सामाजिक कुरीतियाँ और नारी , उसके सम्बन्ध , उसकी मजबूरियां उसका शोषण , इससब विषयों पर कविता

Saturday, August 17, 2013

माँ

 माँ, ये नाम है एक अंतहीन विस्तार का
जीवन का, और जीवन के अवतार का
चेहरे की झुर्रियों से टपकती
गरिमा का नाम है माँ
ज़िंदगी की हर तारीख में
पंचांग सी है माँ
कभी सोचा है माँ के उच्चारण में
चंद्रबिन्दु क्यूं लगा है
माँ  की गोद में सर रखकर
वो शीतलता मिलती है
जो किसी वातानुकूलित कमरे में
सर्वथा अनुपस्थित होगी
माँ के उच्चारण में आ-कार भी है
परंतु माँ का आकार शाश्वत है
ममता भी माँ है , अनुसाशण भी माँ है
माँ वो शब्द है जिसका सिर्फ़ अनुवाद ही
शब्दकोष बता सकता है, एहसास नही
माँ एक पेड़ है जो फल भी देती है
और शीतल छाया भी
एक ऐसा पात्र जिसकी महिमा
छंद में नही समा पाती
दोहे छोटे पर जाते हैं
कविता अधूरी सी लगती है
माँ केवल नाम नही
सृजन की जननी है
हर नयी रचना के मूल में
मौजूद है एक माँ
जब भी जीवन अवतरित होता है
तो अवतरित होती है एक माँ

—सुलोचना वर्मा—
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Monday, June 10, 2013

आज की सीता



वो आज की सीता है
अपना वर पाने को
अब भी स्वय्म्वर रचाती है
वन में ही नही
रण में भी साथ निभाती है
अपनी सीमाएँ खुद तय करती है
लाँघेघी जो लक्ष्मण की रेखा है
परख है उसे ऋषि और रावण की
पर दुर्घटना को किसने देखा है
रावण का पुष्पक सीता को ले उड़ा
लोगो का जमघट मूक रहा खड़ा
लक्ष्मण को अपने कुल की है पड़ी
रावण लड़ने की ज़िद पे है अड़ा
राम ने किया है प्रतिकार कड़ा
कुलवधू का अपहरण अपमान है बड़ा
येन केन प्रकारेन युद्ध है लड़ा
फूट गया रावण के पाप का घड़ा
वैदेही अवध लौट आई है
जगत ने अपनी रीत निभाई है
आरोप लगा है जानकी पर
अग्निपरीक्षा की बारी आई है
तय किया है सती ने अब
नही देगी वो अग्नि परीक्षा
विश्वास है उसे खुद पर
क्यों माने किसी और की इच्छा
सहनशील है वो, अभिमानी है
किसी के कटाक्ष से विचलित
न होने की ठानी है
राम की अवज्ञा नही कर सकती
रघुकुल की बहूरानी है
दुष्कर क्षण है आया
क्या करे राम की जाया
भावनाओं का उत्प्लावन
नैनों में भर आया
परित्याग का आदेश
पुरुषोत्तम ने सुनाया
परित्यक्तता का बोध
हृदय में समाया
भूल किया उसने जो
वन में भी साथ निभाया
राजमहल का सुख
व्यर्थ में बिसराया
हृदय विरह व्यथा से व्याकुल है
मन निज पर शोकाकुल है
उसका त्याग और अर्पण ही
सारे कष्टों का मूल है
किकर्तव्यविमूढ पर संयमी
नही कहेगी जो उस पर बीता है
अश्रु को हिम बनाएगी
विडंबना ये है कि वो आज की सीता है

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Saturday, June 8, 2013

सुलोचना वर्मा की दो कविताएं

विधवा
तुम्हारे अवशान को
कुछ ही वक़्त बीता है
तुम जा बसे हो
उस नीले नभ के पार
इंद्रधनुषी रंगो मे नहाकर
मुझे फिर से आकर्षित
करने को तैयार
उस रोज़ चौखट पर मेरा हाथ था
हर तरफ चूड़ियो के टूटने का शोर था
झुंझला उठती थी मैं जब तुम
बार बार उन्हे खनकाया करते थे
आज उनके टूटने का बेहद ही शोक था
तालाब का पानी सुर्ख था ना की
रक्तिम क्षितिज की परच्छाई थी
माथे की लाली को धोने
विधवा वहाँ नहाई थी
समाज के ठेकेदारो का
बड़ा दबदबा है
सफेद कफ़न मे मुझे लपेटा
कहा तू "विधवा" है
वो वैधव्य कहते है
मैं वियोग कहती हूँ
वियोग - अर्थात विशेष योग
मिलूँगी शीघ्र ही
उस रक्तिम क्षितिज के परे
मिलन को तत्पर
सतरंगी चूड़िया डाली है हाथो मे
पहन रही हूँ रोज़
तुम्हारे पसंदीदा
महरूनी रंग के कपड़े
कही सजती है दुल्हन भी
श्वेत बे-रंग वस्त्रो मे

