँगे बधाई
मेरे माँ-बापू भी मनाएँगे उत्सव
गाए जाएँगे मंगलगीत
मिलेगी मुझे सबकी प्रीत !
अपनी परी का नाम
रखूँगी चमेली जो बड़ी होकर बनेगी
अनोखी, अलबेली
रक्षाबंधन के दिन
भैया की सूनी कलाई पर
बाँधेगी राखी
भैया भी उसको
देगा रक्षा का वचन !
मेरे सपनों की परी
जब और बड़ी होगी
तो घर के कामों में
बटाएगी मेरा हाथ
मेरे थकने पर प्यार से
मेरा सिर सहलाएगी,
अपने दादी-बाबा की
वो बनेगी लाडली
घर में बनेगी सबकी दुलारी
दोपहर को खेत पर
अपने बापू के लिए
लेकर जाएगी रोटी
तब मेरे बुझे मन को
और थके तन को
मिलेगा थोड़ा-सा आराम
मुझे मिलेगा मेरा खोया हुआ
अपना ही सुंदर नाम !
यही सोचते-सोचते धनिया
न जाने कब सो गई
मीठे-मीठे सपनों में खो गई
मुँह अँधेरे ही वो उठकर बैठ गई
जब उठी तो थी बहुत
उल्लसित और प्रफुल्लित,
जल्दी-जल्दी कर रही थी
घर के सारे काम
कामों से निपटकर
वह बैठी ही थी
कि अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट लेकर
उसका पति मुँह लटकाए आया
समझ नहीं आ रहा था
उसकी उदासी का राज़
पूछने पर उसने बताया
‘रिपोर्ट नहीं है अच्छी’
सभी थे चिंतामग्न
सभी थे परेशान
अनहोनी की आशंका से
सब तरफ थी खामोशी ,चुप्पी
और सभी कर रहे थे इंतज़ार
रिपोर्ट को जानने का !
छाई हुई खामोशी को तोड़ते हुए
धनिया का पति बोला ¬–
‘ रिपोर्ट में तो लड़की बताई है ‘
घर के सभी सदस्यों ने
ठंडी साँस ली और बोले-
‘ इसमें चिंता की क्या बात है
अब तो हमारे देश ने
बड़ी उन्नति कर ली है ‘
घर के बुजुर्ग बोले-
‘ चिंता मतकर
डॉक्टर से मिलकर
इस आफत से मुक्ति पा लेंगे
इस बार नहीं
तो कोई बात नहीं
अगली बार
घर का चिराग पा लेंगे !’
पर किसी ने
उस माँ के दिल की पीड़ा को
न समझा, न जाना
न उसकी मन:स्थिति को पहचाना !
वह बुझी-सी, टूटी-सी
उठकर चली गई अंदर
और बहाती रही आँसू
वह अपने मन की टीस को
किसी से बाँट भी तो नहीं सकती
अपने मन की बात
किसी से कह भी तो नहीं सकती
कहेगी तो सुनेगा कौन
इसीलिए तो वो है मौन !
धनिया की आँखें निरंतर
बरस रही थीं झर-झर
मानो कह रही हों, सुनो,
समाज के कर्णधारो ! सुनो
समाज के सुधारको सुनो,
बेटों के चाहको सुनो न !
मेरा तो बस यही है कहना
ऐसे सोच को समाज के
दिलो-दिमाग से पूरी तरह
निकालकर फेंक दो न !
और उन सबको समझाओ
जो बेटी नहीं, चाहते हैं बेटा !
यदि देश में इसी तरह
सताई जाती रहेंगी बेटियाँ
होती होती रहेंगी भ्रूण हत्याएँ
तो एकदिन ऐसा आएगा
जब हमारे चारों ओर
होंगे केवल बेटे-ही-बेटे
दु:ख-दर्द को मिटाने वाली
बेटियाँ कहीं दूर तक
नज़र नहीं आएँगीं,
और एकदिन ऐसा आएगा
जब पुरुष रह जाएगा अकेला
अच्छा नहीं लगेगा
उसे दुनिया का मेला,
और फिर वह अकेले ही अकेले
ढोएगा जीवन का ठेला !
