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" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की और लिखा अपने मन मे बसी स्वतंत्रता को "



नारी तुम केवल सबला हो
निमर्म प्रकृति के फन्दों में
झूलती कोई अर्गला हो ।
नारी तुम केवल सबला हो ।
विष देकर अमृत बरसाती
हाँ ढ़ाँप रही कैसी थाती ।
विषदन्त पुरूष की निष्ठुरता
करूणा के टुकड़े कर जाती
विस्मृति में खो जाती ऐसे
जैसे भूला सा पगला हो
नारी तुम केवल--
कब किसने तुमको माना है
कब दर्द तुम्हारा जाना है
किसने तुमको सहलाया है
बस आँसू से बहलाया है
जिसका भी जब भी वार चला
वह टूट पड़ा ज्यों बगुला हो ।
नारी तुम--
तुम दया ना पा ठुकराई गई
पर फिर भी ना गुमराह हुई
इस स्नेह रहित निष्ठुर जग में
कब तुमसी करूणा-धार बही ?
जिसने तुमको ठुकराया था
उसके जीवन की मंगला हो ।
नारी तुम --
कब तक यूँ ही जी पाओगी ?
आघातों को सह पाओगी ?
कब तक यूँ टूटी तारों से
जीवन की तार बजाओगी ?
कब तक सींचोगी बेलों को
उस पानी से जो गंदला हो ?
नारी तुम ---
लो मेरे श्रद्धा सुमन तम्हीं
कुछ तो धीरज पा जाऊँ मैं
अपनी आँखों के आँसू को
इस मिस ही कहीं गिराऊँ मैं
तेरी इस कर्कष नियती पर
बरसूँ ऐसे ज्यों चपला हो ।
नारी तुम --
मेरी इच्छा वह दिन आए
जब तू जग में आदर पाए ।
दुनिया के क्रूर आघातों से
तू जरा ना घायल हो पाए
तेरी शक्ति को देखे जो
तो विश्व प्रकंपित हो जाए ।
यह थोथा बल रखने वाला
नर स्वयं शिथिल-मन हो जाए ।
गूँजे जग में गुंजार यही-
गाने वाला नर अगला हो
नारी तुम केवल सबला हो ।
नारी तुम केवल सबला हो ।
खिलने दो, खुशबू पहचानो
महकी बगिया कहती है सबसे
न तोड़ो, खिल जाने दो
इस जग में पहचान बनाने दो।
खिलती कलियों की मुस्कान को जानो
आकाश को छूते उनके सपनों को मानो
खिलने दो खुशबू पहचानो
महकी बगिया कहती है सबसे।
कण्टक-कुल से भरे कठिन रस्ते हैं इनके
फिर भी कुछ करने की चाह भरी है इनमें
न तोड़ो खिल जाने दो
इस जग में पहचान बनाने दो।
जीवनदान मिले तो जड़ भी चेतनमन पाए
जगती का कण-कण शक्तिपुंज बन जाए
खिलने दो खुशबू पहचानो
महकी बगिया कहती है सबसे।
न तोड़ो खिल जाने दो
इस जग में पहचान बनाने दो
महकी बगिया कहती है सबसे
खिलने दो, खुशबू पहचानो।
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ये लिंक भी जरुर देखे और आईये सोच बदले नये रास्ते तलाशे और बेटियों का दान ना करके उनको इंसान बनाए ।


माँ जिन्हें हम सब भाई बहन
अलग-अलग नाम से बुलाते
कोई माँ तो कोई अम्मा तो कोई मम्मी कहता।
आज माँ हम सबसे बहुत दूर है
पर आज भी माँ हम सबके बहुत करीब है।
आज भी उनका प्यार करना
उनका डांटना उनका दुलारना
सब याद आता है।
माँ जिन्होंने जिंदगी मे कभी
हार नही मानी , यहां तक की
मौत को भी तीन बार हराया
पर आख़िर मे जिंदगी ने
उन का साथ छोड़ दिया।
और माँ ने हम सबका।
आज भी माँ का वो हँसता मुस्कुराता
चेहरा आंखों और दिल मे बसा है
माथे पर बड़ी लाल बिंदी
और मांग मे सुर्ख लाल सिन्दूर
सब याद आता है ,बहुत याद आता है।
ममता
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"माँ"
एक प्यारा सा शब्द
एक मीठा सा रिश्ता
प्रेम उदधि
त्याग की मूरत
ईश्वरीय शक्ति
आँचल में समेटे
ममता का सागर
ममता से लबालब
राहों में बिछी
देखती हैं सपने
सदा संरक्षण को आतुर
एक सच्चा सम्बल
एक शक्ति और एक आस
जीवन में भर देती
सदा विश्वास........
आज के दिन दूँ क्या
तुमको उपहार
मस्तक झुकाती हूँ
सहित आभार
शोभा