स्त्री - रुबरु
लड़की, नारी, स्त्री
इन नामो से जानी जाती है
कई उपाधियाँ भी है
बेटी, पत्नी, माँ
अनेक रूपो मे नज़र आती है
पहले घर की रौशनी कहा
तो आँखो के नीचे काला स्याह क्यों?
निर्भया, दामिनी, वीरा भी कहा
पर तब जब कुछ लोगो ने अपनी
पाशविकता का प्रमाण भी दिया
कुछ ने तो परी कहा
परियो से पंख भी दे डाले
जब उनके उड़ने की बारी आई
वही पंख किसी ने काट डाले
ऐसे समाज से आज भी
करती वो निर्वाह क्यों?
लड़की का पिता अपना
सबसे मूल्यवान धन दान कर
कर जोड़े खड़ा है
उधर लड़के की माँ को
लड़के की माँ होने का
झूठा नाज़ बड़ा है
झूठा इसलिए की
उसकी संतान के लिंग निधारण मे
उसका कोई योगदान नही है
तो क्या लड़की के पिता का
कोई स्वाभिमान नही है?
पिता का आँगन छोड़कर
नया संसार बसाया है
माँ के आँचल की छाँव कहाँ
"माँ जैसी" ने भी रुलाया है
रुलाने का कारण?
आज उके बेटे ने
किसी दूसरी औरत को
प्यार से बुलाया है
आज वो इक माँ है
उस पीड़ा की गवाह है
जो उसकी माँ ने कभी
झूठी मुस्कान से दबाया था
बेटी के पैदा होने पर
कब किसने गीत गया था
पति के चले जाने के बाद
माथे की लाली मिटा दी लोगो ने
वो लाली जो उसके मुख का गौरव था
उसे कुलटा, मनहूस कहा
क्या सिर्फ़ पति ही
उसके जीवन का एकमात्र सौरभ था
शीघ्र ही वो दिवस भी आएगा
जब हरयाणा और राजस्थान की तरह
सारे विश्व से विलुप्त हो जाएगी ये "प्रजाति"
फिर राजा यज्ञ करवाएँगे
पुत्री रत्न पाने हेतु
राजकुमारियाँ सोने के पलनो मे पलेंगी
स्वयंवर रचाएँगी,
अपने सपनो के राजकुमार से
फिर द्रौपदी के पाँच पति होने पर
कोई सवाल ना कर सकेगा
उसके चरित्र पर कोई
टिप्पणी नही होगी
नारी को तब कोई भी
"वस्तु" नही कहेगा
संवेदनशील इस चाह को
"तथास्तु" ही कहेगा

Saturday, March 23, 2013

नारी

रौंदोगे कब तक
 नारी का तुम  सम्मान ?
कब तक समझोगे
 तुम उसको एक सामान।

रखोगे तुम कब तक 
उससे एक ही नाता?
कब समझोगे उसे
 बहन बेटी या माता।

क्यों भूल जाते हो
जननी है वह तुम्हारी
और सहचरी ,
जीवन में भरती उजियारी।

नारी है शक्ति
 न समझो  उसे क्षीण तुम।
दुर्गा है, मानो मत 
उसको दींन-हीन तुम।

उसे कुचलने का 
कभी जब सोचोगे,
अपने हाथों अपनी 
जड़ तुम नोचोगे।

हाँ!अपने हाथों अपनी 

जड़ तुम नोचोगे।


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Sunday, December 23, 2012

उसे मौत दो




वो एक नही जो बे-आबरू हुई
क्या हम सबकी रूह बेज़ार नहीं
वो जो लुटी सर-ए-बाज़ार आज
क्या वो इज्ज़त की हक़दार नहीं
कितने ही दुर्शाशन खड़े
पर कोई रखवाला गोपाल नहीं
कहा छुप्पे तुम आज क्रिशन
क्यों किया ध्रोपधि पे आज उपकार नहीं
लुटते, मरते सब देख रहे
कर रहे सियासत इस पर भी
ये कैसा हो गया देश मेरा
यहाँ कोई भी शर्म सार नही
उसकी सिर्फ आबरू नहीं लुटी
उसकी रूह को चीरा है
उसकी आँखों में दहशत है
उसकी आहो में पीड़ा है
वो शर्मनाक हरक़त वाले
उन्हें इस पाप का अंजाम दो
उसे मौत दो, उसे मौत दो 
वो दरिन्दे वो जानवर
किसी माफ़ी के हक़दार नही
signature
Swati 