डॉ. मीना अग्रवाल
Friday, May 21, 2010
मेरा होना या न होना
आज पढिये मुक्ति कि कविता
मेरा होना या न होना
मैं तभी भली थी
जब नहीं था मालूम मुझे
कि मेरे होने से
कुछ फर्क पड़ता है दुनिया को
कि मेरा होना, नहीं है
सिर्फ औरों के लिए
अपने लिए भी है.
मैं जी रही थी
अपने कड़वे अतीत,
कुछ सुन्दर यादों,
कुछ लिजलिजे अनुभवों के साथ
चल रही थी
सदियों से मेरे लिए बनायी गयी राह पर
बस चल रही थी ...
रास्ते में मिले कुछ अपने जैसे लोग
पढ़ने को मिलीं कुछ किताबें
कुछ बहसें , कुछ तर्क-वितर्क
और अचानक ...
अपने होने का एहसास हुआ
अब ...
मैं परेशान हूँ
हर उस बात से जो
मेरे होने की राह में रुकावट है...
हर वो औरत परेशान है
जो जान चुकी है कि वो है
पर, नहीं हो पा रही है अपनी सी
हर वो किताब ...
हर वो विचार ...
हर वो तर्क ...
दोषी है उन औरतों का
जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
कि उन्हें होना कुछ और था
और... कुछ और बना दिया गया ..
जब नहीं था मालूम मुझे
कि मेरे होने से
कुछ फर्क पड़ता है दुनिया को
कि मेरा होना, नहीं है
सिर्फ औरों के लिए
अपने लिए भी है.
मैं जी रही थी
अपने कड़वे अतीत,
कुछ सुन्दर यादों,
कुछ लिजलिजे अनुभवों के साथ
चल रही थी
सदियों से मेरे लिए बनायी गयी राह पर
बस चल रही थी ...
रास्ते में मिले कुछ अपने जैसे लोग
पढ़ने को मिलीं कुछ किताबें
कुछ बहसें , कुछ तर्क-वितर्क
और अचानक ...
अपने होने का एहसास हुआ
अब ...
मैं परेशान हूँ
हर उस बात से जो
मेरे होने की राह में रुकावट है...
हर वो औरत परेशान है
जो जान चुकी है कि वो है
पर, नहीं हो पा रही है अपनी सी
हर वो किताब ...
हर वो विचार ...
हर वो तर्क ...
दोषी है उन औरतों का
जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
कि उन्हें होना कुछ और था
और... कुछ और बना दिया गया ..
Tuesday, May 18, 2010
मन बाबरे
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
आज मन ने
मेरी बात मानी है
आज समझा है वह,
नहीं गँवाएगा समय
व्यर्थ की बातें सोचने में,
जीवन में ऐसा तो
चलता ही रहता है
मतभेद, विवाद,
अतिवाद, या फिर....
यही तो है जीवन !
अब मुझे विगत बातों को
कभी नहीं सोचना
कुछ करना है ऐसा
जो समाज में
बने मिसाल,
बने नई पहचान !
इसलिए मन बावरे
तू आज मेरी बात को
ध्यान से सुन
और गुन
मत हो परेशान
बनाकर रख
अपना सम्मान !
यह तू जान ले
कि जो डरता है
दूसरों की ताकत से
वही डराता भी है दूसरों को !
इसलिए तू डर मत
निर्भय होकर
आगे बढ़
ऊँचाइयाँ चढ़
अनुभव की झालर में
नव जीवन गढ़ !
डॉ. मीना अग्रवाल
आज मन ने
मेरी बात मानी है
आज समझा है वह,
नहीं गँवाएगा समय
व्यर्थ की बातें सोचने में,
जीवन में ऐसा तो
चलता ही रहता है
मतभेद, विवाद,
अतिवाद, या फिर....
यही तो है जीवन !