खूब पहचानती हूँ
मैं…….
तुमको और तुम्हारे
समाज के नियमों को
जिनके नाम पर
हर बार…….
मुझे तार-तार किया जाता है
किन्तु अब…..
मेरी आँख का धुँधलका
दूर हो चुका है
अब सब कुछ
साफ दिखाई दे रहा
अरे! हर युग में
तुम्हीं तो कमजोर थे
तुमने सदा ही
भयाक्रान्त हो
मेरी ही शरण ली है
और मैं …….
हमेशा से तुम्हारी
भयत्राता रही
जन्म लेते ही तुम
मुझ पर आश्रित थे
पल-पल …
मेरे ही स्नेह से
पुष्पित-पल्लवित तुम
इतने सबल कैसे हो गए?
मैने ही विभिन्न रूपों में
तु्म्हें उबारा है
माँ, भगिनी, प्रेयसी और
बेटी बनकर
तुम्हें संबल दिया है
और आज भी…
हाँ आज भी…
तुम ……..
मेरी ही …
कृपा के पात्र हो
मेरे द्वार के भिखारी
तुम-- हाँ तुम
तुम्हारे स्वामित्व के
अहं को तोड़ दिया है
उस कवच में रहकर
तुम कब तक हुंकारोगे?
आज तुम मेरे समक्ष हो
कवच- हीन….
वासनालोलुप…..
मेरे लिए तरसते…
हुँह!
कितने दयनीय …
लगते हो ना..
अब तुम्हारी कोई चाल
मुझपर असर नहीं करती
अपने आत्मबल से मैं
तुम्हें भीतर देख लेती हूँ
सावधान!
षड़यंन्त्र की कोशिश
कभी मत करना
मेरी आँखों में अँगार है
और……
तुम्हारा रोम-रोम
मेरा कर्जदार है
ममतामयी,कोमल हृदय,कनखर भी मैं नारी
वक़्त पड़े जब रक्षा करने बनू तलवार दो धारी
बहेती रहूंगी हरियाली बिछाती पाने अपना लक्ष
हर जीवन फलता फूलता जिस पे ,मैं हूँ वो शाख


फिर उठी है टीस कोई
चिर व्यथित मेरे हृदय में
उठ रहे हैं प्रश्न कितने
शून्य पर- नीले- निलय में
फिर लुटा विश्वास है
चोट फिर दिल पर लगी है
फिर चुभी एक फाँस है
फिर शकुन अपमानिता है
दम्भी नर के सामने
द्रोपदी फिर से खड़ी है
कायरों के सामने
राधा का इक श्याम से
जल रहे हैं नेत्र मेरे
नारी के अपमान से
नारी तू तो शक्ति है
भय हारिणी और पालिनी
मातृ रूपा स्वयं है तू
स्नेह छाँह प्रदायिनी
प्रेम के मोह- जाल में
माँगती उससे सहारा
जो स्वयं भ्रम- जाल में
दुष्यन्त की हर चाल को
द्रोपदी पहचान ले
नर दम्भ निर्मित जाल को
फिर जगा विश्वास को
आंख का धुँधका मिटा ले
जीत ले संसार को
कायरों की भीड़ में
अब उड़ा दे मोह पंछी
जो छिपा है नीड़ में
अपने अतुल विश्वास से
स्वयं-सिद्धा बन बदल दे
विश्व को विश्वास से
सभी से विनम्र निवेदन हैं
मोबाइल और सेल फ़ोन का उपयोग कम से कम करे ताकी वातावरण मे प्रदुषण कम हो । मोबाइल से निकली विद्युत चुम्बकीय तरंगें मुंह,त्वचा तथा शरीर के अन्य स्थानों पर कैंसर को जन्म दे सकती हैं। जहाँ तक सम्भव हो रात को मोबाइल बंद रखे । अगर घर मे चार मोबाइल हैं तो आप किसी एक को चालू रख का भी काम चला सकते हैं । लैंड लाइन का उपयोग करना फिर आरंभ करे । अगर आप के घर मे गर्भवती महिला हैं तो मोबाइल उनसे बहुत दूर रखे । १३ साल तक कि आयु के बच्चो को मोबाइल का उपयोग करने से रोके । अपने घर के आस पास मोबाइल टावर ना लगने दे । आपकी और आपके परिवार कि सेहत के अलावा पर्यावरण कि जिम्मेदारी भी आप की ही हैं ।