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Tuesday, October 30, 2012

प्रश्न



देख के आज नवरात्री का जशन
आत्मा मेरी कर रही प्रश्न
ये कैसा कन्या पूजन है
ये कैसा देवी का आदर
जब खुद अपने हाथो से हम
कर रहे नन्ही कन्यायो का संहार
क्या उन्हें नहीं जीने का अधिकार
देवी की जय करने वालो
तुम कैसे अब चुप बैठे हो
मरते लुट ते देवी के रूपों को कैसे देखे हो
है धिक्कार ऐसी मानवता पे
जिसे अपनी बेटी पे गर्व नही
कोई हक नही इन खूनियो को
के वो माँ का सत्कार करे
इन खून से रंगे हाथो से
माँ भगवती का न सिंगार करे
जो ऐसे कर्म से शर्म सार नहीं
उन्हें देवी पूजन का अधिकार नही !!
उन्हें देवी पूजन का अधिकार नही !!
अँधा धुंध होती कन्या भ्रूण हत्या जैसी शर्म नाक कृत्य हर रोज़ हमारे देश में हो रहे है  और हम देवी पूजन कर आशीर्वाद मांग रहे है !!  ये कैसी विडंबना है !!
Swati
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Thursday, April 19, 2012

औरत और सब्जी --- अपमान रिश्तो का

अब भी कोहनिया जलती हैं
अब भी नमक कम ज्यादा होता हैं
पर
अब बच्चो का थाली फेकना
और
पति का चिल्लाना  
बस वहीँ होता हैं
जहां एक माँ और पत्नी नहीं
एक औरत खाना बनाती हैं

हमारे घर में ऐसी क़ोई
औरत खाना नहीं बनाती
माँ , बेटी , पत्नी और बहू बनाती हैं
जो औरत नहीं हैं
उनको औरत ना कहे

और कहीं औरत देखे
तो घंटी बजा दे ताकि
औरत को इन्सान
वो परिवार समझने लगे

अपमान आप रिश्तो का करते हैं 
जब माँ , बहन , बेटी , पत्नी , बहु को 
महज औरत कह देते हैं 
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Wednesday, March 28, 2012

क्या कोई नाम भी दिया जा सकता हैं इस कविता को ???

दस्तक ब्लॉग पर एक कविता देखी 

कविता का शीर्षक नहीं हैं शायद ऐसी कविताओं का शीर्षक होता ही ना हो , कविता ईशा की हैं
क्या क्या नहीं कह रही हैं . मुझे बहुत कुछ सुनाई दिया आप को भी दिया हो तो कमेन्ट मे बताये . ईशा भी जानना चाहती होगी .
क्या कोई नाम भी दिया जा सकता हैं इस कविता को ???



नारी - नाम है सम्मान का, या
         समाज ने कोई  ढोंग रचा है.


बेटी - नाम है दुलार का, या
         समाज के लिए सजा है.


पत्नी - किसी पुरुष की सगी है, या
           यह रिश्ता भी एक ठगी है.


माँ -  ममता की परिभाषा है, या
        होना इसका भी एक निराशा है.


नारी - नाम है स्वाभिमान का, या
          इसका हर रिश्ता है अपमान का.
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Friday, March 23, 2012

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?

जी आपके स्नेह से अभिभूत हूँ किन्ही कारणों से मैंने सभी साझा ब्लोग्स छोड़ दिए हैं और सबसे खुद को अलग कर लिया है ये मेरे निजी कारण हैं ........अब नारी ब्लॉग पर भी मैं नहीं हूँ इसलिए वहाँ पोस्ट तो नहीं कर सकती हाँ आपको भेज सकती हूँ आप यदि चाहें तो मेरे नाम के साथ वहाँ इसे लगा सकती हैं .........उम्मीद है आप बुरा नहीं मानेंगी .

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?


यहाँ ज़िन्दा कौन है

ना आशा ना विमला

ना लता ना हया

देखा है कभी

चलती फिरती लाशों का शहर

इस शहर के दरो दीवार तो होते हैं

मगर कोई छत नहीं होती

तो घर कैसे और कहाँ बने

सिर्फ लाशों की

खरीद फरोख्त होती है

जहाँ लाशों से ही

सम्भोग होता है

और खुद को वो

मर्द समझता है जो शायद

सबसे बड़ा नामर्द होता है

ज़िन्दा ना शरीर होता है

ना आत्मा और ना ज़मीर

रोज़ अपनी लाश को

खुद कंधे पर ढोकर

बिस्तर की सलवटें

बनाई जाती हैं

मगर लाशें कब बोली हैं

चिता में जलना ही

उनकी नियति होती है

कुछ लाशें उम्र भर होम होती हैं

मगर राख़ नहीं

देखा है कभी

लाशों को लाशों पर रोते

यहाँ तो लाशों को

मुखाग्नि भी नहीं दी जाती

फिर लाशों का तर्पण कौन करे ?