अब मुझे विगत बातों को
कभी नहीं सोचना
कुछ करना है ऐसा
जो समाज में
बने मिसाल,
बने नई पहचान !
इसलिए मन बावरे
तू आज मेरी बात को
ध्यान से सुन
और गुन
मत हो परेशान
बनाकर रख
अपना सम्मान !
यह तू जान ले
कि जो डरता है
दूसरों की ताकत से
वही डराता भी है दूसरों को !
इसलिए तू डर मत
निर्भय होकर
आगे बढ़
ऊँचाइयाँ चढ़
अनुभव की झालर में
नव जीवन गढ़ !
डॉ. मीना अग्रवाल
Sunday, May 16, 2010
मौन
मेरे मौन को तुम मत कुरेदो !
यह मौन जिसे मैंने धारण किया है
दरअसल मेरा कम और
तुम्हारा ही रक्षा कवच अधिक है !
इसे ऐसे ही अछूता रहने दो
वरना जिस दिन भी
इस अभेद्य कवच को
तुम बेधना चाहोगे
मेरे मन की प्रत्यंचा से
छूटने को आतुर
उलाहनों उपालम्भों
आरोपों प्रत्यारोपों के
तीक्ष्ण बाणों की बौछार
तुम सह नहीं पाओगे !
मेरे मौन के इस परदे को
ऐसे ही पड़ा रहने दो
दरअसल यह पर्दा
मेरी बदसूरती के
अप्रिय प्रसंगों से कहीं अधिक
तुम्हारी मानसिक विपन्नता की
उन बदरंग तस्वीरों को छुपाता है
जो अगर उजागर हो गयीं
तो तुम्हारी कलई खुल जायेगी
और तुम उसे भी कहाँ
बर्दाश्त कर पाओगे !
मेरे मौन के इस उद्दाम आवेग को
मेरे मन की इस
छिद्रविहीन सुदृढ़ थैली में
इसी तरह निरुद्ध रहने दो
वगरना जिस भी किसी दिन
इसका मुँह खुल जाएगा
मेरे आँसुओं की प्रगल्भ,
निर्बाध, तूफानी बाढ़
मर्यादा के सारे तट बंधों को
तोड़ती बह निकलेगी
और उसके साथ तुम्हारे
भूत भविष्य वर्त्तमान
सब बह जायेंगे और
शेष रह जाएगा
विध्वंस की कथा सुनाता
एक विप्लवकारी सन्नाटा
जो समय की धरा पर
ऐसे बदसूरत निशाँ छोड़ जाएगा
जिन्हें किसी भी अमृत वृष्टि से
धोया नहीं जा सकेगा !
इसीलिये कहती हूँ
मेरा यह मौन
मेरा कम और तुम्हारा
रक्षा कवच अधिक है
इसे तुम ना कुरेदो
तो ही अच्छा है !
साधना वैद
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
यह मौन जिसे मैंने धारण किया है
दरअसल मेरा कम और
तुम्हारा ही रक्षा कवच अधिक है !
इसे ऐसे ही अछूता रहने दो
वरना जिस दिन भी
इस अभेद्य कवच को
तुम बेधना चाहोगे
मेरे मन की प्रत्यंचा से
छूटने को आतुर
उलाहनों उपालम्भों
आरोपों प्रत्यारोपों के
तीक्ष्ण बाणों की बौछार
तुम सह नहीं पाओगे !
मेरे मौन के इस परदे को
ऐसे ही पड़ा रहने दो
दरअसल यह पर्दा
मेरी बदसूरती के
अप्रिय प्रसंगों से कहीं अधिक
तुम्हारी मानसिक विपन्नता की
उन बदरंग तस्वीरों को छुपाता है
जो अगर उजागर हो गयीं
तो तुम्हारी कलई खुल जायेगी
और तुम उसे भी कहाँ
बर्दाश्त कर पाओगे !
