सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता
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Tuesday, November 9, 2010

तुम्हें पता है ???

तुम्हें पता है ???
बादलों की अनधुनी
अधधुली रुई
सिमटी है मेरे आंचल में
महसूस किया तुम्हें
मैंने और
भीगे तुम मेरे प्यार में
लहर लहर लहराये
 तुम्हारे इषारे
पत्तियों में छनती धूप की तरह
 मेरे हदय आंगन में
 समेट लिया
तुम्हारे छुए प्यार को
पवित्र ओस की तरह
 और सज गया एक फूल
 मेरे जीवन में
हूबहू तम्हारी तरह !!!!
तुम्हें पता है ???
 वो फूल
 अब भी
इर्द गिर्द ही है
मेरे !!....किरण राजपुरोहित नितिला

Wednesday, August 11, 2010

बदलाव !

सदियों से कैद हैं जो साँसें 
अब ज्वाला उगलने लगी हैं.
धधकती दिलों में वो  आसें
अब दावानल बनने लगी हैं.
कब तक घुटेंगी ये बेजुबां
अब बगावत भी करने लगी हैं.
वो शीशे की दर औ' दीवारें
अब खिलाफत से दरकने लगी हैं.
कहाँ तक बनेंगी वो मोहरा

अब चालें पलटने लगीं है.
अब होश में आओ ज़माने
जब सदियाँ बदलने लगीं हैं.
जीने दो उनको भी  मर्जी से
अब तो  दम निकलने लगी है.
कहाँ तक सिखाएं हम तुमको 
अब  वे   इतिहास लिखने लगी हैं.
वही  परदे से बाहर निकल कर  
अब हुकूमत  चलाने लगी है.

Wednesday, June 30, 2010

हाँ मैं नारी हूँ !

सदियों से इस जगत में
पुनीता , पूजिता औ' तिरस्कृता
बनी और सब शिरोधार्य किया
कभी उन्हें दी सीख
औ' कभी मौत भी टारी हूँ ,
हाँ मैं नारी हूँ.
सदियाँ  गुजरी ,
बहुरूप मिले
विदुषी भी बनी
औ बनी नगरवधू
धैर्य  कभी न हारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
वनकन्या सी रही कभी,
कभी बंद कर दिया मुझे
सांस चले बस इतना सा
जीने को खुला था मुख मेरा
जीवित थी फिर भी
सौ   उन पर  मैं भारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
जीने की ललक मुझ में भी थी
जीवन मेरा सब जैसा था,
जुबान मेरे मुख में भी थी
पर बेजुबान बना दिया मुझे
बस उस वक्त की मारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.
आज चली हूँ मर्जी से
आधी दुनिया में तूफान मचा
कैसे नकेल डालें इसको
जुगत कुछ ऐसी खोज रहे
कहीं बगावत बनी मौत
औ कहीं जीती मैं पारी हूँ,
हाँ मैं नारी  हूँ.
अब छोडो मुझे
जीने भी दो
तुम सा जीवन मेरा भी है
अपने अपने घर में झांको
मैं ही दुनियाँ सारी हूँ,
हाँ मैं नारी हूँ.