सादर आभार

वन्दना गुप्ता

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Monday, February 20, 2012

आवाज टंकार बन चुकी हैं

कल
औरत
एक आवाज थी
दबा दी जाती थी

आज
औरत
एक टंकार हैं

अब लोग दबा रहे हैं
अपने कान
ताकि
टंकार सुनाई ना दे

कल की औरत की आवाज
आज की औरत की
टंकार बन चुकी हैं



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Saturday, January 21, 2012

स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया

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आज एक ख्याल ने जन्म लिया
स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया
ना जाने ज़माना किन सोचो में भटक गया
और स्त्री देह तक ही सिमट गया
या फिर बराबरी के झांसे में फँस गया
मगर किसी ने ना असली अर्थ जाना
स्त्री मुक्ति के वास्तविक अर्थ को ना पहचाना
देह के स्तर पर तो कोई भेद नहीं
लैंगिग स्तर पर कैसे फर्क करें
जरूरतें दोनों की समान पायी गयीं
फिर कैसे उनमे भेद करें
दैहिक आवश्यकता ना पैमाना हुआ 
ये तो सिर्फ पुरुष पर थोपने का 
एक बहाना हुआ 
जहाँ दोनों की जरूरत समान हो
फिर  कैसे कह दें 
स्त्री मुक्ति का वो ही एक कारण  है
ये तो ना स्त्री मुक्ति का पर्याय हुआ
बराबरी करने वाली को स्त्री मुक्ति का दर्शन दिया
मगर ये भी ना सोच को सही दर्शाता है
"बराबरी करना" के भी अलग सन्दर्भ दीखते हैं
मगर मूलभूत अर्थ ना कोई समझता है
बदलो स्त्री मुक्ति के सन्दर्भों को
जानो उसमे छुपे उसके अर्थों को
तभी पूर्ण मुक्ति तुम पाओगी
सही अर्थ में तभी स्त्री तुम कहलाओगी 
सिर्फ स्वतंत्रता या स्वच्छंदता ही 
स्त्री मुक्ति का अवलंबन नहीं
ये तो मात्र स्त्री मुक्ति की एक इकाई है 
जिसके भी भिन्न अर्थ हमने लगाये हैं
उठो जागो और समझो 
ओ स्त्री ..........स्वाभिमानी बन कर जीना सीखो
अपनी सोच को अब तुम बदलो
स्वयं को इतना सक्षम कर लो
जो भी कहो वो इतना विश्वस्त हो
जिस पर ना कोई आक्षेप हो 
और हर दृष्टि में तुम्हारे लिए आदर हो 
तुम्हारी उत्कृष्ट सोच तुम्हारी पहचान का  परिचायक हो 
जिस दिन सोच में स्त्री में समानता आएगी
वो ही पूर्ण रूप में स्त्री मुक्ति कहलाएगी
जब स्वयं के निर्णय को सक्षम पायेगी
और बिना किसी दबाव के अपने निर्णय पर
अटल रह पायेगी
तभी उसकी मुक्ति वास्तव में मुक्ति कहलाएगी
बराबरी का अर्थ सिर्फ शारीरिक या आर्थिक ही नहीं होता
बराबरी का संपूर्ण अर्थ तो सोच से है निर्मित होता

Friday, December 9, 2011

स्वयंवर

स्वयंवर
 जो हुआ था अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका का
सीता और द्रोपदी का
क्या वास्तव में स्वयंवर था क्या?
अगर था,
तो क्या थी स्वयंवर  की परिभाषा?

स्वेछित  वर चुनने का अधिकार
अथवा
कन्या का नीलामी युक्त प्रदर्शन!
जिसमे इच्छुक उमीदवार
धनबल की अपेक्षा
 लगाते थे अपना बाहू-बल
दिखाते थे अपना पराक्रम और कौशल
और जीत ले जाते थे कन्या को
भले ही उसकी सहमति हो या न हो.

तभी तो उठा लाया था  भीष्म
उन तीन बहनों को
अपने बीमार,नपुंसक भाइयों के लिए
और अर्जुन ने बाँट ली थी याज्ञसेनी
 अपने भाइयों में बराबर


वास्तव में ही अगर
स्वयंवर का अधिकार
नारी को  मिला होता
तो अम्बा की 
आत्म(हत्या) का बोझ
इतिहास न ढोता.
महाविध्वंस्कारी,महाभारत का
 महायुद्ध न होता
और हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास
 कुछ और ही होता .
हाँ! कुछ और ही होता .


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Saturday, October 1, 2011

योद्धा

जब भी दिखा हैं मुझे क़ोई योद्धा
नारी के हक़ की लड़ाई लड़ता
उसके आस पास दिखा हैं
एक मजमा उसको समझाता

क़ोई उसको माँ कहता हैं
क़ोई कहता हैं दीदी
क़ोई कहता हैं स्तुत्य
क़ोई कहता हैं सुंदर

और
फिर इन संबोधनों में
वो योधा कहां खो जाता हैं
पता ही नहीं चलता हैं

और
रह जाती हैं बस एक नारी
कविता , कहानी लिखती
दूसरो का ख्याल रखती
तंज और नारियों को
नारीवादी होने का देती

ना जाने कितने योद्धा
कर्मभूमि में कर्म अपने
बदल लेते हैं

और
मजमे के साथ
मजमा बन जीते हैं





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Saturday, September 17, 2011

'मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं'



ये दुनिया है लगती अभिमानी और मतलबी सी
लेकिन उसी में रहते मुझे प्यार करने वाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं

मेरी अकल है घुटनों से ज़्यादा नहीं जिनके लिये
इन्हीं के साथ रहते मुझे पलकों पर बिठाने वाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं

हर नज़र से जहाँ खतरे का अहसास होता है
इन्हीं के बीच रहते मेरे रखवाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं

दिलकशी है जिनके लिये सजाने की एक चीज़ महज़
इन्हीं के बीच कहीं जिस्म से पहले रूह देखने वाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं


दिल पाता है अपमान और ठोकरें ही जहाँ
यहीं रहते मुझे हर हाल में अपनाने वाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं

इन्हीं मेरे बहुत अपनों में मिल गये
मेरी बहनों को सताने वाले हैं
पर मेरी तो ज़ुबाँ पर पड़ गये ताले हैं

इसी दुनिया में रहते हुए, बोलते इसी के खिलाफ़ 
मेरी ज़ुबां पर पड़ते छाले हैं
इसीलिये मेरी ज़ुबां पर पड़ गये ताले हैं 




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Thursday, September 15, 2011

बेटी हूँ

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सुन लो हे श्रेष्ठ जनों 
एक विनती लेकर आई हूँ 
बेटी हूँ इस समाज की 
बेटी सी हीं जिद्द करने आई हूँ 
बंधी हुई संस्कारों में थी 
संकोचों ने मुझे घेरा था 
तोड़ के संकोचों को आज 
तुम्हे जगाने आई हूँ 
बेटी हूँ 
और अपना हक जताने आई हूँ 
नवरात्रि में देवी के पूजन होंगे 
हमेशा की तरह 
फिर से कुवांरी कन्याओं के 
पद वंदन होंगे 
सदियों से प्रथा चली आई 
तुम भी यही करते आये हो 
पर क्या कभी भी 
मुझसे पूछा ?
बेटी तू क्या चाहती है ?
चाहत नहीं 
शैलपुत्री, चंद्रघंटा बनूँ 
ब्रम्ह्चारिणी या दुर्गा हीं कहलाऊं 
चाहत नहीं कि देवी सी पूजी जाऊं 
कुछ हवन पूजन, कुछ जगराते 
और फिर .....
उसी हवन के आग से 
दहेज़ की भट्टी में जल जाऊं 
उन्ही फल मेवों कि तरह 
किसी के भोग विलास  को अर्पित हो जाऊं
चार दिनों की चांदनी सी चमकूँ
और फिर विसर्जीत  कर दी जाऊं
नहीं चाहती
पूजा घर के इक कोने में  सजा दी जाऊं 
असल जिन्दगी कि राहों पर 
मुझको कदम रखने दो 
क्षमताएं हैं मुझमें 
मुझे भी आगे बढ़ने दो 
मत बनाओ इतना सहनशील की 
हर जुल्म चूप करके सह जाऊं 
मत भरो ऐसे संस्कार की 
अहिल्या सी जड़ हो जाऊं 
देवी को पूजो बेशक तुम 
मुझको बेटी रहने दो 
तुम्हारी थाली का 
नेह  निवाला कहीं बेहतर है
आडम्बर के उन फल मेवों से 
कहीं श्रेयष्कर है 
तुम्हारा प्यार, आशीर्वाद 
झूठ मुठ के उस पद वंदन से  
..................................................आलोकिता 

Friday, August 5, 2011

प्रवीण शाह की कविता -- लडकियां

आज के अतिथि कवि हैं प्रवीण शाह और कविता हैं लडकियां पढिये और अपने विचार दीजिये कविता पर भी और लड़कियों की स्थिति पर भी


लड़कियाँ
मैं देखता ही रह जाता हूँ उन्हें
हमेशा ही विस्मित करती हैं मुझे
जब भी देखता हूँ मैं उनको
मिलती हैं हरदम चहचहाती हुई
बिना किसी भी खास बात के
खुलकर हंसती-मुस्कुराती भी

लड़कियाँ
कभी नहीं दिखती वो बेतरतीब
घर से बाहर निकलती हैं सजी-संवरी
हमेशा पहने होती है रंगीन वस्त्र
समेटी चलती हैं खुशियों को हरदम
लगता है छिपा लेती हैं बड़ी खूबी से
हर असुंदरता हर काले पन को

लड़कियाँ
झेलती हैं दुनिया भर के दबाव
अकेले नहीं निकलना बाहर
कॉलोनी में चलो सर नीचा किये
ज्यादा हंसी मजाक शोभा नहीं देता
यह कपड़े शरीफों के लायक नहीं
खबरदार किसी बाहरी से बात की तो

लड़कियाँ
हमेशा ही मानी जाती हैं दोयम
अपने कम लायक भाइयों के सामने
जाने अनजाने कोई न कोई
दिलाता रहता है यह अहसास
तुम इस घर में पल रही जरूर हो
पर हो किसी दूसरे की अमानत ही

लड़कियाँ
ज्यादातर तो नहीं देती दखल कहीं भी
फिर भी होती हैं कुछ दूसरी मिट्टी की
नहीं मानती जो खुद को दोयम
बोलती है खुल कर हर अन्याय पर
लगा देतें हैं लोग लेबल माथे पर उनके
बेहया, कुलटा, घर-उजाड़ू आदि आदि