मेरे मौन के इस उद्दाम आवेग को
मेरे मन की इस
छिद्रविहीन सुदृढ़ थैली में
इसी तरह निरुद्ध रहने दो
वगरना जिस भी किसी दिन
इसका मुँह खुल जाएगा
मेरे आँसुओं की प्रगल्भ,
निर्बाध, तूफानी बाढ़
मर्यादा के सारे तट बंधों को
तोड़ती बह निकलेगी
और उसके साथ तुम्हारे
भूत भविष्य वर्त्तमान
सब बह जायेंगे और
शेष रह जाएगा
विध्वंस की कथा सुनाता
एक विप्लवकारी सन्नाटा
जो समय की धरा पर
ऐसे बदसूरत निशाँ छोड़ जाएगा
जिन्हें किसी भी अमृत वृष्टि से
धोया नहीं जा सकेगा !
इसीलिये कहती हूँ
मेरा यह मौन
मेरा कम और तुम्हारा
रक्षा कवच अधिक है
इसे तुम ना कुरेदो
तो ही अच्छा है !
साधना वैद
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Tuesday, May 11, 2010
कितनी बार...
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
कितनी बार...
कितनी बार तुम मुझे अहसास कराते रहोगे
कि मेरी अहमियत तुम्हारे घर में,
तुम्हारे जीवन में
मात्र एक मेज़ या कुर्सी की ही है
जिसे ज़रूरत के अनुसार
कभी तुम बैठक में,
कभी रसोई में तो कभी
अपने निजी कमरे में
इस्तेमाल करने के लिए
सजा देते हो
और इस्तेमाल के बाद
यह भी भूल जाते हो कि
वह छाया में पड़ी है या धूप में !
कितनी बार तुम मुझे याद दिलाओगे
कि मैं तुम्हारे जीवन में
एक अनुत्पादक इकाई हूँ
इसलिए मुझे कैसी भी
छोटी या बड़ी इच्छा पालने का
या कैसा भी अहम या साधारण
फैसला लेने का
कोई हक नहीं है
ये सारे सर्वाधिकार केवल
तुम्हारे लिए सुरक्षित हैं
क्योंकि घर में धन कमा कर
तो तुम ही लाते हो !
कितनी बार तुम मुझे याद दिलाओगे
कि हमारे साझे जीवन में
मेरी हिस्सेदारी सिर्फ सर झुका कर
उन दायित्वों को ओढ़ने
और निभाने की है
जो मेरे चाहे अनचाहे
तुमने मुझ पर थोपे हैं,
और तुम्हारी हिस्सेदारी
सिर्फ ऐसे दायित्वों की सूची को
नित नया विस्तार देने की है
जिनके निर्वहन में
तुम्हारी भागीदारी शून्य होती है
केवल इसलिए
क्योंकि तुम ‘पति’ हो !
साधना वैद
कितनी बार...
कितनी बार तुम मुझे अहसास कराते रहोगे
कि मेरी अहमियत तुम्हारे घर में,
तुम्हारे जीवन में
मात्र एक मेज़ या कुर्सी की ही है
जिसे ज़रूरत के अनुसार
कभी तुम बैठक में,
कभी रसोई में तो कभी
अपने निजी कमरे में
इस्तेमाल करने के लिए
सजा देते हो
और इस्तेमाल के बाद
यह भी भूल जाते हो कि
वह छाया में पड़ी है या धूप में !
कितनी बार तुम मुझे याद दिलाओगे
कि मैं तुम्हारे जीवन में
एक अनुत्पादक इकाई हूँ
इसलिए मुझे कैसी भी
छोटी या बड़ी इच्छा पालने का
या कैसा भी अहम या साधारण
फैसला लेने का
कोई हक नहीं है
ये सारे सर्वाधिकार केवल
तुम्हारे लिए सुरक्षित हैं
क्योंकि घर में धन कमा कर
तो तुम ही लाते हो !
कितनी बार तुम मुझे याद दिलाओगे
कि हमारे साझे जीवन में
मेरी हिस्सेदारी सिर्फ सर झुका कर
उन दायित्वों को ओढ़ने
और निभाने की है
जो मेरे चाहे अनचाहे
तुमने मुझ पर थोपे हैं,
और तुम्हारी हिस्सेदारी
सिर्फ ऐसे दायित्वों की सूची को
नित नया विस्तार देने की है
जिनके निर्वहन में
तुम्हारी भागीदारी शून्य होती है
केवल इसलिए
क्योंकि तुम ‘पति’ हो !
साधना वैद
Monday, May 10, 2010
माँ के लिए ..........जागरण से
लबो पे जिसके कभी बद्दुआ नहीं होती
वो माँ है जो कभी खफा नहीं होती
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है
वो माँ है जो कभी खफा नहीं होती
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है
Sunday, May 9, 2010
मातृ दिवस ना मनाये
मातृ दिवस पर
माँ को करते हैं सलाम
और मातृ दिवस पर ही
कहीं किसी बेटी को करते हैं हलाल
जब भी कहीं कोई बेटी मरती हैं
एक माँ को भी तो आप ख़तम करते हैं
एक बच्चे का ममत्व आप छिनते हैं
आज से कुछ और साल बाद
शायद ना कोई माँ होगी
और ना ही होगी कोई संतान
मातृ दिवस ना मनाये
ऐसी परम्पराए क्यूँ बनाये
जिनेह आगे चल कर
ख़तम ही होना हैं
चलिये मानते हैं
ऑनर किल्लिंग दिवस
कन्या भुंण ह्त्या दिवस
दहेज के नाम पर जलती बहु - दिवस
क्या रखा हैं
मातृ दिवस मे
बालिका दिवस मे
जब मन मे स्नेह नहीं
बेटी के लिये
केवल सम्पत्ति हैं बेटी
कभी अपने घर तो
कभी ससराल
उसका मरना निश्चित हैं
दिवस बस अनिश्चित हैं
सो करिये घोषणा
कब मारेगे अपनी बेटी को
कुछ जश्न फिर नया हो
अजन्मी बेटियों , और्नर किल्लिंग के नाम पर मारी जाती बेटियों और दहेज़ के लोभ मे जलाई जाती बहुओ को समर्पित । अरुशी और निरुपमा की याद मे
और हाँ पोस्ट समाज से संबंधित है माँ पिता भाई बहिन सास ससुर से नहीं वैसे समाज मे और कौन होता हैं ??
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
माँ को करते हैं सलाम
और मातृ दिवस पर ही
कहीं किसी बेटी को करते हैं हलाल
जब भी कहीं कोई बेटी मरती हैं
एक माँ को भी तो आप ख़तम करते हैं
एक बच्चे का ममत्व आप छिनते हैं
आज से कुछ और साल बाद
शायद ना कोई माँ होगी
और ना ही होगी कोई संतान
मातृ दिवस ना मनाये
ऐसी परम्पराए क्यूँ बनाये
जिनेह आगे चल कर
ख़तम ही होना हैं
चलिये मानते हैं
ऑनर किल्लिंग दिवस
कन्या भुंण ह्त्या दिवस
दहेज के नाम पर जलती बहु - दिवस
क्या रखा हैं
मातृ दिवस मे
बालिका दिवस मे
जब मन मे स्नेह नहीं
बेटी के लिये
केवल सम्पत्ति हैं बेटी
कभी अपने घर तो
कभी ससराल
उसका मरना निश्चित हैं
दिवस बस अनिश्चित हैं
सो करिये घोषणा
कब मारेगे अपनी बेटी को
कुछ जश्न फिर नया हो
अजन्मी बेटियों , और्नर किल्लिंग के नाम पर मारी जाती बेटियों और दहेज़ के लोभ मे जलाई जाती बहुओ को समर्पित । अरुशी और निरुपमा की याद मे
और हाँ पोस्ट समाज से संबंधित है माँ पिता भाई बहिन सास ससुर से नहीं वैसे समाज मे और कौन होता हैं ??