लड़कियाँ
कहता है हमारा यह समाज
रहना चाहिये हमेशा उन्हें संरक्षा में ही
उनके बचपन में पिता-भाई की
जवानी में यह काम करेगा पति
और बुढ़ापे में बेटों पर होगा दायित्व
कभी नहीं रह पाती हैं वो आजाद

लड़कियाँ
देती हैं अपना पूरा जीवन गुजार
पिता भाईयों पति और बेटों की
उपलब्धियों को ही अपना मान
शायद ही कभी होती है उनके पास
जमीन मकान या कोई संस्थान
जिसे कह सकती हों केवल अपना

लड़कियाँ
उनसे उम्मीद की जाती है हमेशा
दबी जबान में ही बातें करने की
नहीं कर सकती गुस्सा, लगा सकती ठहाके
एक ही भाव उचित माना जाता है उनका
हर छोटे दुख, विपदा तकलीफ पर
किसी पु्रूष के कंधे पर आंसू बहाना

लड़कियाँ
नहीं मानता हमारा यह समाज अभी भी
कि है उन्हें यह अधिकार विरोध जताने का
लड़की होने के, घर से बाहर निकलने के
होटल जाकर खाने के, पसंदीदा कपड़े पहनने के
दिल की बात कहने के, पुरूष का प्रतियोगी होने के
कारण होते दैहिक छेड़छाड़ व अनाचार का

लड़कियाँ
बहुत ही मुश्किल है लड़की होना
आखिर तुम पैदा ही क्यों हुई लड़की
क्या जरूरत थी तुम्हें आवाज उठाने की
तुम भी तो चुप रह ही सकती हो
संस्कृतिवादियों की हाँ में हाँ मिलाती
शर्म-हया से आभूषित औरों की तरह


बस एक ही नुकसान होता तुमको
यह कविता कभी नहीं लिखी जाती...
तुम पर...
मेरे द्वारा...
कभी भी...


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Thursday, July 7, 2011

चिड़ियों के साथ -1

© 2008-13 सर्वाधिकार सुरक्षित!
यह कविता 6 भागों में लिखी गई है प्रस्तुत है पहला भाग--

घर का एकाकी आँगन
और अकेली बैठी मैं
बिखरे हैं
सवाल ही सवाल
जिनमें उलझा
मेरा मन और तन !
अचानक छोटी-सी गौरैया
फुदकती हुई आई
न तो वह सकुचाई
और न शर्माई,
आकर बैठ गई
पास रखे एलबम पर
शायद दे रही थी सहारा
उदास मन को !
मैंने एलबम उठाई
और पलटने लगी
धुँधले अतीत को
खोलती रही
पन्ना-दर-पन्ना
डूबती रही
पुरानी यादों में!
मुझे याद आईं
अपनी दादी
जिनका व्यक्तित्व था
सीधा-सादा
पर अनुशासन था कठोर
उनके हाथों में रहती थी
हमारी मन-पतंग की डोर
जिनके राज्य में
लड़कियों को नहीं थी
पढ़ने-लिखने की
या फिर
खेलने की आज़ादी
जब भी
पढ़ते-लिखते देखतीं
पास आतीं
और समझातीं
'अपने इन अनमोल क्षणों को
मत करो व्यर्थ
क्योंकि
ज़्यादा पढ़ने-लिखने का
बेटी के जीवन में
नहीं है कोई अर्थ,
और फिर पढ़-लिखकर
विलायत तो जाएगी नहीं
घर में ही बैठकर
बस रोटियाँ पकाएगी’
लेकिन मैं चुपके-चुपके
छिप-छिपकर पढ़ती रही
आगे बढ़ती रही
और एक दिन चली गई
विदेश-यात्रा पर
दादी आज नहीं हैं
पर सुन रही होंगी
मेरी बातें
वो अपनी पैनी दृष्टि से
देख रही होंगी
मेरी सौगातें !
चिड़िया उड़ी
और
बैठ गई मुँडेर पर
देने लगी दाना
अपने नन्हे-नन्हे बच्चों को!

डॉ.मीना अग्रवाल

Wednesday, July 6, 2011

घर बनाने का अधिकार नारी का नहीं होता

घर बनाने का अधिकार
नारी का नहीं होता
घर तो केवल पुरुष बनाते हैं
नारी को वहाँ वही लाकर बसाते हैं
जो नारी अपना घर खुद बसाती हैं
उसके चरित्र पर ना जाने कितने
लाछन लगाए जाते हैं

बसना हैं अगर किसी नारी को अकेले
तो बसने नहीं हम देगे
अगर बसायेगे तो हम बसायेगे
चूड़ी, बिंदी , सिंदूर और बिछिये से सजायेगे
जिस दिन हम जायेगे
उस दिन नारी से ये सब भी उतरवा ले जायेगे
हमने दिया हमने लिये इसमे बुरा क्या किया


कोई भी सक्षम किसी का सामान क्यूँ लेगा
और ऐसा समान जिस पर अपना अधिकार ही ना हो
जिस दिन चूड़ी , बिंदी , सिंदूर और बिछिये
पति का पर्याय नहीं रहेगे
उस दिन ख़तम हो जाएगा
सुहागिन से विधवा का सफ़र
लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा
क्यूंकि
घर बनाने का अधिकार
नारी का नहीं होता

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Tuesday, July 5, 2011

अफ़सोस

[goole se sabhar]



''मैं''

केवल एक देह नहीं

मुझमे भी प्राण हैं .