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Thursday, May 6, 2010
टुकड़ा टुकड़ा आसमान
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अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के लिये
मैने क़तरा क़तरा रंगों को संचित कर
एक मोहक तस्वीर बनानी चाही थी
तुमने तस्वीर पूरी होने से पहले ही
उसे पोंछ क्यों डाला माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने जीवन को सुख सौरभ से सुवासित करने के लिये
मैंने ज़र्रा ज़र्रा ज़मीन जोड़
सुगन्धित सुमनों के बीज बोये थे
तुमने उन्हें अंकुरित होने से पहले ही
समूल उखाड़ कर फेंक क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने नीरस जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिये
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?
साधना वैद
अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के लिये
मैने क़तरा क़तरा रंगों को संचित कर
एक मोहक तस्वीर बनानी चाही थी
तुमने तस्वीर पूरी होने से पहले ही
उसे पोंछ क्यों डाला माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने जीवन को सुख सौरभ से सुवासित करने के लिये
मैंने ज़र्रा ज़र्रा ज़मीन जोड़
सुगन्धित सुमनों के बीज बोये थे
तुमने उन्हें अंकुरित होने से पहले ही
समूल उखाड़ कर फेंक क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने नीरस जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिये
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?
साधना वैद
Tuesday, May 4, 2010
आत्म साक्षात्कार
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
अब खुले वातायनो से
सुखद, मन्द, सुरभित पवन के
मादक झोंके नहीं आते,
अंतर्मन की कालिमा उसमें मिल
उसे प्रदूषित कर जाती है।
अब नयनों से विशुद्ध करुणा जनित
पवित्र जल की निर्मल धारा नहीं बहती,
पुण्य सलिला गंगा की तरह
उसमें भी घृणा के विष की पंकिल धारा
साथ-साथ बहने लगी है।
अब व्यथित पीड़ित अवसन्न हृदय से
केवल ममता भरे आशीर्वचन और प्रार्थना
के स्वर ही उच्छवसित नहीं होते,
कम्पित अधरों से उलाहनों,
आरोपों, प्रत्यारोपों की
प्रतिध्वनि भी झंकृत होने लगी है।
अब नीरव, उदास, अनमनी संध्याओं में
अवसाद का अंधकार मन में समा कर
उसे शिथिल, बोझिल,
निर्जीव सा ही नहीं कर जाता,
उसमें अब आक्रोश की आँच भी
नज़र आने लगी है
जो उसे धीमे-धीमे सुलगा कर
प्रज्वलित कर जाती है।
लेकिन कैसी है यह आँच
जो मेरे मन को मथ कर
उद्वेलित कर जाती है?
कैसा है यह प्रकाश
जिसके आलोक में मैं
अपने सारे स्वप्नों के साथ-साथ
अपनी समस्त कोमलता,
अपनी मानवता,
अपनी चेतना, अपनी आत्मा,
अपना अंत:करण
और अपने सर्वांग को
धू-धू कर जलता देख रही हूँ
नि:शब्द, अवाक, चुपचाप !
साधना वैद
अब खुले वातायनो से
सुखद, मन्द, सुरभित पवन के
मादक झोंके नहीं आते,
अंतर्मन की कालिमा उसमें मिल
उसे प्रदूषित कर जाती है।
अब नयनों से विशुद्ध करुणा जनित
पवित्र जल की निर्मल धारा नहीं बहती,
पुण्य सलिला गंगा की तरह
उसमें भी घृणा के विष की पंकिल धारा
साथ-साथ बहने लगी है।
अब व्यथित पीड़ित अवसन्न हृदय से
केवल ममता भरे आशीर्वचन और प्रार्थना
के स्वर ही उच्छवसित नहीं होते,
कम्पित अधरों से उलाहनों,
आरोपों, प्रत्यारोपों की
प्रतिध्वनि भी झंकृत होने लगी है।
अब नीरव, उदास, अनमनी संध्याओं में
अवसाद का अंधकार मन में समा कर
उसे शिथिल, बोझिल,
निर्जीव सा ही नहीं कर जाता,
उसमें अब आक्रोश की आँच भी
नज़र आने लगी है
जो उसे धीमे-धीमे सुलगा कर
प्रज्वलित कर जाती है।
लेकिन कैसी है यह आँच
जो मेरे मन को मथ कर
उद्वेलित कर जाती है?
कैसा है यह प्रकाश
जिसके आलोक में मैं
अपने सारे स्वप्नों के साथ-साथ
अपनी समस्त कोमलता,
अपनी मानवता,
अपनी चेतना, अपनी आत्मा,
अपना अंत:करण
और अपने सर्वांग को
धू-धू कर जलता देख रही हूँ
नि:शब्द, अवाक, चुपचाप !
साधना वैद
Monday, May 3, 2010
तुम क्या जानो
कुछ आपबीती कुछ जगबीती
पुरुष प्रधान भारतीय समाज में नारी को किस तरह से विषम परिस्थितियों में अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करना पड़ा है । रूढिवादी रस्मों रिवाज़ और परम्पराओं की बेड़ियों से जकड़े होने के बावज़ूद भी जीवनधारा के विरुद्ध प्रवाह में तैरते हुए किस तरह से उसने आधुनिक समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है , अपनी पहचान पुख्ता की है यह कविता स्त्री की हर हाल में जीत हासिल करने की उसी अदम्य जिजिविषा को अभिव्यक्ति देने की छोटी सी कोशिश है ।
तुम क्या जानो
रसोई से बैठक तक,
घर से स्कूल तक,
रामायण से अखबार तक
मैने कितनी आलोचनाओं का ज़हर पिया है
तुम क्या जानो !
करछुल से कलम तक,
बुहारी से ब्रश तक,
दहलीज से दफ्तर तक
मैंने कितने तपते रेगिस्तानों को पार किया है
तुम क्या जानो !
मेंहदी के बूटों से मकानों के नक्शों तक,
रोटी पर घूमते बेलन से कम्प्यूटर के बटन तक,
बच्चों के गड़ूलों से हवाई जहाज़ की कॉकपिट तक
मैंने कितनी चुनौतियों का सामना किया है
तुम क्या जानो !
जच्चा सोहर से जाज़ तक,
बन्ना बन्नी से पॉप तक,
कत्थक से रॉक तक मैंने कितनी वर्जनाओं के थपेड़ों को झेला है
तुम क्या जानो !
सड़ी गली परम्पराओं को तोड़ने के लिये,
बेजान रस्मों को उखाड़ फेंकने के लिये,
निषेधाज्ञा में तनी रूढ़ियों की उँगली मरोड़ने के लिये
मैने कितने सुलगते ज्वालामुखियों की तपिश को बर्दाश्त किया है
तुम क्या जानो !
आज चुनौतियों की उस आँच में तप कर,
प्रतियोगिताओं की कसौटी पर घिस कर, निखर कर,
कंचन सी, कुंदन सी अपरूप दपदपाती
मैं खड़ी हूँ तुम्हारे सामने
अजेय, अपराजेय, दिक्विजयी !
मुझे इस रूप में भी तुम जान लो
पहचान लो !
साधना वैद
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
पुरुष प्रधान भारतीय समाज में नारी को किस तरह से विषम परिस्थितियों में अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करना पड़ा है । रूढिवादी रस्मों रिवाज़ और परम्पराओं की बेड़ियों से जकड़े होने के बावज़ूद भी जीवनधारा के विरुद्ध प्रवाह में तैरते हुए किस तरह से उसने आधुनिक समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है , अपनी पहचान पुख्ता की है यह कविता स्त्री की हर हाल में जीत हासिल करने की उसी अदम्य जिजिविषा को अभिव्यक्ति देने की छोटी सी कोशिश है ।
तुम क्या जानो
रसोई से बैठक तक,
घर से स्कूल तक,
रामायण से अखबार तक
मैने कितनी आलोचनाओं का ज़हर पिया है
तुम क्या जानो !