मैं नहीं भोग की वस्तु

मेरा भी स्वाभिमान .


मेरे नयन मात्र झील

से गहरे नहीं ;

इनमे गहराई है

पुरुष के अंतर्मन को

समझने की ,

मेरे होंठ मात्र फूल की

पंखुडियां नहीं ;ये खुलते

हैं जिह्वा जब बोलती है

भाषा उलझने की .


मेरा ह्रदय मोम सा

कोमल नहीं ;इसमें भावनाओं

का ज्वालामुखी है

धधकता हुआ ,

मेरे पास भी है मस्तिष्क

जिसमे है विचार व् तर्कों

का उपवन

महकता हुआ .


मेरा भी वजूद है

मैं नहीं केवल छाया

पर अफ़सोस पुरुष

इतना बुद्धिमान होकर भी

कभी ये समझ

नहीं पाया .


शिखा कौशिक

http://shikhakaushik666.blogspot.com

Wednesday, June 29, 2011

सृष्टि में एक नारी,





धरती पर जीवन रचने की भावना जब आई 
तब प्रभु ने औजार छोड़कर तूलिका उठाई.
सेवक ने तब प्रभु से पूछा ऐसे क्या रचोगे,
औजारों का काम आप इससे कैसे करोगे?
बोले प्रभु मुझको है बनानी सृष्टि में एक नारी,
कोमलता के भाव बना न सकती कोई आरी.
पत्थर पर जब मैं हथोडी से वार कई करूंगा,
ऐसे दिल में प्यार के सुन्दर भाव कैसे भरूँगा?
क्षमा करुणा भाव हैं ऐसे उसमे तभी ये आयेंगे,
जब रंगों के संग सिमट कर उसके मन बस जायेंगे.
इसीलिए अपने हाथों में तूलिका को थामा,
पहनाने दे अब मेरी योजना को अमली जामा. 
            शालिनी कौशिक 

Saturday, June 4, 2011

बलात्कार के बाद का बलात्कार .कविता केसर क्यारी ....उषा राठौड़


केसर क्यारी ....उषा राठौड की कविता

बलात्कार के बाद का बलात्कार

मेरी एक नन्ही सी नादानी की इतनी बड़ी सजा ?
डग भरना सिख रही थी,
भटक कर रख दिया था वो कदम
बचपन के आँगन से बाहर ...
जवानी तक तो मै पहुंची भी नहीं थी कि
तुमने झपट्टा मार लिया उस भूखे गिद्ध की मानिंद
नोच लिए मेरे होंसलों के पंख
मरे सीने का तो मांस भी भरा नहीं था कि
तुमको मांसाहारी समझ के छोड़ दूं
टुकड़ों मे काट दिया है तुमने मेरी जिंदगी को
अब ना समेट पाऊँगी
अपनी नन्ही हथेलियों से
मेरे मुंह पर रख के हाथ जितना जोर से दबाया था
काश एक हाथ मेरे गले पे होता तुम्हारा
तो ये अनगिनित निगाहे यूं ना करती आज मेरा
बलात्कार के बाद का बलात्कार .



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Sunday, May 15, 2011

कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??

देश को आजाद हुए , होगये है वर्ष साठ
पर आज भी जब बात होती है बराबरी कि
तो मुझे आगे कर के कहा जाता है
लो ये पुरूस्कार तुम्हारा है
क्योंकी तुम नारी हो ,
महिला हो , प्रोत्साहन कि अधिकारी हो
देने वाले हम है , आगे तुम्हे बढाने वाले भी हम है
मजमा जब जुडेगा , फक्र से हम कह सकेगे
ये पुरूस्कार तो हमारा था
तुम नारी थी , अबला थी , इसलिये तुम को दिया गया
फिर कुछ समय बाद , हमारी भाषा बदल जायेगी
हम ना सही , कोई हम जैसा ही कहेगा
नारियों को पुरूस्कार मिलता नहीं दिया जाता है
दिमाग मे बस एक ही प्रश्न आता
और
कब तक मेरे किये हुए कामो को मेरी उपलब्धि नहीं माना जाएगा ??
Link
और
कब तक मेरे नारीत्व को ही मेरी उपलब्धि माना जायगा ??