करछुल से कलम तक,
बुहारी से ब्रश तक,
दहलीज से दफ्तर तक
मैंने कितने तपते रेगिस्तानों को पार किया है
तुम क्या जानो !
मेंहदी के बूटों से मकानों के नक्शों तक,
रोटी पर घूमते बेलन से कम्प्यूटर के बटन तक,
बच्चों के गड़ूलों से हवाई जहाज़ की कॉकपिट तक
मैंने कितनी चुनौतियों का सामना किया है
तुम क्या जानो !
जच्चा सोहर से जाज़ तक,
बन्ना बन्नी से पॉप तक,
कत्थक से रॉक तक मैंने कितनी वर्जनाओं के थपेड़ों को झेला है
तुम क्या जानो !
सड़ी गली परम्पराओं को तोड़ने के लिये,
बेजान रस्मों को उखाड़ फेंकने के लिये,
निषेधाज्ञा में तनी रूढ़ियों की उँगली मरोड़ने के लिये
मैने कितने सुलगते ज्वालामुखियों की तपिश को बर्दाश्त किया है
तुम क्या जानो !
आज चुनौतियों की उस आँच में तप कर,
प्रतियोगिताओं की कसौटी पर घिस कर, निखर कर,
कंचन सी, कुंदन सी अपरूप दपदपाती
मैं खड़ी हूँ तुम्हारे सामने
अजेय, अपराजेय, दिक्विजयी !
मुझे इस रूप में भी तुम जान लो
पहचान लो !
साधना वैद
© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!
Saturday, May 1, 2010
नारी जीवन - तेरी यही कहानी!
जीवन जिया,
मंजिलें भी मिली,
एक के बाद एक
बस नहीं मिला तो
समय नहीं मिला।
कुछ ऐसे क्षण खोजती ही रही ,
जो अपने और सिर्फ अपने लिए
जिए होते तो अच्छा होता।
जब समझा अपने को
कुछ बड़े मिले कुछ छोटे मिले
कुछ आदेश और कुछ मनुहार
करती रही सबको खुश ।
दूसरा चरण जिया,
बेटी से बन बहू आई,
झूलती रही, अपना कुछ भी नहीं,
चंद लम्हे भी नहीं जिए
जो अपने सिर्फ अपने होते।
पत्नी, बहू और माँ के विशेषण ने
छीन लिया अपना अस्तित्व, अपने अधिकार
चाहकर न चाहकर जीती रही ,
उन सबके लिए ,
जिनमें मेरा जीवन बसा था।
अपना सुख, खुशी निहित उन्हीं में देखी
थक-हार कर सोचा
कुछ पल अपने लिए
मिले होते
ख़ुद को पहचान तो लेती
कुछ अफसोस से
मुक्त तो होती
जी तो लेती कुछ पल
मंजिलें भी मिली,
एक के बाद एक
बस नहीं मिला तो
समय नहीं मिला।
कुछ ऐसे क्षण खोजती ही रही ,
जो अपने और सिर्फ अपने लिए
जिए होते तो अच्छा होता।
जब समझा अपने को
कुछ बड़े मिले कुछ छोटे मिले
कुछ आदेश और कुछ मनुहार
करती रही सबको खुश ।
दूसरा चरण जिया,
बेटी से बन बहू आई,
झूलती रही, अपना कुछ भी नहीं,
चंद लम्हे भी नहीं जिए
जो अपने सिर्फ अपने होते।
पत्नी, बहू और माँ के विशेषण ने
छीन लिया अपना अस्तित्व, अपने अधिकार
चाहकर न चाहकर जीती रही ,
उन सबके लिए ,
जिनमें मेरा जीवन बसा था।
अपना सुख, खुशी निहित उन्हीं में देखी
थक-हार कर सोचा
कुछ पल अपने लिए
मिले होते
ख़ुद को पहचान तो लेती
कुछ अफसोस से
मुक्त तो होती
जी तो लेती कुछ पल
कहीं दूर प्रकृति के बीच या एकांत में
जहाँ मैं और सिर्फ मैं होती.
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