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Wednesday, May 11, 2011

माँ

रचना जी,

मैंने "माँ" विषय पर एक कविता लिखी है, अगर नारी की कविता ब्लॉग के लिए यह उपयुक्त हो तो मैं आप सबसे साझा करना चाहूँगा |


माँ

जीवन की रेखा की भांति जिसकी महत्ता होती है,

दुनिया के इस दरश कराती, वह तो माँ ही होती है |


खुद ही सारे कष्ट सहकर भी, संतान को खुशियाँ देती है,

गुरु से गुरुकुल सब वह बनती, वह तो माँ ही होती है |

जननी और यह जन्भूमि तो स्वर्ग से बढ़कर होती है,

पर थोडा अभिमान न करती, वह तो माँ ही होती है |


"माँ" छोटा सा शब्द है लेकिन, व्याख्या विस्तृत होती है,

ममता के चादर में सुलाती, वह तो माँ ही होती है |

संतान के सुख से खुश होती, संतान के गम में रोती है,

निज जीवन निछावर करती, वह तो माँ ही होती है |

शत-शत नमन है उस जीवट को, जो हमको जीवन देती है,

इतना देकर कुछ न चाहती, वह तो माँ ही होती है |


Thank you
Pradip Kumar
(9006757417)



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गृहणी

मैंने उसे देखा है

मौन की ऊँची-ऊँची दीवारों से घिरी

सपाट भावहीन चेहरा लिये वह

चुपचाप गृह कार्य में लगी होती है

उसके खुरदुरे हाथ यंत्रवत कभी

सब्जी काटते दिखाई देते हैं ,

कभी कपड़े निचोड़ते तो

कभी विद्युत् गति से बच्चों की

यूनीफ़ॉर्म पर प्रेस करते !

उसकी सूखी आँखों की झील में

पहले कभी ढेर सारे सपने हुए करते थे ,

वो सपने जिन्हें अपने विवाह के समय

काजल की तरह आँखों में सजाये

बड़ी उमंग लिये अपने पति के साथ

वह इस घर में ले आई थी !

साकार होने से पहले ही वे सपने

आँखों की राह पता नहीं

कब, कहाँ और कैसे बह गये और

उसकी आँखों की झील को सुखा गये

वह जान ही नहीं पाई !

हाँ उन खण्डित सपनों की कुछ किरचें

अभी भी उसकी आंखों में अटकी रह गयी हैं

जिनकी चुभन यदा कदा

उसकी आँखों को गीला कर जाती है !

कस कर बंद किये हुए उसके होंठ

सायास ओढ़ी हुई उसकी खामोशी

की दास्तान सुना जाते हैं ,

जैसे अब उसके पास किसीसे

कहने के लिये कुछ भी नहीं बचा है ,

ना कोई शिकायत, ना कोई उलाहना

ना कोई हसरत, ना ही कोई उम्मीद ,

जैसे उसके मन में सब कुछ

ठहर सा गया है, मर सा गया है !

उसे सिर्फ अपना धर्म निभाना है ,

एक नीरस, शुष्क, मशीनी दिनचर्या ,

चेतना पर चढ़ा कर्तव्यबोध का

एक भारी भरकम लबादा ,

और उसके अशक्त कन्धों पर

अंतहीन दायित्वों का पहाड़ सा बोझ ,

जिन्हें उसे प्यार, प्रोत्साहन, प्रशंसा और

धन्यवाद का एक भी शब्द सुने बिना

होंठों को सिये हुए निरंतर ढोये जाना है ,

ढोये जाना है और बस ढोये जाना है !

यह एक भारतीय गृहणी है जिसकी

अपनी भी कोई इच्छा हो सकती है ,

कोई ज़रूरत हो सकती है ,

कोई अरमान हो सकता है ,

यह कोई नहीं सोचना चाहता !

बस सबको यही शिकायत होती है

कि वह इतनी रूखी क्यों है !


साधना वैद



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Sunday, May 8, 2011

कशमकश



तब नहीं जानती थी मैं 
कि क्यों रोकती है मुझे अम्मी 
दुहाई दे दे कर जमाने की.

क्यों नहीं  खेलने देती मुझे 
हमसायों के संग 
देर तक अकेले में.

अब ,जब मैं 
स्वयं पहुंच गयी हूँ 
अम्मी की उम्र तक. 
और जान गयी हूँ 
उन दुहाइओं  का सच. 

और समझाना चाहती हूँ
अपनी मासूम कली को
तो वो भी
 नहीं  समझ पा रही मेरी बात.

वो भी पूछती है मुझसे
वही सवाल
जो तब 
मैं अपनी अम्मी से पूछती थी.

और अब 
मैं भी जूझती हूँ 
उसी कशमकश से, 
जिससे कभी 
मेरी अम्मी जूझती थी.


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Saturday, April 30, 2011

द्रौपदी


 एक नारी के मन की -
व्यथा हो तुम 
धूलिसात अभिमान  का 
प्रतीक हो तुम 
रिश्तों में छली गयी 
नारी हो तुम 
पर निष्ठुर  भाग्य को धता 
देती हो तुम 
अंतस  की  पीड़ा  का 
आख्यान हो तुम
द्युतक्रीडा के परिणाम का 
व्याख्यान हो तुम 
भक्ति की पराकाष्ठा  को 
छूती हो तुम  
एक अबला की सबल -
गाथा हो तुम 
मर्यादित रिश्तों की 
भाषा हो तुम 
एक सुलझी हुई नारी की 
पहचान हो तुम 

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